लेख सार : प्रभु हमारे परमपिता और पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं । सभी का संचालन प्रभु करते हैं और प्रभु के कारण ही सभी मर्यादा में रहकर गतिमान रहते हैं । पूरा लेख नीचे पढ़ें -
प्रभु संसार के संचालक हैं । संचालक के रूप में प्रभु का सामर्थ्य देखें कि प्रभु क्षीरसागर में श्री शेषशय्या पर शांत रूप से विश्राम करते रहते हैं और इधर संसार का संचालन होता रहता है । लाखों योनियों में हर पल करोड़ों जीवों की मृत्यु होती है और करोड़ों जीव जन्म लेते हैं । हर पल करोड़ों जीवों की मृत्यु के बाद उनके कर्मों के हिसाब से उनका लेखा-जोखा बनता है जिसके अनुरूप उन्हें स्वर्ग या नर्क के भोग भोगकर फिर कर्म अनुसार नया जन्म मिलता है ।
हर पल असंख्य जीव प्रभु को विपदा में पुकारते हैं और उस विश्राम अवस्था में भी रहकर प्रभु उनकी पुकार सुनकर उन्हें विपत्ति से उबारते हैं ।
इतनी उठापटक संसार में होती रहती है, पूरा ब्रह्मांड गतिमान रहता है और ऐसे अनेकों ब्रह्मांड प्रभु के प्रत्येक रोमावली में स्थित है फिर भी प्रभु शांत रूप से विश्राम अवस्था में रहते हैं । यह प्रभु का सामर्थ्य है कि संसार में इतनी उठापटक के बाद भी प्रभु पर उसका कोई असर नहीं होता ।
हर पल करोड़ों जीवों की मृत्यु और उनके कर्म अनुसार लेखा-जोखा बिना किसी गलती के बनना कितना बड़ा प्रभु का सामर्थ्य है । जीव एकान्त और अकेले अवस्था में भी बहुत सारे कर्म करता है पर फिर भी प्रभु के यहाँ उस एकान्त और अकेले अवस्था में भी किए कर्म का भी हिसाब होता है । प्रभु के न्याय से कोई बच नहीं पाता । जो कर्म हमने नहीं किया उसका भोग कभी हमें भोगना नहीं पड़ता और जो कर्म हमने किए हैं उसके भोग भोगने से हम कभी बच नहीं सकते ।
प्रभु का संचालन श्रेष्ठतम है । उसे समझने के लिए एक फैक्टरी के संचालक का दृष्टांत देखना उचित होगा । एक उद्योगपति की एक बहुत बड़ी फैक्टरी है जिसका वह संचालन करता है । फैक्टरी में अलग-अलग मशीनें हैं, अलग-अलग विभाग हैं जिसके दिन भर की उठापटक से उद्योगपति दिनभर व्यस्त और परेशान रहता है । संचालन में कभी गड़बड़ी भी होती है, कभी रुकावट भी आती है । उस पूरी फैक्टरी का संचालन करते-करते शाम तक थककर उद्योगपति अपने घर लौटता है । अपना पूरा जोर लगाने के बाद भी सौ फीसदी उत्तम संचालन वह नहीं कर पाता । उसके संचालन में कमियाँ रहती हैं । अब प्रभु का सामर्थ्य देखें कि अनंत कोटि ब्रह्मांडो की उठापटक के बाद भी सभी का सुचारु संचालन होता है और ऐसा करते हुए प्रभु को तनिक भी श्रम नहीं होता ।
पूरे ब्रह्मांड में इतने सारे ग्रह हैं जो अपनी मर्यादा में चलते हैं । दिन और रात मर्यादा से होती है । सागर का जल मर्यादा में रहता है । हवा मर्यादा से बहती है । पूरे ब्रह्मांड का संचालन एक मर्यादा में होता है । कभी उस मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता ।
प्रभु विपदा में सबकी पुकार सुनते हैं । एक माँ दो कमरे दूर अपने बच्चे की पुकार नहीं सुन पाती पर प्रभु प्रत्येक जीव की चाहे वह जलचर हो, नभचर हो, थलचर हो या वनस्पति हो उसकी पुकार सुनते हैं और उस तक सहायता पहुँचाते हैं ।
इतने सामर्थ्यवान प्रभु से हमें भक्ति द्वारा जुड़कर रहना चाहिए तभी हमारा मानव जन्म लेना सफल होगा । मानव जन्म हमें प्रभु से जुड़ने के लिए ही मिला है । प्रभु हमारे परमपिता, स्वामी और संसार के संचालक हैं । इसलिए मानव जीवन में भक्ति द्वारा प्रभु से जुड़कर जीवन यापन करना ही श्रेष्ठ है । मानव जीवन की सफलता भी इसी में है ।