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Article |
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मानव जीवन का लक्ष्य क्या है ? (प्रभु के श्रीकमलचरणों में विश्राम पाना ही मानव जीवन का लक्ष्य है)
मानव जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य क्या है ? किसी के लिए धन-संपत्ति, किसी के लिए परिवार, किसी के लिए मौज-मस्ती, किसी के लिए कीर्ति मानव जीवन का लक्ष्य होता है । वे लोग उसी दिशा में जीवनभर कार्य करते हैं । पर शास्त्र कहते हैं कि मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य प्रभु के श्रीकमलचरणों में विश्राम पाना है । दूसरे शब्दों में कहें तो हमेशा के लिए संसार की चौरासी लाख योनियों में आवागमन से मुक्त होना है । जीव का प्रयास इसी दिशा में होना चाहिए और इसके लिए ही उसे प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । पर माया हमें संसार में भ्रमित करके इस उद्देश्य पूर्ति से विपरीत कर्म हमसे करवाती है । प्रभु की माया की उलझन से बचना हो तो प्रभु की शरण में जाना ही पड़ेगा । जब हम भक्ति के बल पर प्रभु से प्रेम करने लगेंगे और प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपने मन को लगाने में सफल हो जाएंगे तो माया फिर हम पर अपना प्रभाव कभी नहीं डाल पाएगी । जीवन में माया और मायापति प्रभु के बीच से एक को चुनना पड़ता है पर दुर्भाग्यवश लोग माया के प्रभाव में आकर मायापति प्रभु को चुनना भूल जाते हैं । यह चूक बड़ी महंगी पड़ती है ।
इसलिए जीवनकाल में मानव जीवन के सच्चे लक्ष्य की तरफ हमें प्रयास करना चाहिए जिससे प्रभु के श्रीकमलचरणों में हमें स्थान मिल सके ।
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प्रभु प्राप्ति का अधिकार किसे है ? (प्रभु प्राप्ति का अधिकार सबको है)
जैसे कोई बच्चा किसी आजाद राष्ट्र में जन्म लेता है तो उसे आजादी का अधिकार जन्म से ही प्राप्त हो जाता है । उसके लिए उसे अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता । वह उसे जन्मजात अधिकार के रूप में स्वतः ही मिल जाता है । वैसे ही कोई जीव मनुष्य योनि में जन्म लेता है तो प्रभु को पाने का दुर्लभ अधिकार उसे स्वतः ही प्राप्त हो जाता है । मानव जीवन ही है जिसमें जीव भक्ति कर सकता है और भक्ति करके प्रभु की प्राप्ति कर सकता है । मानव जन्म मिलने के बाद हमें यह देखना चाहिए कि हम अपने तन, मन और इंद्रियों को प्रभु प्राप्ति में लगाते हैं या उससे संसार करने में लगा देते हैं । हमें देखना चाहिए कि प्रभु की प्राप्ति के लिए मिला अति दुर्लभ मनुष्य जन्म हम कहीं संसार करने में व्यर्थ तो नहीं गंवा देते हैं । प्रभु के मार्ग पर चलते हुए हमें संसार में नहीं उलझना चाहिए क्योंकि संसार में उलझे व्यक्ति का प्रभु के मार्ग पर चलना बहुत कठिन होता है यानी लगभग असंभव होता है ।
इसलिए हमारे जीवन का लक्ष्य प्रभु प्राप्ति होना चाहिए जिसका अधिकार सबको मनुष्य जन्म लेने पर प्रभु ने देकर भेजा है ।
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माया से हमारी रक्षा कौन कर सकता है ? (प्रभु की कृपा ही माया से हमारी रक्षा कर सकती है)
