श्री गणेशाय नम:
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
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Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
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प्रभु प्रेरणा से संकलन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
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MEMOIR LANGUAGE SENDER'S NAME EDITOR'S INTRODUCTION
01 MEDICAL MEMOIR HINDI Mr Sandeep R Karwa This memoir shows PRABHU KRIPA (GOD's kindness) in illness / medical treatment. Lot of people kneel down to seek GOD's mercy at time of medical crisis but forget to visualize how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) had raised them from the crisis. When we get well, we give credit to modern medical facilities & medicines. They are all medium but it is the PRABHU KRIPA (GOD's kindness) which has worked for them.
02 (1) PILGRIMAGE MEMOIR
(2) RETIRED-LIFE MEMOIR
ENGLISH Mr Tribeni Prasad Agrawal This memoir shows PRABHU KRIPA (GOD's kindness) during Pilgrimage. Lot of people who may have pleased GOD get divine experience during Pilgrimage. Here is one such experience. Also the memoir shows how goodness in life pleases GOD.
03 (1) MATRIMONY MEMOIR
(2) GIRL-CHILD PARENTING MEMOIR
HINDI Mr Sandeep R Karwa This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) works in marriage . Whosoever is happy as a couple { it is PRABHU KRIPA (GOD's kindness) and they must try to retain it } . Whosoever is not happy as a couple must seek PRABHU KRIPA (GOD's kindness) . The personal example of the sender reflects both the happy situation & the ordinary situation. It was PRABHU KRIPA (GOD's kindness) which gave them so many happy years as a couple . One must not venture to loose PRABHU KRIPA (GOD's kindness), as done in the sender's case. The memoir only tries to reflect this viewpoint.
04 MEDICAL MEMOIR ENGLISH Ms Manisha Belani This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) works during medical crisis. Whosoever seeks GOD's kindness during period of medical crisis is able to tide over the diffucult time successfully. The memoir tries to reflect this viewpoint.
05 HELPING-HAND MEMOIR HINDI Mr Roshan Gupta This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) works during our effort to help or do good for others. If you get a inner call which leads us to help someone, we should consider ourself fortunate to be choosen by ALMIGHTY GOD for the job. Because we then become the medium for the invisible hands of ALMIGHTY at work.
06 (1) CONFESSION MEMOIR
(2) MATRIMONY MEMOIR
HINDI Mr Sandeep R Karwa This memoir is a confession memoir. The sender has confessions in life, as everyone would have, but the courage to speak out is only due to PRABHU KRIPA (GOD's kindness). We all make blunders in life and hide it under the carpet and forget it. In the Holy test of the Christians, lot of emphasis is given to confession. Nothing is hidden from ALMIGHTY GOD, not even our thoughts which had even not come up on our lips. This memoir, which is a confession, qualifies for this section because it also shows a total U-turn (from hiring a cocotte to celibacy) which was only possible because of PRABHU KRIPA (GOD's kindness).
07 HELPING-HAND MEMOIR HINDI Mrs Prema VasantRao Rashatwar This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) helps us, when we undertake to work for the cause of ALMIGHTY GOD. If we selflessly do so, we get divine help all the way in our endeavour. Because it is GOD's work and therefore the invisible hands of ALMIGHTY GOD is always on our side to protect us, help us and to lead us to our goal.
08 CHILD PARENTING MEMOIR ENGLISH / HINDI Mr Sandeep R Karwa This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) refines & purifies the heart and mind of young ones, if they are brought closer to the ALMIGHTY LORD during childhood. The power to restrain oneself from indulding in wrong doings is only possible with devotion towards ALMIGHTY. This is because the goodness of ALMIGHTY GOD sows the seed of goodness in us which redefines the ideology of our life for doing 'rights' and avoiding 'wrongs' in our life. This fact is reflected in this memoir.
09 HELPING-HAND MEMOIR ENGLISH Sharon H This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) helps us in our hour of need. It shows how we are choosen or hand-picked by LORD at time of our distress. If we have faith in LORD, HE definitely answers our call.
10 HELPING-HAND MEMOIR ENGLISH Jonathan S. This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) helps us in our efforts of goodness. If we do things which pleases GOD, HE executes our plan to perfection.
Serial No. Post
1 Real-life memoir by Mr Sandeep R Karwa titled प्रभु द्वारा जीवन का दान
Indexed as (1) MEDICAL MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows PRABHU KRIPA (GOD's kindness) in illness / medical treatment. Lot of people kneel down to seek GOD's mercy at time of medical crisis but forget to visualize how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) had raised them from the crisis. When we get well, we give credit to modern medical facilities & medicines. They are all medium but it is the PRABHU KRIPA (GOD's kindness) which has worked for them.

Editor's Request : You may email this memoir to anyone presently experiencing medical crisis in life for motivation. You may share this memoir directly via Email, Facebook, Twitter and various other social networks with the help of Share-Button available on the right vertical of this page.


प्रभु द्वारा जीवन का दान

मेरे प्रभु ने कितनो को बिमारी से, दुर्घटना से और अन्‍य भयंकर विपदाओ से कृपा करके बाहर निकाला है, मानो एक नया जीवन ही दिया हो । पर हम उसे अपना स्‍वअर्जित प्रारब्‍ध मानने की गलती कर बैठते हैं और प्रभु को मात्र धन्‍यवाद देकर या सवामणी करवा कर या कोई धार्मिक अनुष्‍ठान करवा कर इतिश्री कर लेते हैं । जबकि हमें उस नये जीवन के एक भाग को सदैव प्रभु भक्ति में अर्पण करना चाहिए । यही सबसे श्रेष्‍ठ मानव जीवन की उँचाई है ।

एक प्रसंग यहाँ बताने योग्‍य मानता हूँ । एक पुत्र है देवयुक्‍त । वह अभी 9 वर्ष का है । जब वह मात्र 2 महिने का था, तो एक बार गंभीर रूप से बिमार पड़ा । निमोनिया बहुत बिगड़ गया । इतना बिगड़ा कि जिस डाक्‍टर का इलाज घर पर 7 दिन से चल रहा था उन्‍होंने एकाएक कह दिया कि ICU में भर्ती करना पड़ेगा । वे डाक्‍टर जयपुर शहर में बच्‍चों के ईलाज के लिए सबसे प्रसिद्ध और अनुभवी डाक्‍टरों में से एक थे । राज्‍य की राजधानी होने के कारण जयपुर में बच्‍चों के सबसे बड़े राजकीय अस्‍पताल के प्रोफ़ेसर थे । मैंने तुरंत उनसे पुछा कि कौन से अस्‍पताल में ले जायें, जहाँ पर आप आकर सम्‍भाल सकेगें ? वे सिद्धांतवादी थे इसलिए पुराना परिचय होने के बावजुद भी उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कह दिया कि आप पैसेवाले हैं, शहर के बढ़िया से बढ़िया अस्‍पताल में आप ले जायें । पर मैं वहाँ न तो ईलाज हेतु निर्देश दे सकूगां और न ही आकर देख पाऊंगा क्‍योंकि यह मेरे सिद्धांत के खिलाफ होगा । उन्‍होंने आगे कहा कि मेरे देखरेख में ईलाज चालु रखना चाहते हैं तो आपको सरकारी अस्‍पताल में ही बच्‍चो को भर्ती करवाना पड़ेगा । मैं भी, प्रभु कृपा के कारण जीवन में सिद्धांतवादी हूँ । इसलिए जब दुसरो को सिद्धांतवादी पाता हूँ, तो प्रभु कृपा के दर्शन करता हूँ एंव मन में उन व्‍यक्ति के प्रति सम्‍मान और बढ़ जाता है । अपने स्‍वार्थ के लिए किसी के अच्‍छे सिद्धांत टुडवाने की मैं कल्‍पना भी नहीं कर सकता ।

