लेख सार : चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद हमें मानव जीवनरूपी सुनहरा अवसर मिला है । इसलिए प्रभु भक्ति करके प्रभु की प्राप्ति करना ही मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य और मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए । पूरा लेख नीचे पढ़ें -
प्रभु ने पूर्व जन्मों के संचित पुण्य के कारण किसी को बल का सामर्थ्य दिया है जिस कारण वह किसी ऊँचे ओहदे पर मंत्री या अफसर बना है या धन का सामर्थ्य दिया है जिसके कारण वह सफल उद्योगपति या व्यापारी बना है । पर वह व्यक्ति उस सामर्थ्य को इस जन्म में भोगों में और संचय करने में लगा देता है । यह ठीक वैसा ही है जैसा कि एक गाड़ी को टंकी भर तेल दे दिया जाए और वह तीर्थ या देवालय जाने की जगह पहाड़ी भ्रमण पर निकल जाए ।
तीर्थ या देवालय जाता तो फिर वह अगले जन्म के लिए टंकी भर ईंधन संचित कर लेता पर भ्रमण पर गया तो पूर्व जन्म के संचित ईंधन को भी व्यर्थ गंवा बैठा ।
धनवान या बलवान होकर अगर हम अपने धन और बल को प्रभु को समर्पित नहीं करते हैं और उसे संसार को समर्पित करते हैं तो हम भयंकर भूल कर बैठते हैं । इस जन्म की इस गलती के कारण हम पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों को गंवा बैठते हैं और आने वाले जन्म के लिए पुण्य संचित करने का सुनहरा अवसर भी गंवा देते हैं ।
इस जन्म की एक गलती ने पूर्व और भविष्य के जन्मों को बिगाड़ दिया । पर मनुष्य ऐसा करता रहता है और अपना कितना बड़ा विनाश कर रहा है इस तरफ उसका ध्यान तक नहीं जाता ।
जो पुण्य हमने पूर्व जन्मों में किया है उसका फल है कि हमें मनुष्य योनि में जन्म मिला है । इसलिए मनुष्य जन्म मिलने के बाद अगर हमने इसमें प्रभु के लिए और प्रभु को समर्पित कर्म नहीं किए तो नया पुण्य अर्जित नहीं कर पाएंगे । अगर हमने यह मनुष्य जीवन संसार के कार्य करने में, परिवार पालने में, व्यापार करने में, दुनियादारी में ही गंवा दिया तो हम अगले जन्म की व्यवस्था करने से चूक जाएंगे ।
मनुष्य जन्म का कर्म प्रभु के लिए और प्रभु को समर्पित करके होना चाहिए । क्या है यह कर्म - यह कर्म भक्ति है जो हमें मनुष्य जन्म पाकर निश्चित रूप से करना चाहिए । भक्ति का इतना सामर्थ्य होता है कि वह हमारा अगला जन्म सुधार देती है यहाँ तक कि हमें संसार में आवागमन से सदैव के लिए मुक्ति भी दिला देती है । भक्ति हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों तक पहुँचा देती है जहाँ से फिर हमें संसार में लौटकर आना ही नहीं पड़ता ।
इसलिए जीव को अपना मानव जीवन प्रभु भक्ति के लिए उपयोग करना चाहिए । मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसे प्रभु भक्ति में लगाया जाए । पर हम प्रभु भक्ति के अलावा जीवन में सब कुछ कर लेते हैं । भक्ति को हम बुढ़ापे के लिए छोड़ देते हैं । पूरा जीवन अध्ययन, व्यवसाय, परिवार पोषण, दुनियादारी में निकल जाता है । बुढ़ापे में हमारा शरीर और हमारी स्मृति हमारा साथ नहीं देती और हम भक्ति करने में असमर्थ होते हैं । इस तरह पूर्व जन्म के संचित पुण्यों से मिला मानव जीवन व्यर्थ चला जाता है और हमें आने वाले जन्मों में चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ता है । प्रभु भक्ति और प्रभु प्राप्ति सिर्फ मानव योनि में ही संभव है, अन्य योनियों में नहीं ।
इसलिए जीव को चाहिए कि अविलम्ब अपने मानव जीवन को प्रभु भक्ति में लगाकर इसे सफल करे । प्रभु भक्ति करना ही मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य और मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए ।