| Serial No. |
Article |
| 201 |
किसे जीवन में कभी नहीं भूलना चाहिए ? (प्रभु को जीवन में कभी नहीं भूलना चाहिए)
आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी कमी यह है कि कभी-कभी कोई अभूतपूर्व वैज्ञानिक आविष्कार के कारण हम सृष्टि के मालिक प्रभु को भूल जाते हैं । हमें अपने विज्ञान बल का अहंकार हो जाता है । विज्ञान का हमने कितना भी बड़े-से-बड़ा आविष्कार कर लिया तो भी हमें उस आविष्कार के लिए बुद्धि और मस्तिष्क देने वाले प्रभु को कभी नहीं भूलना चाहिए । प्रभु ने पशु-पक्षी को सीमित बुद्धि दी है तो वे अपना जीवनयापन तो कर पाते हैं पर कोई आविष्कार नहीं कर पाते । अगर प्रभु हम मनुष्य को भी पशु-पक्षी की तरह सीमित बुद्धि देते तो हम भी कुछ नहीं कर पाते । प्रभु द्वारा प्रदान बुद्धि के कारण ही मनुष्य बड़े-से-बड़ा आविष्कार कर लेता है । बस ऐसा करने पर प्रभु को भूलने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए । पर हमसे अक्सर यह चूक हो जाती है और हम यह भूल बैठते हैं कि उस वैज्ञानिक आविष्कार हेतु बुद्धि हमें प्रभु की प्रदान की हुई है ।
इसलिए जीवन में कितनी भी बुलंदी पर हम पहुँच जाएं पर प्रभु को कभी नहीं भूलना चाहिए ।
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| 202 |
सद्गुण जीवन में कैसे आते हैं ? (सद्गुण प्रभु कृपा से जीवन में आते हैं)
सभी को प्रेरणा देने वाले, सभी को दिशानिर्देश देने वाले, सभी को मार्गदर्शन देने वाले और सभी में सद्गुणों का संचार करने वाले एकमात्र प्रभु ही होते हैं । हमें यह समझना चाहिए कि अगर हमारे सांसारिक पिता हमें सत्य बोलने की शिक्षा बचपन में देते हैं तो उन्हें निमित्त बनाकर यह कार्य प्रभु ही कर रहे हैं । अगर हम किसी व्यक्ति से प्रेरित होकर उसके गुण अपने भीतर उतारने की प्रेरणा लेते हैं तो यह भी प्रभु उस व्यक्ति को निमित्त बनाकर करते हैं । किसी भी सद्गुण का संचार हमारे भीतर प्रभु प्रेरणा बिना कतई संभव नहीं है । यह स्पष्ट रूप से समझना और मानना चाहिए कि सद्गुण प्रभु की प्रेरणा से ही हमारे जीवन में आते हैं और प्रभु की कृपा से ही हमारे भीतर टिकते हैं । सद्गुणों का संचार हमारे भीतर हो, इसके लिए अलग से प्रयास करने से कहीं ज्यादा लाभप्रद है कि प्रभु की निष्काम भक्ति करना । निष्काम भक्ति से हम प्रभु से जुड़ जाते हैं और प्रभु की कृपा से सद्गुणों का संचार धीरे-धीरे स्वतः ही हमारे भीतर होता चला जाता है ।
इसलिए जीवन में भक्ति करके प्रभु की कृपा अर्जित करनी चाहिए जिसके फलस्वरूप सद्गुण अपने आप जीवन में आ जाएंगे ।
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| 203 |
सिद्धांत पालन करने वाला किसे प्रिय होता है ? (सिद्धांत पालन करने वाला प्रभु को प्रिय होता है)
आज कलियुग में युग का प्रभाव ऐसा है कि सिद्धांतों पर चलना बेहद कठिन और कभी-कभी लगभग असंभव-सा लगता है । पर फिर भी जो जीव प्रभु से जुड़ जाता है और सिद्धांतों पर चलता है उसे जो सिद्धांत पालन करने का सुख प्रभु प्रदान करते हैं वह अदभुत होता है । उदाहरण के तौर पर झूठ बोलने में हमें फायदा होगा पर फिर भी अगर हमने सत्य बोला तो सत्यरूपी सिद्धांत को पालन करने का जो सुख और संतुष्टि हम अनुभव करेंगे, वह प्रभु द्वारा प्रदान अद्वितीय सुख और संतुष्टि होगी । इसलिए जीवन में भक्ति करनी चाहिए और सात्विक आचरण रखना चाहिए । जीवन में धर्म और शास्त्रों के सभी सिद्धांतों का पालन करने के लिए भक्ति बहुत बड़ा बल हमें देती है । केवल भक्ति के कारण ही हम धर्म और शास्त्रों में वर्णित सिद्धांतों को समझ पाते हैं, उनसे प्रभावित होते हैं और जीवन में उन्हें उतारने का प्रयास करते हैं ।
धर्म और शास्त्रों के सिद्धांत का पालन करने वाला प्रभु को सबसे प्रिय होता है । इसलिए अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो इससे प्रभु की असीम कृपा मानना चाहिए ।
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| 204 |
बुराइयां हमारा प्रवेश कहाँ वर्जित करती हैं ? (बुराइयां प्रभु के पास हमारा प्रवेश वर्जित कर देती हैं)
जितना हम किसी से ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, जलन रखेंगे हम प्रभु से उतने ही दूर होते चले जाएंगे । यह शास्त्रोक्त सत्य है और संतों का अनुभव किया हुआ सिद्धांत है । इसलिए किसी से ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, जलन रखना हमें तत्काल प्रभाव से बंद कर देना चाहिए । भक्ति के कारण जब हमें जगत प्रभुमय दिखने लग जाता है तो हम ऐसा करने में सफल हो जाते हैं । यह प्रभु से नजदीकियां बढ़ाने का सबसे सफल, सबसे सुंदर और सबसे सरल उपाय है । ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, जलन लेकर हम कदापि प्रभु के द्वार तक नहीं पहुँच सकते, प्रभु के द्वार पर दस्तक तक भी नहीं दे सकते । इसलिए जीवन में भक्ति के कारण किसी से भी हमारी ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, जलन को हमें खत्म करना चाहिए और प्रभु को यह करना प्रिय लगेगा, ऐसा मानते हुए यह करना चाहिए । ऐसा करने वाला स्वतः ही प्रभु को प्रिय हो जाता है इसलिए प्रभु की प्रसन्नता के लिए हमें ऐसा करना चाहिए । इससे ठीक विपरीत जो ऐसा नहीं कर पाता वह प्रभु से दूर होता चला जाता है । अब यह निर्णय हमें लेना है कि हमें प्रभु का सानिध्य चाहिए या प्रभु से दूरियां चाहिए ।
बुराइयां प्रभु के द्वार पर हमारा प्रवेश वर्जित करती हैं इसलिए उन बुराइयों का जीवन से त्याग होना चाहिए ।
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