श्री गणेशाय नम:
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर दो छोटे आलेख ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक रविवार
Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक बुधवार
Quotes on GOD (in Hindi & English), every Wednesday
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
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Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
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प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
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MEMOIR LANGUAGE SENDER'S NAME EDITOR'S INTRODUCTION
31 ACCIDENT MEMOIR HINDI Mr Murli Manohar Birla This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) rescues a devotee in a road accident of Bus mishap. Saved by the skin of his teeth, the memoir reflects how the saviour Almighty GOD is the supreme.
32 ACCIDENT MEMOIR Hindi Sob. Prema Subhashchandra Somani This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) saves the injured during an accident. By grace of Almighty GOD, help reaches quickly to rescue the victim.
33 PILGRIMAGE MEMOIR Hindi Smt. Vibha Pradip Deputy This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) makes a devotee undertake fasting under trying circumstances. When we do something for GOD, He takes care of our well-being.
34 PILGRIMAGE MEMOIR Hindi Dr.Puspa Srivastava The purpose of human life is unknown to many even in the later stage of life. This memoir shows how Almighty GOD blesses a soul to discover the true purpose of human life and discover the love and devotion for Almighty.
35 JOB PLACEMENT MEMOIR Hindi Mr Roshan Lal Sharma This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) motivates a man to seek job placement directly. He succeeds finding the rightful job.
36 JOB PLACEMENT MEMOIR English Mr Prakash Narayan Bajpai This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) leads the way to regain a career in Shipping industry and thus avert a mid life crisis.
37 BUSINESS MEMOIR Hindi Mr Yogendra Singh This memoir shows that how a brother's business flourishes in a short span of 3 months and enables him to arrange funds for the marriage of his sister. In his hour of need, GOD was there to help.
38 BUSINESS MEMOIR Hindi Mr Bholaram Haridas This memoir shows how GOD sends a business opportunity to a poor cobbler who now leads a respectable life as a shopkeeper.
39 MEDICAL MEMOIR English Ms Linda V. The doctors said the cancerous tumor in her lung would have to come out at the very earliest followed by a grueling regimen of chemotherapy, radiation and powerful medications. But wonder drugs weren't where she put her faith. She had put her faith on GOD.
40 MEDICAL MEMOIR English Mr Biplab Sengupta This memoir shows how upkeep of faith in Almighty GOD led to successful Chemotherapy Treatment despite unfavorable medical conditions. Thereafter the doctors gave a one month survival chance, GOD sends help in form of a non-medical treatment which cures the patient.
Serial No. Post
31 Real-life memoir by Mr Murli Manohar Birla titled दुर्घटना में रक्षा
Indexed as ACCIDENT MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) rescues a devotee in a road accident of Bus mishap. Saved by the skin of his teeth, the memoir reflects how the saviour Almighty GOD is the supreme.

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दुर्घटना में रक्षा

बात सन 2011 की है । करीब 150 व्‍यक्तियों के एक दल में शामिल होकर मैं पैदल यात्रा में भीलवाडा (राजस्‍थान) से श्री चारभुजाजी मंदिर जा रहा था । पैदल यात्रा करीब 130 किलोमीटर लम्‍बी थी ।

दो दिन की यात्रा सफलता पूर्वक पूरी कर ली । तीसरे दिन यात्रा कर हमें श्री चारभुजाजी मंदिर पहुँचना था इसलिए रात्री 2 बजे डेरे से रवाना हुये जिससे प्रात: मंगला के दर्शन हो सके ।

हम तीन जने एक साथ रास्‍ते पर चल रहे थे कि अचानक एक बस पीछे से अनियं‍त्रित हो बड़ी वेग से आई । फिर क्‍या हुआ मुझे पता नहीं चला । आँखों के सामने काला-काला छा गया और हमें पता भी नहीं चला की वेग के कारण हवा से उडकर हम दूर जा गिरे । हमारे साथ चल रहा एक यात्री घायल हो गया पर प्रभु ने मेरी रक्षा करी की मैं बाल-बाल बच गया और एक खरोंच तक नहीं आई ।

बस इतने वेग से इतने पास से निकली थी कि अगर टक्‍कर मार देती तो निश्‍चित ही जीवन लीला समाप्‍त हो जाती । पर प्रभु ने रक्षा की । बस ने टक्‍कर नहीं मारी, सिर्फ छुते हुये वेग से निकली । उसका वेग इतना था कि मैं दूर जा गिरा पर फिर प्रभु ने रक्षा की जिससे मैं अन्‍य वाहन की चपेट में नहीं आया । संपादक टिप्पणी - जब प्रभु हमारी रक्षा करते है तो जगत की कोई दुर्घटना हमारा बाल भी बाकां नहीं कर सकती । प्रभु ने यहाँ दोहरी रक्षा करी । बस की टक्‍कर से बचाया और फिर वेग के कारण रास्‍ते पर गिरने पर दूसरे वाहन की चपेट में आने से बचाया ।

इतने बड़े हदसा और दुर्घटना को टलते मैनें अपनी आँखों से देखा और प्रभु के साक्षात कृपा के दर्शन किये । एक नया जीवनदान प्रभु ने मुझे दिया है ऐसा मुझे प्रतीत हुआ ।

मैनें प्रभु श्री चारभुजाजी के मंदिर में दर्शन किये और प्रभु को धन्‍यवाद दिया मेरी रक्षा करने हेतु ।

मुरली मनोहर बिडला
भीलवाडा (राजस्‍थान)


नाम / Name : मुरली मनोहर बिडला
प्रकाशन तिथि / Published on : 31 मार्च 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मैं 60 वर्ष का हूँ और विगत 40 वर्षो से भीलवाडा (राजस्‍थान) में कार्यरत हूँ । सिनथैटिक लुम में कपडों की बुनाई का काम हमारे यहाँ होता है ।
व्‍यापार के साथ साथ मैं सत्‍संग हेतु समय निकालता हूँ और अपने पारमार्थिक जीवन को सफल करने की मेरी इच्‍छा है ।
32 Real-life memoir by Sob. Prema Subhashchandra Somani titled दुर्घटना में कृपा
Indexed as ACCIDENT MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) saves the injured during an accident. By grace of Almighty GOD, help reaches quickly to rescue the victim.