यथार्थ में उस समय ऐसा लगा जैसे मेरे पैर के नीचे से जमीन निकल गई । बड़े एंव नामचीन प्राईवेट अस्‍पताल में जाता हूँ तो इन डाक्‍टर की सेवा से वंचित रह जाते हैं । इनकी सेवायें लेनी हो तो बच्‍चे को सरकारी अस्‍पताल में भर्ती करना होगा जो आज तक हमारे परिवार के पीढियों में भी कभी नहीं हुआ होगा । साथ ही उन्‍होंने कह दिया कि बच्‍चे की अवस्‍था बेहद नाजुक है इसलिए आपको 5 मिनट में यह निर्णय लेना होगा - समय नहीं है आपके पास ।

मैं तुरंत उनके कक्ष से बाहर आया और सदैव की तरह प्रभु का स्‍मरण किया और इस विपदा को प्रभु को समर्पित किया और प्रभु की शरणागति ली । अपना बुद्धिबल (विवेक), धनबल सब भुल गया और अनन्‍यता से प्रभु से बस यही कहा कि बच्‍चा आपका है, आपका ही दिया हुआ है, आप उसके और मेरे परमपिता हैं (मैं तो मात्र लौकिक पिता हूँ बच्‍चे का) । संपादक टिप्पणी -प्रभु समर्पण की अनन्‍यता से तुरंत पिघल जाते - श्रीग्रंथों के इन वचनों पर कभी भी जीवन में संदेह नहीं करना चाहिए । यह पूरी प्रक्रिया मानसिक थी और 2 मिनट में ऐकान्‍त में हो गई ।

मैंने परिवार में अपने माता पिता, रिश्‍तेदार, यहाँ तक कि साथ में गई पत्‍नी तक से कुछ नहीं पुछा की क्‍या करना चाहिए । मन में स्‍पष्‍ट अनुभुति (निर्देश) था कि बड़े अस्‍पताल के चक्‍कर में मत पड़ो, इस डाक्‍टर के पीछे चलो क्‍योंकि करने वाला मैं (प्रभु) हूँ । संपादक टिप्पणी - जीवन में विपदा के क्षण एंव हर क्षण विश्‍वास मात्र और मात्र प्रभु का ही होना चाहिए ।

तीसरे मिनट डाक्‍टर के कक्ष में दोबारा दाखिल हुआ और मैंनें कहा की बच्‍चे का ईलाज आपसे ही करवाना है, यही प्रेरणा मुझे हुई है । उनके भीतर उसी समय मैंनें नया उत्‍साह देखा । प्रभु कृपा के दर्शन यही से मुझे आरम्‍भ हो गये । उन्‍होंने कहा की अभी 1 महिने पहले ही ICU का एक नया विंग शरू हुआ है । बहुत साफ सुथरा है और सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त है । मैं इस बच्‍चे की भर्ती के निर्देश उसी ICU में दे रहा हूँ, आप तुरंत अस्‍पताल पहॅचें ।

जो ICU का पलंग देवयुक्‍त के लिए आरक्षित हुआ था, पहुँचते ही हमने देखा कि एक परिवार रो रहा है और उनके बच्‍चे की 10 मिनट पहले ही मृत्यु उसी शैय्या पर हुई है । रोंगटें खड़े करने वाला दृश्य देखा और अस्‍पताल के एक कर्मचारी के मुँह से अनायास एक वाक्‍य निकल पड़ा - फिर एक बच्‍चा मरने के लिए आ गया - सुनकर हम स्‍तब्‍ध रह गये । ( राजस्‍थान बड़ा राज्‍य है । यह राज्‍य की राजधानी का सबसे बड़ा बच्‍चों का सरकारी अस्‍पताल था । राज्‍य के विभिन्‍न जिला स्‍तर से रेर्फड - अंतिम आपातकालीन अवस्‍था के केस - नीम हकीम, झाड फूँक सब करने के बाद असहाय स्थिति में वहाँ पर पूरे राज्‍य से आते रहते थे । कर्मचारी के मुँह से अनायास निकले उस वाक्‍य को इसी संदर्भ में देखना चाहिए । )

एक रात निकली, दुसरा दिन निकला । बच्‍चे की हालत नाजुक बनी हुई थी, कोई सुधार नही था । दुसरी रात को मैं और पत्‍नी बच्‍चे के पास बैठे थे । रात करीब 2 बजे एकाएक बच्‍चे की श्‍वास की गति असामान्‍य हो गई, शरीर अकड गया, आखें चढ गई, मुँह खुला रह गया, जीभ टेढी हो गई, बच्‍चा तडपने लगा ।

रात को सरकारी अस्‍पताल में हमनें जो देखा वह कल्‍पना से बाहर था । नर्स, वार्डबाये सभी सोये हुये थे । नर्स को उठाया तो उसने नींद में ही कह दिया कि ड्यूटी डाक्‍टर से बात करो । ड्यूटी डाक्‍टर अपना केबिन बंद करके सोया था । उठाया तो बड़े गुस्‍से में भडक गया, बोला - मरने के लिए बच्‍चो को ले आते हैं, मैं भगवान थोडे न हूँ की सबको बचा लू । बड़ी मिन्‍नते करने पर आया । वह नींद में ही था और आंखे मलता हुआ गुस्‍से से आया और बच्‍चे की हालत को बिना देखे ही एक इन्जेक्शन हेतु दवाई फ्रीज से निकाली ( मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि उसने गम्‍भीरता से दवाई भी नहीं चुनी थी । ) उसने इन्जेक्शन लगाया और हमसे बोला कि अब जो भी हो दोबारा मुझे मत उठाना । मैं कुछ नहीं कर सकता । वह अपने केबिन में चला गया ।

मुझे प्रभु पर ही विश्‍वास था इसलिए ड्यूटी डाक्‍टर से उलझना मुझे गवारा नहीं हुआ । बच्‍चा तडप रहा था । मैं और पत्‍नी पास खड़े थे ।

इतने में बच्‍चे ने तडपते हुये ऐसी अनुभूति दी मानो पानी मॉग रहा हो । हम किससे पुछे कि पानी देना भी है की नहीं । सब सोये हुये थे । जगाने पर क्‍या उत्‍तर मिलना है, हमें पता था । हमारे मन में आया कि बच्‍चा तो जा ही रहा है, अंत में पानी से तो उसे वंचित न करें ।

स्‍वयं ही हमने निर्णय लिया की पानी दिया जायें । प्रभु के नाम का जप करते करते एक एक चम्‍मच करके पानी देते रहे और वह पीता रहा । मिनरल वाटर की पूरी एक बोतल वह एक घंटे में पी गया । हालत में कोई सुधार नहीं था ।

हृदय गति असामान्‍य थी, आखें चढी हुई थी, मुँह खुला था, जीभ टेढी थी । हमारे मन में प्रभु के नाम का जाप निरंतर चल रहा था । तभी आधे धंटे बाद देवयुक्‍त की आंखे सामान्‍य हो गई और वह हमें देखने लगा । धीरे धीरे हृदय गति सुचारू हो गई, मुंह बंद हो गया, जीभ ठीक हो गई । वह रोने लगा । इतने समय बाद उसका रोना सुन कर और उसको आंखे खोले देखते हुये मानो हमें लगा कि प्रभु ने साक्षात इतनी बड़ी कृपा कर दी और एक नया जीवनदान उसे दे दिया । संपादक टिप्पणी - प्रभु की कृपा जीवन में कितनी तत्‍काल काम करती है, यह यहाँ साक्षात देखने को मिलती है ।

सुबह 6 बजे तक तो वह बिलकुल सामान्‍य हो गया था । बुखार पूरी तरह उतर चुका था और उसे पीडा की कोई अनुभूति नहीं थी । वह चहक रहा था ।

घर के बड़े अस्‍पताल पहुँच चुके थे । रात को उन्‍हें हमने फोन ही नहीं किया था, कुछ भी नहीं बताया था । मुझे पता था की करने वाले मात्र मेरे करूणानिधान प्रभु ही हैं । संपादक टिप्पणी - विपदा की घडी में किसी भी अन्‍य संसारिक / शिष्‍टाचार / लौकिक बातों का ध्‍यान न करते हुये, पूरी तनमयता से सिर्फ और सिर्फ प्रभु के श्रीकमलचरणों को पकडे रहना चाहिए । ध्‍यान, निष्‍ठा और श्रद्धा सिर्फ और सिर्फ प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही केद्रित होकर रहनी चाहिए ।