प्रभु की कृपा ही माया से हमारी रक्षा कर सकती है । प्रभु की कृपा ही एकमात्र रक्षा कवच है माया के प्रभाव से बचने का अन्यथा प्रभु की माया को क्षणभर से ज्यादा समय नहीं लगता हमें उलझने में । माया क्षणभर में अपनी मायाजाल में हमें उलझा लेती है । माया के प्रभाव में आते ही हम प्रभु से दूर हो जाते हैं जो कि जीवन की सबसे बड़ी हानि होती है । इस बड़ी हानि से बचाना है तो जीवन में प्रभु कृपा अर्जित करनी पड़ेगी । इसे अर्जित करने का साधन भक्ति है । भक्ति करने वाले जीव पर सदा प्रभु की कृपा रहती है और इस कारण वह माया के प्रभाव से बचा रहता है । माया उसके लिए निष्क्रिय हो जाती है और उस पर अपना प्रभाव नहीं डालती । इसके अलावा अन्य कोई भी विधि से माया से बचा नहीं जा सकता । प्रभु की माया ने सबको मोहित किया है और अपनी मायाजाल में उलझाया है । इसलिए प्रभु की भक्ति करके प्रभु की कृपा अर्जित करना ही श्रेयस्कर होता है । इस तरह हम माया के प्रभाव से बच सकते हैं और प्रभु के श्रीकमलचरणों में अपना स्थान बना सकते हैं ।
इसलिए जीवन में माया से रक्षा के लिए मायापति प्रभु की भक्ति करके उनकी कृपा अर्जित करनी चाहिए ।
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अपनी रक्षा का दायित्व किस पर छोड़े ? (अपनी रक्षा का दायित्व प्रभु पर छोड़े)
हम अपने रक्षण का भार स्वयं उठाते हैं और पूरा जीवन चिंता में व्यतीत कर देते हैं । हम अपने रक्षण के लिए कितना समय और परिश्रम लगते हैं फिर भी सफल नहीं हो पाते और विपत्ति में फंसते हैं । हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने रक्षण का भार प्रभु को नहीं देते और खुद ही अपने रक्षण के लिए श्रम करते हैं । पर जिस जीव की भीतर की आँखें खुल गई है वह प्रभु की भक्ति करके प्रभु की शरणागति ग्रहण कर लेता है और अपना पूरा दायित्व और जिम्मेदारी प्रभु को संभला देता है । इस तरह वह जीवनभर के लिए निश्चिंत हो जाता है । अपने स्वयं की चिंता करने से कहीं लाभप्रद है प्रभु का चिंतन करना और अपनी चिंता करने के दायित्व प्रभु पर सौंप देना । जब हम भक्त चरित्र पढ़ते हैं तो एक बार निश्चित पाएंगे कि सभी भक्तों ने अपने जीवन में प्रभु का चिंतन किया है और उनकी चिंता और रक्षण का काम प्रभु ने किया है ।
इसलिए जीवन में प्रभु की भक्ति करके अपने रक्षण का दायित्व प्रभु पर छोड़ना चाहिए ।
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किस अवस्था में प्रभु का सुमिरन अधिक होता है ? (प्रतिकूल अवस्था में प्रभु का सुमिरन अधिक होता है)
जिसके पास अथाह धन-संपत्ति है उसके हृदय से प्रभु के लिए धन्यवाद कभी-कभी निकलता है । वे प्रभु को कभी-कभी याद करते हैं पर जो प्रतिकूल परिस्थिति में है वह प्रभु के भरोसे ही रहता है और उसे नित्य प्रभु की याद आती है । धनवान को धन का भरोसा रहता है जबकि प्रतिकूल परिस्थिति में रहने वाले जीव को प्रभु का ही एकमात्र भरोसा होता है । प्रतिकूल परिस्थिति में पल-पल प्रभु की याद आती है इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से यह बहुत उपयोगी होता है । प्रतिकूल परिस्थिति में प्रभु का सुमिरन सभी करते हैं और सभी को प्रभु की याद आती है । सुख में कोई बिरला ही प्रभु को याद कर पता है क्योंकि सुख में हम संसार में रम जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं । यही कारण है कि भगवती कुंतीजी ने प्रभु से दुःख मांगा जिससे उन्हें प्रभु का सुमिरन निरंतर होता रहे और वे क्षणभर के लिए भी प्रभु को भूले नहीं । प्रभु को कभी नहीं भूलना, यह मानव जीवन की सच्ची कसौटी है ।
इसलिए प्रतिकूलता जीवन में आए तो कभी घबराना नहीं चाहिए और उसे प्रभु की तरफ मुड़ने का मार्ग मानकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए ।
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