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दुर्घटना में रक्षा

मैं श्रीक्षेत्र आनंदजी से श्री पंडरपुर धाम की 250 किलोमीटर पैदल यात्रा पूरी करती हूँ जिसमें 22 दिन लगते हैं जो कि 1995 से मैनें जाना शुरू किया था और आज दिन तक जाती हूँ ।

श्री पंडुरंगा प्रभु मेरे आराध्‍य देव हैं और मेरी पूर्ण श्रद्धा उनमें है ।

प्रभु जीवन में कैसे कृपा करते हैं, जीवन में हमारी कैसे रक्षा करते हैं इसका एक प्रसंग मेरे जीवन में घटित हुआ । आज भी उस प्रसंग में साक्षात प्रभु कृपा के दर्शन मैं करती हूँ ।

बात 14 मार्च 2010 की है । हम पाँच जने गाड़ी से कही जा रहे थे । अचानक हमारी गाड़ी का जोरदार एक्‍सीडेन्‍ट हुआ । दुर्घटना होने के बाद मुझे कुछ याद नहीं की क्‍या हुआ और मैं बेहोश हो गई ।

दो-तीन मिनट में ही प्रभु की कृपा हुई और एक डाक्‍टर दम्‍पति की गाड़ी उधर से जा रही थी । उन्‍होंने जब यह दृश्य देखा तो प्रभु प्रेरणा से वे रूके और सबसे पहले गाड़ी के सीट के नीचे दबी मेरे को निकाला और सीधे लेकर अस्‍पताल भागे ।

फिर वे वापस आये और एक-एक करके सबको निकाला और सबको अस्‍पताल पहुँचाया ।

मेरा ईलाज शुरू हुआ । सिर में एवं जाँघ में चोटें आई थी । सिर पर 10 टांके लगें । थोडे दिन बाद मैं सामान्‍य हो गई और मुझे अस्‍पताल से छुट्टी मिल गई ।

मैनें श्री पांडुरंगा प्रभु को धन्‍यवाद दिया क्‍योंकि मुझे पता था कि प्रभु ने ही दुर्घटना में मेरी रक्षा करी । एक बड़ी विपदा को छोटे से रूप में टाल दिया । संपादक टिप्पणी - प्रभु कृपा करते हैं तो हमारे भाग्‍य में लिखी बड़ी विपदा को छोटे से रूप में टाल देते हैं - यह एक स्‍पष्‍ट सिद्धांत है । साक्षात प्रभु कृपा के दर्शन उस प्रसंग में तब हुये जब दुर्घटना के मात्र दो-तीन मिनट में प्रभु ने मदद भेजी और एक डाक्‍टर दम्‍पति की गाड़ी उधर से गुजरी और उन्‍होंने हमें निकाला और ईलाज हेतु अस्‍पताल पहुँचाया । साक्षात प्रभु प्रेरणा के कारण उन्‍होंने ऐसा किया, ऐसा अनुभव आया । ऐसा नहीं होता तो हम दुर्घटनाग्रस्‍त अवस्‍था में अचेत पडे रहते । संपादक टिप्पणी - प्रभु जब रक्षा करते हैं तो तत्‍काल मदद भेजते हैं जैसा की यहाँ देखने को मिला ।

प्रभु की कृपा असीम है और प्रभु जब रक्षा करते हैं तो सहायता खुद चल कर हमारे पास चली आती है ।

सौ. प्रेमा सुभाषचन्‍द सोमानी
अम्‍बद (महाराष्‍ट्र)


नाम / Name : सौ. प्रेमा सुभाषचन्‍द सोमानी
प्रकाशन तिथि / Published on : 12 अप्रेल 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मेरी उम्र 55 वर्ष की है । मैं गृहिणी हूँ ।
मेरे तीन बेटे हैं । मुझे सत्‍संग में रूची है और जहाँ भी सत्‍संग का मौका मिलता हे, मैं जाती हूँ । 1995 से लगातार हर वर्ष मैं 250 किलोमीटर की पैदल यात्रा श्रीक्षेत्र आनंदजी से श्री पंडरपुर धाम के लिए करती हूँ ।
33 Real-life memoir by Smt. Vibha Pradip Deputy titled व्रत में देखभाल
Indexed as PILGRIMAGE MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) makes a devotee undertake fasting under trying circumstances. When we do something for GOD, He takes care of our well-being.

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व्रत में देखभाल

मैं और मेरी पुत्री एक माह के लिए ऋषिकेश में श्रीमद भागवतजी की कथा सुनने गये हुये थे । हम आश्रम में रूके हुये थे और हमारे भोजन की व्‍यवस्‍था आश्रम स्थित भोजनालय में थी । हम नित्‍य प्रभु की कथा सुन रहे थे और सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था ।

श्रावण माह में सोमवार का दिन था जो की श्री शिवजी प्रभु की उपासना का दिन होता है और उस दिन संयोग से ग्‍यारस (एकादशी) भी थी । हमने फलाहार करके व्रत करने का निर्णय किया ।

सुबह के सत्र की कथा श्रवण करने के बाद हम दैनिक दिनचर्या के हिसाब से भोजनालय गये और फलाहार मांगा । मैनेजर ने कहा कि हमारे पास ऐसी कोई व्‍यवस्‍था नहीं है ।

