लेख सार : हम जीवनकाल में बुढ़ापे के लिए वित्तीय तैयारी तो करते हैं ताकि हमारा बुढ़ापा सुखपूर्वक बीत सके पर हम बुढ़ापे के पश्चात मृत्यु के बाद अपनी गति को सुधारने के लिए आध्यात्मिक तैयारी नहीं करते । जो जीव प्रभु की भक्ति करके यह आध्यात्मिक तैयारी करता है वह जन्म-मृत्यु के चक्र से सदैव के लिए छूटकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँच जाता है । पूरा लेख नीचे पढ़ें -
हम युवावस्था में वित्तीय तैयारी करते हैं जिससे बुढ़ापे तक हमारे पास रकम इकट्ठी हो जाए और हमारा बुढ़ापा ठीक से बीत जाए । पर क्या हम युवावस्था में आध्यात्मिक तैयारी भी करते हैं ताकि हमारा जीवन और मृत्यु दोनों सुधर सके ?
आज के युग में हर व्यक्ति को अपने बुढ़ापे की चिंता होती है । आज व्यक्ति को अपने पुत्र, पौत्र पर भरोसा नहीं रहा क्योंकि वह देख रहा है कि जिन बुजुर्गों ने अपने जीवनकाल में वित्तीय तैयारी नहीं की उन्हें वृद्धाश्रम में अपना जीवन काटना पड़ रहा है । इसलिए हर व्यक्ति अपनी युवावस्था से ही अपने पूर्ण जीवनकाल पर्यंत अपने बुढ़ापे की तैयारी करने में जुटा है । उसे पता है कि बुढ़ापे में खर्च बढ़ेंगे क्योंकि महँगाई बढ़ेगी, बुढ़ापे में बीमारी बढ़ेगी और इलाज का खर्च भी बढ़ेगा । इन सबकी तैयारी के लिए वह अपनी जमा पूँजी को बचा कर रखता है । वह अपनी युवावस्था से ही अपने बुढ़ापे के लिए निवेश करता है । निवेश के बहुत सारे अवसर उसके लिए बाजार में उपलब्ध होते हैं ।
वित्तीय निवेश करके वह व्यक्ति अपने बुढ़ापे की वित्तीय तैयारी तो कर लेता है पर क्या उसने कभी यह सोचा है कि उसे आध्यात्मिक तैयारी की भी जरूरत है जिससे उसका मानव जन्म सुधर जाए और उसकी मृत्यु भी सुधर जाए ।
शास्त्र, संत और भक्त हमें यही उपदेश देते हैं कि युवावस्था से ही प्रभु की भक्ति करनी चाहिए जिससे हमारा जीवन काल भी सुधरे और हमारा अंत भी सुधरे । जीवन काल में जितना-जितना प्रभु का भजन किया जाएगा उतना-उतना हम कर्मों के बंधनों से मुक्त होते चले जाएंगे । कर्म बंधन से मुक्त होने पर हमारा अंत सुधर जाता है क्योंकि हमें फिर कर्म भोगने के लिए जन्म नहीं लेना पड़ता । जीव अगर जीवनकाल में तन्मयता से प्रभु की भक्ति करता है तो उसकी गति सुधर जाती है और वह मृत्यु के बाद सीधे प्रभु के धाम पहुँचता है ।
इसलिए जीवन में युवावस्था से ही प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । सभी भक्तों ने अंत में प्रभु को पाया है और संसार चक्र के आवागमन से सदैव के लिए मुक्त हुए हैं । भक्ति का सामर्थ्य बहुत बड़ा है क्योंकि भक्ति की पहुँच सीधे प्रभु के श्रीकमलचरणों तक है । भक्ति हमें प्रभु की गोद में बैठा देती है । प्रभु को अपने भक्तों से अधिक प्रिय अन्य कोई भी नहीं है ।
इसलिए जैसे हम बुढ़ापे के लिए वित्तीय तैयारी करते हैं वैसे ही हमें बुढ़ापे के बाद मृत्यु के लिए आध्यात्मिक तैयारी भी करनी चाहिए । पर आज के युग में कुछ बिरले ही हैं जो ऐसा करते हैं । अधिकतर लोगों का ध्यान ही इस ओर नहीं जाता । सत्संग के प्रभाव के कारण कुछ भाग्यवान लोग ही होते हैं जिनका ध्यान इस ओर आकृष्ट होता है कि हमारा अंत क्या होगा, मृत्यु बाद हमारी गति क्या होगी ? ऐसे लोग अपने जीवन काल में ही आध्यात्मिक तैयारी करने में जुट जाते हैं और ऐसा करके अपना अंत और अपनी मृत्यु दोनों को सुधार लेते हैं । ऐसे लोगों से प्रेरणा लेकर सभी को ऐसा करना चाहिए तभी उनका मानव जन्म सफल हो पाएगा ।