सुबह 7 बजे घरवालों ने बच्‍चे को संभाला, रात की पूरी प्रभु कृपा की घटना की जानकारी देकर हम मुख्‍य डाक्‍टर के घर पर मिलने पहुचे ।

उन्‍होंने देखते ही हमें कहा की मुझे कुछ बताने की जरूरत नहीं । सुबह मुझे अस्‍पताल से रात की घटना की ब्रीफिंग मिल चुकी है । एक बात मैं कहना चाहता हूँ की जो इन्‍जेक्शन उस जुनियर रेसीडेन्‍ट डाक्‍टर ने दिया उसका निर्णय लेना उसकी योग्‍यता से परे था । विश्‍वास मानिये, आपके इष्‍टप्रभु ने ही साक्षात उससे ऐसा करवाया है । वह इन्‍जेक्शन उस समय नहीं दिया जाता तो बच्‍चे का खेल खत्‍म हो जाता । प्रभु ने ही आपके बच्‍चे को बचाया है ।

मेरी मान्‍यता पहले से ही थी कि इलाज करना डाक्‍टर का काम है पर इलाज का लगना (प्रभाव करना) प्रभु के ही हाथ है । नामचीन डाक्‍टर, बड़ा अस्‍पताल , बढिया से बढिया इलाज भी निस्‍फल होते हम देखते हैं । और यहाँ सरकारी अस्‍पताल, जुनियर रेसीडेन्‍ट डाक्‍टर, नींद में किया ईलाज भी सफल हो गया ।

सुबह के सभी टेस्ट में देवयुक्‍त की सभी रिपोर्ट सामान्‍य आई । बहुत जल्‍दी हमें अस्‍पताल से छुट्टी मिल गई ।

मेरी मुर्खता देखें कि जिस रात दो बजे देवयुक्‍त को प्रभु ने नया जीवनदान दिया उसके पूर्व मैं अस्‍पताल बेड के पास बैठकर शरलौक होम्‍स की कहानीयां पढ़ रहा था । मुझे उस समय श्रीगजेन्‍द्र मोक्ष का पाठ करना चाहिए था । श्रीगजेन्‍द्र मोक्ष का अनन्‍यता से किया हुआ पाठ उस अंतिम अवस्‍था को बदलने की क्षमता रखता है । संपादक टिप्पणी - श्रीगजेन्‍द्र जी का उद्धार प्रभु द्वारा अंतिम अवस्‍था में ही हुआ था । अपनी अंतिम अवस्‍था में श्रीगजेन्‍द्र जी ने प्रभु के छोटे से नाम ( अक्षरो में छोटा पर प्रभाव में दिव्‍यत्‍तम ) को पुकारा था । संतों ने व्‍याख्‍या की है कि प्रभु के श्रीनाम के पहले अक्षर का उच्‍चारण होते ही प्रभु नंगे पैर दौरे, अगले अक्षर के उच्‍चारण से पहले प्रभु ने श्रीसुदर्शन चक्र से ग्राह (मगरमच्‍छ ) को मोक्ष दे दिया और प्रभु नाम के अंतिम अक्षर का उच्‍चारण पूरा हुआ उससे पहले श्रीगजेन्‍द्र जी का उद्धार हो चुका था और उनके समक्ष प्रभु साक्षात उपस्थित थे । प्रभु की करूणा देखें कि साधारण किताब पढने पर भी मुझे श्रीगजेन्‍द्र मोक्ष के पाठ का फल दे दिया ।

जब पुत्र बड़ा हुआ तो पुत्र को यह दृष्टान्त कई बार सुनाया । नया जन्‍म प्रभु की कृपा से मिला है और इस जीवन को अपना स्‍वर्धम ( अभी पढ़ाई, बाद में व्‍यापार ) करते हुये प्रभु सेवा में अर्पण करना ही इस जीवन का श्रेष्‍ठत्‍तम उपयोग होगा, ऐसा उसे समझाया । संपादक टिप्पणी - प्रभु कृपा से हमें जीवनदान मिला हो तो निश्‍चित रूप से जीवन का एक भाग प्रभु सेवा में समर्पित करना ही चाहिए । सच्‍चे मन से अगर हम ऐसा कर पाये तो प्रभु कृपा जीवन में बढ़ती ही चली जाती है ।

मेरे अपने जीवन में -
प्रभु की कृपा कहाँ तक गिनाऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक बताऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक दिखाऊ !

प्रभु का
संदीप रामनिवास कर्वा
जयपुर ( राजस्‍थान )
ईमेल- dyt.srk@gmail.com


नाम / Name : संदीप रामनिवास कर्वा
प्रकाशन तिथि / Published on : 10 अगस्‍त 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मैं, संदीप रामनिवास कर्वा उम्र 42 वर्ष, जयपुर (राजस्‍थान) निवासी रियल स्‍टेट के व्‍यवसाय में हूँ । भारत की दिव्‍यत्‍त्‍म आध्‍यात्‍म धरोहर ने मुझे गदगद कर दिया है । प्राचीन भारतीय ऋषियों, भक्‍तों और संतों के मार्गदर्शन से अभीभूत हूँ । भारतीय संस्कृति और विरासत मुझे बेहद प्रिय हैं और मुझे सर्वाधिक गर्व है भारतीय होने पर । मानव का तन और भारत में जन्‍म - यह बड़ा दुर्लभ संयोग होता है ( पर हम इस प्रभु कृपा को कोई तवज्‍जो नहीं देते ) । तीन वाक्‍य मुझे बेहद प्रिय हैं और मेरे जीवन का फलसफा इनमें छुपा है -
(1) If you go by the Will of GOD (अंतरआत्‍मा की आवाज )- the Will of GOD will always take you where the grace of GOD will be ready to protect you.
(2) Every thing in the world, every science in the world, every process in the world has its definite limitations, but GOD has absolutely no limitations. HE delivers freely by HIS free Will.
(3) If we are able to upkeep firmest of firm faith in GOD, HE never fails in our distress or even otherwise.
2 Real-life memoir by Mr Tribeni Prasad Agrawal titled DIVINE FLOWERS OFFERED TO LORD
Indexed as (1) PILGRIMAGE MEMOIR (2) RETIRED-LIFE MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows PRABHU KRIPA (GOD's kindness) during Pilgrimage. Lot of people who may have pleased GOD get divine experience during Pilgrimage. Here is one such experience. Also the memoir shows how goodness in life pleases GOD.

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DIVINE FLOWERS OFFERED TO LORD

I am giving below details of an astonishing incident which took place about 5 years back at Shri Sai Mandir, Sirdih. I had gone for darshan along with my wife. I remember firmly that it was 5 AM and it was the time for Mangla Aarti.

As a humble tribute, I purchased one flower bouquet to offer at the Holy feet of Shri Sai. I thought that I and my wife will together offer the floral tribute to our beloved Lord.

On entering the temple premises, I was told that there were two separate lanes for gents & ladies and each of us should go in the respective lane for darshan. Since I had purchased only one flower bouquet, I was perplexed and cursed myself for not having the foresight to purchase two floral tributes. Anyway, nothing could be done at that moment, so reluctantly I gave that flower bouquet to my wife and went empty handed in the separate lane for gents. I was repenting that I should have purchased two flower bouquets. If I have done so, I could also have offered one at the Holy feet of Shri Sai. Editor's Comment - If by a matter of chance, we are not able to do something for the ALMIGHTY but have a sincere inclination at heart for doing it, GOD Himself fulfills it. Because for GOD, the essence is not our gesture but our sentiments attached to it.

As if ALMIGHTY had instantly heard my sincere repent, and came forward to fulfill my wish. A person came from nowhere in the lane and gave one bouquet to me to offer and while I turned back to thank Him, He was gone. I could see nobody. Neither the people who were behind me in the queue remembered any person coming and giving me the flower bouquet. But the flower bouquet was in my hand.

I offered the flower bouquet to Shri Sai with full reverence.

I was overwhelmed & thrilled with the incident and told my wife of the miracle. Since then I always think of this incidence as ashirwad & blessing of Shri Sai. Editor's Comment - The sender of the memoir is actively involed in healing the needy peoples with free alternative medicines in his retired life. A noble work, is pleasing to GOD. The above experience at pilgrimage is 5 years old but the sender is giving selfless service to needy since last 14-15 years. Therefore it can be seen that his 10 years of selfless service was rewarded by the ALMIGHTY by his experience at Pilgrimage. After retirement, we must all remain active with ways that pleases GOD.

Jai Sai Ram.

Tribeni Prasad Agrawal
Gurgaon (Haryana)
Email- tpagrawal1937@yahoo.in


नाम / Name : Tribeni Prasad Agrawal
प्रकाशन तिथि / Published on : 17 August 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : I, Tribeni Prasad Agrawal aged 75 years is a B.Sc Eng (Mech). Retired from PSU and presently giving free medical service (Alternative medicines) to needy people. Basically I am an Engineer, worked in Steel Plants at Rourkela & Bokaro. Retired in 1998, came to Gurgaon to lead a Retreated active life at the age of sixty.
My interest was spiritual books, sadhana & medical sciences. So I studied Homeopathy,Accupressure, Megnetic Therapy and Reiki Healing (Grand Master now). I give free consultation on these alternative medicines to especially help needy people. I also teach meditation & ashnas to selected few. I keeps myself busy and by doing these, I also enjoy the hidden blessings of Satya Shri Sai Bhagwan.
3 Real-life memoir by Mr Sandeep R Karwa titled दाम्‍पत्‍य जीवन में प्रभु कृपा
Indexed as (1) MATRIMONY MEMOIR (2) GIRL-CHILD PARENTING MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) works in marriage . Whosoever is happy as a couple { it is PRABHU KRIPA (GOD's kindness) and they must try to retain it } . Whosoever is not happy as a couple must seek PRABHU KRIPA (GOD's kindness) . The personal example of the sender reflects both the happy situation & the ordinary situation. It was PRABHU KRIPA (GOD's kindness) which gave them so many happy years as a couple . One must not venture to loose PRABHU KRIPA (GOD's kindness), as done in the sender's case. The memoir only tries to reflect this viewpoint.

Editor's Request : You may email this memoir to anyone presently experiencing matrimony crisis in life and also to those who are upbringing/ parenting a girl-child for motivation. You may share this memoir directly via Email, Facebook, Twitter and various other social networks with the help of Share-Button available on the right vertical of this page.


दाम्‍पत्‍य जीवन में प्रभु कृपा

प्रभु की कृपा ही हमारे दाम्‍पत्‍य जीवन की अनुकूलता का कारण होती है । मेरे विवाह के लगभग 20 वर्ष होने को हैं । शादी के समय भावी पति एवं पत्‍नी के गुण मिलाये जाते हैं । हमारे भी मिलाये थे । मेरे ससुरजी को स्वयं ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान और अनुभव था । पर एक बात मैं बेहिचक कह सकता हूँ कि हमारे गुण ज्योतिष शास्त्र में मिलने पर भी जीवन में एक भी गुण कभी नहीं मिले थे । शादी हुई तब भी नहीं और आज भी नहीं । हम अलग होने हेतु पहले दिन से ही सबसे उपयुक्‍त दाम्‍पत्‍य थे । ( We were the fittest case for seperation from day one)