हमारे सामने समस्‍या खडी हो गई कि अब क्‍या करें, कैसे पूरा दिन निकलेगा । पर हम दोनों व्रत की पालना के लिए दृढ थे ।

जैसे ही हम निराश होकर अपने कमरे में जा रहे थे कि एक महिला जो भी सत्‍संग हेतु आई हुई थी वह हमें सीढीयों में मिली । अपने आप उन्‍होंने कहा कि मेरे पास फलाहार की एक थाली बची हुई है । अगर आपने व्रत किया हो तो इस थाली का उपयोग कर लो ।

मेरी पुत्री प्रसन्‍नता से वह थाली ले आई । मेरी पुत्री ने पूरी थाली मुझे दे दी क्‍योंकि मेरा कैंसर का ईलाज सफलता से हाल ही में पूर्ण हुआ था और मुझे शारीरिक शक्ति के लिए खाना अनिवार्य था । पर एक मां के नाते मुझे अपनी बेटी के लिए दुःख हो रहा था एवं मैनें भी खाने से मना कर दिया ।

तभी हमारे कमरे की घंटी बजी और एक छोटा लडका फलाहार का टिफिन ले कर आया और हमें दे गया ।

हमारा मन उस महिला और उस लडके के लिए भर आया । पर हमने उसके पीछे की उस अदृश्य शक्ति का अनुभव किया जो की हमें साधन उपलब्‍ध करवा रहे थे ।

कौन हमारा ख्‍याल रख रहा है ? कौन हमारी जरूरत को जानकर उसकी पूर्ति कर रहा है ? कौन हमें मदद भेज रहा है ? हमें पता था की यह प्रभु के अलावा कोई नहीं हो सकते । संपादक टिप्पणी - ऐसे प्रश्‍न अगर हम हर अनुकूल परिस्थिति में स्‍वयं से पुछने की आदत बनाते हैं और उसके उत्‍तर के रूप में अगर हमें प्रभु की कृपा के दर्शन होते हैं तो हमारा जीवन धन्‍य हो उठता है ।

पूरे दिन हमें प्रभु के सानिध्‍य का अनुभव बना रहा । उस पवित्र दिन का मेरा साक्षात अनुभव रहा कि हम सात्विक कामना करते हैं उससे पहले ही प्रभु उसकी पूर्ति कर देते हैं । प्रभु के लिए किया गया व्रत को प्रभु ने ही पूर्ण करवाया ।

प्रभु की कृपा का साक्षात अनुभव मैनें किया ।

विभा प्रदीप डेप्‍युटी
सुरत (गुजरात)


नाम / Name : श्रीमति विभा प्रदीप डेप्‍युटी
प्रकाशन तिथि / Published on : 20 अप्रेल 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मेरी उम्र 60 वर्ष की है । मैनें बीए की पढाई बम्‍बई से पूरी करी थी और अब एक गृहिणी हूँ ।
20-25 वर्ष मैनें अपने स्‍वयं का उद्यम किया । सत्‍संग में मेरी विशेष रूची है और जब भी सत्‍संग का मौका मिलता है, मैं जाती हूँ ।
34 Real-life memoir by Dr.Puspa Srivastava titled सत्‍संग की कृपा
Indexed as PILGRIMAGE MEMOIR


Editor's Introduction : The purpose of human life is unknown to many even in the later stage of life. This memoir shows how Almighty GOD blesses a soul to discover the true purpose of human life and discover the love and devotion for Almighty.

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सत्‍संग की कृपा

मेरी उम्र 72 वर्ष की है और मैं एक गृहिणी हूँ ।

6 वर्ष पूर्व मुझे जानकारी मिली तो मैं गीता साधना शिविर में भाग लेने गई । मुझे बहुत अच्‍छी अनुभूति हुई और बहुत कुछ सीखने को मिला ।

वहाँ से आकर मैनें अपने जीवन में प्रभु के लिए समय बढाया तो एक बहुत बड़ी कृपा प्रभु ने कर दी । संपादक टिप्पणी - प्रभु के लिए जीवन में समय बढाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है । मेरे जीवन में सत्‍संग का मौका आया जब मुझे 3 वर्ष पूर्व पता चला कि स्‍वर्गाश्रम (ऋषिकेश) में पवित्र श्रावण मास में महिने भर की हरि कथा का आयोजन है ।

मैं सहर्ष कथा श्रवण के लिये गई । उसके बाद से मैं बराबर श्रावण महिने में एक महिने के लिए प्रभु कथा सुनने जाने लगी ।

प्रभु की ऐसी कृपा हुई मानो मेरा पुन: जन्‍म हुआ हो । धर्म का सही स्‍वरूप मेरे समझ में आया । आध्‍यात्‍म ज्ञान के कारण भगवत धर्म का पता चला । मानव जीवन लेकर आने पर मानव जीवन के क्‍या उद्देश्य होते हैं इसकी अनुभूति हुई । संपादक टिप्पणी - मानव जीवन के उद्देश्य का पता हमें जीवन में चल जायेगा और उस उद्देश्य की पूर्ति हेतु हम दृढ संकल्‍प हो जाये, यह हमारा परम सौभाग्‍य होता है । प्रभु कथा में प्रभु की लीला और गुणों का श्रवण करते करते प्रभु की भक्ति दृढ हुई ।

पहले जीवन में जो भी पढा-सुना था वह सब अपूर्ण था क्‍योंकि सत्‍संग का सौभाग्य नहीं मिला था । सच्‍चे संतों के साथ सत्‍संग का मौका जीवन में प्रभु कृपा बिना नहीं मिलता है और सत्‍संग बिना भ्रांतियां दूर नहीं होती ।

यह प्रभु की असीम कृपा है कि जीवन के वानप्रस्‍थ की अवस्‍था में, जबकि सत्‍संग की सबसे ज्‍यादा जरूरत होती है अपने मानव जन्‍म के उद्देश्य की पूर्ति हेतु, तब प्रभु ने कृपा करी और जीवन में सत्‍संग मिला । इससे मेरा पूरा जीवन ही बदल गया और एक नया जन्‍म हुआ ऐसा अनुभव करती हूँ ।

सत्‍संग के रूप में प्रभु की साक्षात कृपा के दर्शन मैं करती हूँ ।

डा. पुष्‍पा श्रीवास्‍तव
ग्‍वालियर (मध्‍य प्रदेश)


नाम / Name : डा. पुष्‍पा श्रीवास्‍तव
प्रकाशन तिथि / Published on : 21 अप्रेल 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मेरी उम्र 72 वर्ष है । मैनें बीए और आयुर्वेद में एम एस किया था और अब एक गृहिणी हूँ ।
मैं अपने घर के बच्‍चो को श्रीमद गीताजी पढाती हूँ और अब आस-पास के बच्‍चों की भी ऐसा संस्‍कार देना चाहती हूँ ।
मुझे सत्‍संग में रूची है और जहाँ भी सत्‍संग का मौका मिलता है, उसका लाभ लेती हूँ ।
35 Real-life memoir by Mr Roshan Lal Sharma titled नौकरी की कृपा
Indexed as JOB PLACEMENT MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) motivates a man to seek job placement directly. He succeeds finding the rightful job.

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नौकरी की कृपा

बात 1970 की है जब मैं नौकरी के लिये परेशान रहता था ।

उस समय अखबार की छपाई का कार्य ब्‍लॉक प्रिन्टिंग से होता था और मैं ब्‍लॉक बनाने का काम करता था । मैं किसी अखबार में नौकरी की तलाश में था ।

मेरे मकान मालिक के लडके की जान पहचान एक बड़े अखबार के संपादक से थी । वह मुझे वहाँ मिलाने ले गया ।

संपादक से मिलने के बाद उन्‍होंने मुझे कुछ दिनों बाद मिलने को कहा । फिर चार महिने तक वे संपादक मुझे झुलाते रहे । मैं उन संपादक महोदय से मिलने के लिए कॉफी हाउस नियमित जाता था जहाँ वे अकसर आते थे । पर या तो मिलने का मौका नहीं मिलता और जब मिलता तो वे मुझे बहाना बना कर टरका देते थे ।

मैं निराश था कि एक दिन कॉफी हाउस में एक बुजूर्ग मिले । उनकी दाढी बढी हुई थी और वे मुझे किसी अखबार के रिपोर्टर प्रतीत हो रहे थे ।

उन्‍होंने मुझे बुलाया और कहा कि अगर जीवन में तुम अपना रवैया नहीं बदलोगे तो कभी कामयाब नहीं हो पावोगे । उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा गुस्‍सा आया जिसे वे तुरंत भांप गये ।

मैनें पुछा कि आपने ऐसा क्‍यों कही की जीवन में कभी कामयाब नहीं हो पावोगे तो उन्‍होंने कहा कि विगत 4 महिने से मैं देख रहा हूँ कि तुम कॉफी हाउस एक संपादक के इंतजार में आ रहे हो । ऐसे काम नहीं बनेगा । तुम सीधे अखबार के मुख्‍यालय जाओ और अखबार के हेड से मिलो, तुम्‍हारा काम हो जायेगा ।

मुझे प्रभु ने साक्षात प्रेरणा भेजी थी और मैं हिम्‍मत जुटाकर अखबार के हेड से मिलने गया । अखबार के हेड ने कहा कि अभी कुछ दिनों पहले ही नियुक्ति हेतु विज्ञापन निकाला था । दो- तीन दिन पहले आते तो रख लेता । मैं निराश होकर जाने लगा तो पता नहीं उनके मन में क्‍या आया कि उन्‍होंने मुझे रोका । उन्‍होंने कहा कि किसी की सिफारिश से मुझे नियुक्ति तो करनी पडी जिससे मैं खुश नहीं हूँ । इसलिए जिस दिन उस व्‍यक्ति को नौकरी पर आना है अगर वह उस दिन नहीं आया तो मैं तत्‍काल तुम्‍हें रख लूंगा । उन्‍होंने मुझसे कहा कि तुम अपना नाम, पता और एक टेलीफोन नम्‍बर जहाँ तुमसे सर्म्‍पक हो सके वह लिखवा दो । मैनें ऐसा ही किया ।

फिर प्रभु की कृपा के दर्शन हुये जब नियुक्ति के दिन वह व्‍यक्ति नौकरी हेतु उपस्थित नहीं हुआ । उन सज्‍जन जिनसे मैं मिलकर आया था, उनका फोन आया और मैं तुरंत अखबार के आफिस गया जहाँ मुझे तत्‍काल नौकरी मिल गई ।

प्रभु कृपा जीवन में देखकर मैं अभीभूत था । उस दाढी वाले सज्‍जन से मिलने लगातार महिने भर तक मैं कॉफी हाउस गया की प्ररेणा के माध्‍यम बनने के लिए उनको धन्‍यवाद दे सकू और उनका मुँह मीठा करवा सकू । पर फिर वे कभी नहीं मिले । मुझे आर्श्‍चय हुआ कि जिन दाढी वाले सज्‍जन को मैं पहले लगातार कॉफी हाउस में बैठे देखता था, वे उसके बाद कभी नहीं मिले ।

तब मेरा विश्‍वास पक्‍का हो गया कि प्रभु ने ही उन्‍हें मुझे प्रेरणा देने हेतु भेजा था । संपादक टिप्पणी - हमें हर अनुकूल घटना के पीछे प्रभु के अदृश्य हाथ को देखने की कला आनी चाहिए । प्रभु ने उनके माध्‍यम से एक तरह से मुझे प्रेरणा दी कि सीधे जा कर अखबार के हेड से मिलो । मिलने पर मेरा काम हो गया ।

प्रभु कृपा के साक्षात दर्शन इस तरह मेरे जीवन में हुये ।

रोशन लाल शर्मा
दिल्‍ली


नाम / Name : रोशन लाल शर्मा
प्रकाशन तिथि / Published on : 02 मई 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मैं 72 वर्ष का हूँ । पहले मैं अखबार के आफिस में कार्यरत था । 2002 में सेवानिवृत हो गया । मुझे जीवन में सत्‍संग बहुत प्रिय है और जहाँ भी सत्‍संग का मौका मिलता है, मैं पहुँचता हूँ । प्रभु कृपा से सभी तीर्थो के दर्शन मैनें कर लिये हैं ।
36 Real-life memoir by Mr Prakash Narayan Bajpai titled GOD was there in my hour of need
Indexed as JOB PLACEMENT MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) leads the way to regain a career in Shipping industry and thus avert a mid life crisis.

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GOD was there in my hour of need

If a traveler who is walking under a scorching sun shine comes under the shadow of a tree, he will realize the comfort and coolness and will feel relaxed and rejuvenated after a while. Something similar happened to me. In the sunshine of life’s struggle, it was GOD’s shadow that gave me the comfort. Editor's comments- If we seek GOD, He always provides solace in time of struggle.

In the year 1994 I had lost my manufacturing business due to a great intrigue and conspiracy by my recently inducted business partners. I was running short of capital to build up stock of my produce and hence the partners with capital and promise for setting up another unit were brought in. The conspiracy was masterminded by chartered accountants that left me penniless save my experience and Marine Engineering first class qualifications.

It was in the middle of the year 1995 when I decided to go back to Mumbai to look for a job on a ship. Before coming to Mumbai I had received a phone call from the crew director of my last Shipping Company in Monte Carlo (Monaco) which I had left in 1988. This phone call was in a reply to my letter to them showing my interest to join back the Company. He instructed me to contact Company’s office at Nariman Point, Mumbai. Therefore upon reaching Mumbai I met the right person of the Company who after my introduction checked up my past service records and was glad to offer me employment. In my heart I was so happy and I thanked God profusely. I presented my certificates etc to him for checking. The shock came to me as a bolt from the blue. The officer in the office informed me that under the new International Maritime Organization Convention all my certificates have expired and become invalid. Therefore they have to be renewed as per new Laws because I did not work in any Shipping Company since 1988 to until now. Therefore I must get all my certificates renewed/validated by attending various prescribed training Courses and working on ships or Shipping Company for one year in a lower rank.

In a completely shattered condition I came back to my Seamen’s Club room and lay flat on the bed thinking and praying. I had many question running in my mind to which I have no answers. How to meet home expenses, how to pay for at least four ‘must training courses’ costing heavy sum for each course of 10 days one by one ! How to meet expenses of my living in Mumbai ? I prayed to GOD and asked Him to show me the light. Editor's comments- When we have many questions in life to which we have no clues or answers, we must pray and seek GOD’s intervention. When we become Sawali (a person having sawal meaning 'questions') GOD provides the answers to our call.

As the night fell and after a light dinner I came strolling to Club’s Notice Board that displayed requirements from Shipping Companies. There were many vacancies but all were for fully qualified personals with updated training courses. I spotted one ‘most urgent requirement’ by a local Shipping Agent requesting for immediate engagement. I noted down the address and phone nos. At last with some hope I fell asleep.

Next morning by ten O’clock I was in Govt. of India, Ministry of Mercantile Marine Dept. Office where one of my batch-mates was a senior officer whom I had gone to meet. Upon seeing my card my friend himself came out of his office and met me most cordially. After listening to my miss-fortune he informed that in any case I have go through all the training course but he will help me ‘validate’ my certificates as soon as possible. He strongly advised me that I should visit that Shipping Agent immediately whose address I had shown him. May be their urgency of requirement may help me in some way.

Therefore I went to the address in Nariman point in haste and presented myself in front of the Manager and told him the truth. The Manager saw my Service-record book only and offered me immediate engagement at Rs.1700 per day after taxes with a renewable period of 45 days. I felt as if some power was with me and I accepted the offer immediately. I could feel the invisible hand of Almighty GOD on my side. Editor's comments- From a situation of despair GOD sends help and averts a crisis situation.

In the afternoon I prayed and thanked GOD for arranging a new start for me. Then I phoned my wife at home to tell her how with the grace of GOD I met those people who were waiting to help me. It was clear case of GOD’s mercy that gave me one more chance to survive. From here I recovered my Shipping career at the age of 55 years fully with all its glory and worked mostly in foreign Shipping till age of 70 years. It was GOD who came to my aid to avert a mid-life crisis in my life. Editor's comments- We must be able to see the hidden hands of Merciful GOD behind all help received, behind all favorable things that happen to us.

Prakash Narayan Bajpai
Gurgaon


नाम / Name : Mr Prakash Narayan Bajpai
प्रकाशन तिथि / Published on : 05 May 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : I am 75 years old and my curious mind kept me restlessly busy in serious studies in Literature, Philosophy, History and Religion which has prompted me to write a book titled “Guidance to Sense of Well-Being” which was self-published in 2013 and is on sale in ‘flipkart’.
I was born in a desolate, dry and very backward village in Bundelkhand of Uttar Pradesh in the year 1939. Since there was no school in and around village so my primary education went missing and my schooling started in a local Pathshala in a small town from where I passed class 10. Later I went for science graduation to Allahabad University and then to Marine Engineering College Calcutta for 4 years Engineering education.
My first Shipping Company was Scindia Steam Navigation Bombay which I joined in October 1962. I remained in active service in Shipping Industry till December 2009 and in last week of January 2010 I suffered heart failure which was restored by Bypass surgery that is keeping me going.
During my active working period I went through a variety of life’s adventures while roaming around the whole world and travelling widely in India too.
My motto in life is “In Service of Humanity”.
37 Real-life memoir by Mr Yogendra Singh titled प्रभु कृपा से व्‍यापार चमका
Indexed as BUSINESS MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows that how a brother's business flourishes in a short span of 3 months and enables him to arrange funds for the marriage of his sister. In his hour of need, GOD was there to help.

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प्रभु कृपा से व्‍यापार चमका

मेरे पिताजी की लक्ष्‍मण झुला में दुकान है पर व्‍यवसाय कोई खास नहीं चल रहा था ।

मेरी छोटी बहन की शादी 4 महिने बाद तय हुई थी । शादी की व्‍यवस्‍था का भार था ।

मेरे मौसाजी ने किसी कारणवश अपनी दुकान की देख-रेख का काम संभालने के लिए मुझे बुलाया । पहले कमीशन की बात करके मुझे रखा पर फिर एक महिने बाद मुझे कहा कि मैं कमीशन नहीं दूगा सिर्फ 2000 रूपये का वेतन दूगां ।

मैं निराश होकर उनको यह बोलकर आया कि मैं सोचकर बताता हूँ । मैं निराश था कि इतने कम वेतन में काम करूगां तो शादी की व्‍यवस्‍था कैसे हो पायेगी ।

फिर मैनें अपने मामाजी से एक दुकान किराये पर दिलाने के लिए कहा । दुकान किराये पर मिली और मैनें अपना खुद का काम शुरू किया ।

पहले दिन की ग्राहकी मात्र 36 रूपये की थी और दूसरे दिन की ग्राहकी मात्र 72 रूपये की थी । तीसरे दिन मेरे घर वालो ने हिम्‍मत खो दिया । पर मुझे गंगा माता पर पूर्ण विश्‍वास था कि माता सब ठीक करेंगी । संपादक टिप्पणी - प्रतिकुल परिस्थिति में भी प्रभु पर विश्‍वास रखना सफलता की कूंजी होती है ।

शादी में अब तीन महिने का समय ही बचा था और फिर माता ने ऐसी कृपा की कि इतना अच्‍छा व्‍यापार चला की तीन महिने में बड़ी सुलभता से मेरी बहन की शादी की सुचारू व्‍यवस्‍था हा गई । शादी के बाद भी रूपये बचे ।

इतनी कृपा माता गंगा कि हुई की मेरे विपदा के समय मुझे इस तरह संभाला जैसे एक माँ अपने बच्‍चे को संभालती है ।संपादक टिप्पणी - प्रभु अपने बच्‍चों को एक माता-पिता की तरह संभालते हैं । यह एक शाश्‍वत सत्‍य है । प्रभु कृपा के साक्षात दर्शन मुझे हुये । मैं क्‍या था और आज कहाँ पर हूँ इसका पूरा श्रेय प्रभु को है । संपादक टिप्पणी - हम अपने जीवन की उपलब्‍धी का श्रेय अपनी कर्मशीलता और अपने परिश्रम को देते हैं जबकी उसका सच्‍चा श्रेय प्रभु को जाता है ।

योगेन्‍द्र सिंह
लक्ष्‍मण झुला (उत्‍तराखण्‍ड)


नाम / Name : योगेन्‍द्र सिंह
प्रकाशन तिथि / Published on : 22 May 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मेरी उम्र 38 वर्ष की है । मैं ज्‍यादा पढाई नहीं कर पाया क्‍योंकि मुझे परिवार के लिए काम पर जल्‍दी आना पडा । मेरा परिवार लक्ष्‍मण झुला में रहता है । मेरे दो बच्‍चे हैं ।
गंगा माता में मरी पूर्ण श्रद्धा है । गंगा माता, गौउ सेवा और पुजा-पाठ में मेरी विशेष रूची है ।
38 Real-life memoir by Mr Bholaram Haridas titled प्रभु कृपा से नया व्‍यापार
Indexed as BUSINESS MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how GOD sends a business opportunity to a poor cobbler who now leads a respectable life as a shopkeeper.

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प्रभु कृपा से नया व्‍यापार

मैं स्‍वर्गोश्रम (ऋषिकेश) में रहता हूँ । करीब 30 वर्ष पहले की बात है । तब मैं मोची का काम करता था ।

एक यात्री स्‍वर्गोश्रम आये और एक मंदिर के बाहर से उनका जुता चोरी हो गया । वे पूरे स्‍वर्गोश्रम में घुमते रहे पर उन्‍हें पूरे स्‍वर्गोश्रम में कोई जुते की दुकान नहीं मिली । क्‍योंकि उस समय स्‍वर्गोश्रम में कोई जुते की दुकान ही नहीं थी ।

वे मेरे पास आये क्‍योंकि मैं मोची का काम करता था तो मैनें उन्‍हें बताया कि नये जुते खरीदने के लिए उन्‍हें गंगा माता के उस पार बसे ऋषिकेश शहर जाना पडेगा । उन्‍होंने मुझसे कहा कि वे इस जगह से अंजान हैं इसलिए क्‍या कोई उनके लिए जाकर नये जुते ला सकता है । मुझे प्रभु ने भीतर से प्रेरणा दी और मैं तैयार हो गया । उन्‍होंने मुझे पैसे दिये और मैं ऋषिकेश जाकर उनके लिए जुते ले आया ।

माता गंगा ने उन सेठजी को ऐसी प्रेरणा दी कि उन्‍होंने मुझसे कहा कि आज से यहाँ जुते चप्‍पल बेचने का काम शुरू कर दो जिससे मेरे तरह किसी अन्‍य यात्री को आगे तकलीफ नहीं हो । मेरे पास ऐसा काम शुरू करने के लिए पैसे नहीं थे । मैनें जब उन्‍हें यह बताया तो उन सेठजी ने उस समय (आज से 30 वर्ष पूर्व) 500 रूपये दिये और नया व्‍यापार शुरू करने को कहा । प्रभु कृपा के साक्षात दर्शन मुझे हुये क्‍योंकि मेरे रोजगार के लिए ऐसी प्रेरणा उन्‍हें प्रभु ने ही दी थी । संपादक टिप्पणी - प्रभु किसी भी माध्‍यम से, किसी को निमित बना कर हमारा काम कराते हैं । हमें उस निमित के पीछे प्रभु के अदृश्य हाथ को देखने की कला आनी चाहिए ।

मैनें व्‍यापार शुरू किया जो सफल रहा और गंगा माता की कृपा से आज पूरा परिवार का पेट अच्‍छी तरह के पल रहा है । प्रभु ने उस यात्री के रूप में मदद भेजी और मेरा खुद का व्‍यापार शुरू करवा कर परिवार पालने की व्‍यवस्‍था की ।

भोलाराम रविदास
स्‍वर्गोश्रम (ऋषिकेश)


नाम / Name : भोलाराम रविदास
प्रकाशन तिथि / Published on : 26 May 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मेरी उम्र 63 वर्ष की है । मैनें चौथी कक्षा तक पढाई की है । मैं बिहार का रहने वाला हूँ । मेरे परिवार में एक लडकी एवं एक लडका है ।
माता गंगा की कृपा का मैनें और मेरे परिवार ने अनुभव किया है, आज भी करते हैं और आगे भी करते रहेगें ।
39 Real-life memoir by Ms Linda V. titled The Greatest Healer
Indexed as MEDICAL MEMOIR


Editor's Introduction : The doctors said the cancerous tumor in her lung would have to come out at the very earliest followed by a grueling regimen of chemotherapy, radiation and powerful medications. But wonder drugs weren't where she put her faith. She had put her faith on GOD.

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The Greatest Healer

It was June 17th, 2002 when I experienced chest pains and decided to go to the emergency room. I had been under a lot of stress because my mother was dying.

I thought something was wrong with my heart, but tests confirmed it was fine. The X-rays, however, showed something abnormal and a scan revealed a cancerous mass the size of an orange in my right lung. The doctors said that it had been there for four years.

In an eleven-hour period, my life and my family's was totally changed.

The doctors then broke the bad news to my husband and my kids. A battery of more tests was scheduled. My mother passed away right before the tests were to have been performed, so I had to postpone them so that I could attend her funeral. It was a very difficult decision to make during a very tiring time, but GOD helped me through it.

Two days after her burial, I went ahead with the tests. A biopsy of my lung came back positive: cancer !

I thanked the Lord that the cancer was localized. Editor's comment - Thanking GOD even in distress is a great habit. The moment you thank GOD from the bottom of your heart, the distress starts easing up. A miracle ! This cancer had been there for four years and had not spread to other parts of my body ! The doctors said that they had never seen anything like it.

An operation was set for August 21, 2002. Every day before the surgery I prayed to GOD. My friends and family also prayed for me. I called everyone I knew to tell them how sick I was and to ask them to pray for me. Editor's comment - Selfless prayers are soon answered. Because I believed in my heart that the more prayers lifted up on my behalf, the better.

At the Crusade, I had an unforgettable experience. Benny Hinn announced to the crowd: "The Lord put it in my heart; a message to a woman who was recently diagnosed with lung cancer." To the woman, he said: "Put your hands where the problem is. The Lord wants to heal you." I knew he was talking to me and I did what he said. Nothing happened that I could tell. I was very disappointed.

At the end of the evening, we were hurrying back to our bus (there were about 25,000 people in the building) and I then realized that something felt "different" in my stomach. The hernia, which I had for 38 years, had disappeared.

I cried and said, "Lord, you have healed my stomach." I thanked Him for the healing and blessing - and the hernia has not come back.

The next day, we returned to the Crusade. Around 11:00 a.m., Benny repeated the same words he'd spoken the day before about a woman with lung cancer. I wept and said, "GOD, this is for me, I claim it, heal me." I closed my eyes, and prayed, lifting my hands to HIM.

I felt pain so severe that I was shaking and was very cold. My friends, trying to keep me warm, covered me with the only thing they could find: plastic bags !

After a while, all my pain left my body ! No pain, no cold ! My body felt like it was on fire. I cried with joy.

I then went to the front, wanting to testify. A woman with Benny's organization asked me what happened. She said, "You won't have a chance to testify. There are 100 people ahead of you." She stepped away, then walked back to me, took my hand and said, "Come with me. The Lord put it in my heart to bring you on stage."

I went onto the stage and testified what the Lord had done. Benny prayed for me and rebuked the cancer and thanked the Lord for removing the hernia from my body, saying: "Go in Peace, GOD loves you, and I know you love HIM, too."

Upon returning home, I went ahead with the lung operation as scheduled. The surgeon removed a part of my upper right lung. But when the doctors examined the tissue that had been removed, they found no sign of the cancer ! The hand of God took it all away.

I recuperated very fast. No chemotherapy, radiation or the five-year regimen of pills. And I have been fine ever since !

My prayers had been answered that night at the Crusade. I love to share my story and want people to know that we have a Healer in Heaven, whom I call "GOD"! Editor's comment -GOD has been the greatest healer since time immortal. I know that HE's with me every moment of the day. Without HIM, I would not be telling my story. HE's my everything. Editor's comment - GOD is my everything - is a great way to express our humble sentiments towards the Almighty Father. HIS Holy Name is always on my lips and in my heart.

Call on HIM, believe in HIM night and day because HE loves us all the same. HE's there for us - and HE's only a breath away. Invite HIM into your life. Call on HIM who is merciful. HIS healing hands are waiting for you. Trust, believe and love HIM. No matter how big the problem, HE's bigger. Editor's comment - There is a popular saying “ Don't tell GOD how big your problem is, instead tell your problems how big your GOD is.

Ms Linda V.
Canada


नाम / Name : Ms Linda V.
प्रकाशन तिथि / Published on : 03 June 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : This article is reproduced with kind permission from the website Touched by the Hand of GOD. The referred website contains many such amazing GOD miracle real-life stories. Visitors to the website – Touched by the Hand of GOD – will find motivational stories to inspire and guide one along their spiritual path.
40 Real-life memoir by Mr Biplab Sengupta titled My Experience of Fighting Cancer
Indexed as MEDICAL MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how upkeep of faith in Almighty GOD led to successful Chemotherapy Treatment despite unfavorable medical conditions. Thereafter the doctors gave a one month survival chance, GOD sends help in form of a non-medical treatment which cures the patient.

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My Experience of Fighting Cancer

I have felt the mercy of GOD so many times from my childhood and even feel and get His mercy when I need it most. I also feel His personal presence so many times in my life. Only a believer will believe, others may even term it as false or tall talk. Editor's comment - Feeling the mercy of GOD at all times is a great spiritual achievement.

My following experience will reveal how GOD’s mercy successfully led me in a fight against Cancer. After a prolonged treatment of Radiation therapy, Chemotherapy and finally Surgery, the PET CT and Biopsy reports indicated full recover from the Cancer disease from the affected portion of the body without any metastasis. As such on being diagnosed Cancer for the second time just a year after recovery from the first attack, naturally I became perplexed. But that was just for few seconds. I had firm faith in GOD. Editor's comment - Having firmest of firm faith in GOD during distress leads the way to overcome it.

I consulted Oncologists of the treating hospital who virtually ruled out any further effective treatment since (a) Further Radiation therapy was not possible since I had taken maximum dose of Radiation earlier (b) Surgical Oncologist ruled out Surgery and suggested Chemotherapy but (iii) Medical Oncologist expressed unwillingness to undertake Chemotherapy because after an Echocardiography it was found that my LVEF was below 35%. Therefore the Cardiologist did not recommend injecting IV Chemo Medicines as there was great chance of failure of my Heart during the Chemotherapy treatment, and prescribed oral tablets of targeted therapy just to console me which I could understand easily. Therefore I could visualize my death in a very painful manner without any effective treatment available to me.

Immediately I took a decision and argued before the Oncologists that I should be given the Chemotherapy Treatment, come what may. At the maximum I will collapse while receiving the IV Chemo medicines for which I was ready to give any undertaking. But the Senior Oncologist would not budge. He told me that the treatment was his domain but I insisted that my life was my domain and after a prolong argument, the Oncologists after discussing with my daughter, who is my medical attendant throughout my treatment, immediately admitted me and injected the first dose under close supervision and monitoring throughout the night.

By grace of GOD I was happy that I could receive the therapy in stable condition in spite of poor LVEF. Further Chemo and Immune therapy was continued according to the required cycles / dose which continued for six months. But a new development was noticed after a month where in my MRI report had shown disappearance of Cancer on lower alveolus but formation of ulcer on tongue which was suspected to be a new cancerous growth. This time the Oncologists however revealed their doubt of the disease of tongue and advised my daughter that perhaps my life was for a maximum one month. That was 18 June 2013.

In the mean time I was finding difficulty in orally consuming water due to burning sensation on my tongue and pharynx. As such a food tube was inserted in my stomach for liquid diet. However, at the same time medicines were continued. My daughter too had faith in GOD and was not disheartened. She neither disclosed the doubt of Oncologist about my survival to me nor to her mother.

She discussed with her friends and ultimately requested one of her Facebook friend residing in Gujarat to transmit Reiki therapy to me. The Facebook friend continued Reiki on me and on his advice my daughter started giving me Shakti Drop (an Ayurvedic preparation) over and above my normal Medicines. GOD’s mercy showered on me in form of Reiki and Shakti Drop. I was cured from a situation where in the doctors has just given me the chance of one month’s survival. Editor's comment - GOD can cure through any means. Here the grace of Almighty GOD cures through a non-medical means. Now I have regained my health and energy. Last MRI report had shown disappearance of ulcers and I have no difficulty of taking solid food orally. The food pipe has also been removed. I am leading a normal life even visiting nearby places by driving my own vehicle.

My purpose of sharing the above experience is to remind everybody to have faith in GOD during distress and never be disheartened, come what may. GOD is always great.

Biplab Sengupta
New Delhi


नाम / Name : Mr Biplab Sengupta
प्रकाशन तिथि / Published on : 21 June 2014

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : I am a person of ordinary prudence, born and brought up in a middle class family. During my childhood itself, knowingly or unknowingly some system of life philosophy was injected in my heart and soul by my Grand Ma which remained intact till now. These were (a) Never tell a lie, be truth full. (b) Never compromise with injustice. (c) Never disregard poor and needy. Be helpful to them as long as you can. (d) Always be respectful to elders. (e) Never neglect parents.
Though I could hardly understand the meanings fully at that age, but by regular preaching by my Grand Ma through beautiful stories, these became my treasures. From my student life to my service period in Central Government Service, knowingly I never deviated. For not compromising with injustice, I had to fight in honorable Court of Law up to the Supreme Court, the judgments of which of course came in my favor.
By following above principles, sometimes I had to face severe criticism, but ultimately I won every time. I am now leading a peaceful retired life, not having considerable bank balance which colleagues of my status have, but I am rich enough in my heart and my monthly Pension and CGHS Card are sufficient for my livelihood and medical cover.
I have seen many ups and downs in my life, but every time I was helped by GOD to get rid of any difficult situation whenever I got into one.