पर प्रभु की अनुकम्‍पा देखें की मेरे इष्‍टप्रभु के दरबार में जाकर विवाह के पूर्व सच्‍चे मन से आर्शीवाद लिया था । इसलिए इतना प्‍यार, इतनी अनुकूलता हमारे बीच विगत 15-16 वर्षो तक रही जिसकी तुलना मैं किसी भी समयकालीन अन्‍य सुखी दाम्‍पत्‍य से, यहाँ तक की प्रेम के अमर पात्रों से भी नहीं कर सकता । हमारा प्‍यार, तालमेल, अनुकूलता सबसे श्रेष्‍ठ थी । जितना प्‍यार एक पुरूष एक स्त्री को और एक स्त्री एक पुरूष को धरती पर कर सकते हैं, उतना प्‍यार प्रत्‍यक्ष हम दोनों ने एक दुसरे से किया और आज भी यह तथ्‍य बेहिचक हम दोनों स्‍वीकारते हैं । यह सिर्फ और सिर्फ प्रभु के उस आर्शीवाद का फल था और जो अनुकूलता थी वह सिर्फ और सिर्फ प्रभु कृपा के अलावा कुछ भी नहीं थी । इतना प्‍यार की विवाह की विदाई की बेला पर पत्‍नी के एक आंसू भी नहीं टपके । इतना प्‍यार की 8-9 वर्षो तक पत्‍नी पीहर ही नहीं गई । गुण एक भी नहीं मिलते थे - दोनों इस बात को जानते थे, अनुभव करते थे, पर प्‍यार इतना था जिसकी कोई सीमा ही नहीं थी । संपादक टिप्पणी - जीवन में जिसके भी दाम्‍पत्‍य सुख है, उन्‍हें साक्षात प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए और कृतज्ञता ज्ञापित करते हुये पति- पत्‍नी को नित्‍य साथ में और अलग से भी प्रभु सेवा, प्रभु भजन, प्रभु पूजन, तीर्थ, प्रभु कथा श्रवण, प्रभु नाम जप आदी में से जो भी अच्‍छा लगें, उन साधन / साधनों को करते रहना चाहिए । इन साधनों की उपेक्षा दाम्‍पत्‍य जीवन में कभी नहीं करनी चाहिए क्‍योंकि दाम्‍पत्‍य की धन्‍यता बनाये रखने का यही एकमात्र उपाय और साधन है ।

प्रभु की असीम कृपा मेरे उपर हुई कि प्रभु ने अपने तरफ आकर्षित करने हेतु जीवन में विपदायें भेजी । विपत्ति के कारण प्रभु में जो श्रद्धा और आस्‍था थी, वह बढने लगी । यह प्रभु की जीव पर सबसे बड़ी कृपा होती है जब प्रभु अनुकम्‍पा के कारण वह प्रभु की तरफ खिचता ही चला जाता है । जीवन में प्रभु की सेवा, पुजन और भजन बढने लगा । ऐसी कृपा की प्रभु ने की संसार से आसक्ति कम होने लगी ।

पति पत्‍नी के संबंध सदैव की तरह श्रेष्‍ठ बने हुये थे कि तभी एक एक करके 4 घटनायें घटी ।

पत्‍नी को पता था की मैं हर चीज में समझौता कर सकता हूँ पर प्रभु मेरे हैं इसलिए प्रभु के लिए एक कण और एक क्षण का भी समझौता नहीं कर सकता । मुझे गर्व है मेरे प्रभु की ऐसी अनुकम्‍पा पर जिससे ऐसी भावना मेरे अंदर पनप पाई । मैं प्रभु का ही हूँ, यह गर्व रखना शास्त्रोचित है (अन्‍य सभी अहंकार त्याज्य होते हैं पर मैं सिर्फ प्रभु का ही हूँ और प्रभु सिर्फ मेरे हैं, इस अहंकार को शास्त्रोचित माना गया है) ।

पहली घटना - एक तीर्थ पर हमारा परिवार एंव ससुराल का परिवार साथ था । ससुराल के एक सदस्‍य ने बात बात में कहा कि प्रभु की सेवा स्वयं हाथ से करें या किसी सेवक से करवाये, क्‍या फर्क पडता है- सेवा अच्‍छी हो तो सेवक से करवाने में भी क्‍या परहेज । पत्‍नी ने तुरंत उस बात का समर्थन कर दिया । उसके मन में भी ऐसी भावना दबी हुई है यह जानकर मुझे बहुत गहरा आघात लगा । हम बेटी को भी पराया करते हैं (ब्‍याह करते हैं) तो सब तरह से सौ बार सोचतें हैं । प्रभु सेवा दुसरे को सौप कर प्रभु को पराया करने की हम भावना अपने मन में ले आये और एक बार भी नहीं सोचा । जो सेवक होगा, उसके भी दो हाथ और दो पैर होगें, जो हमारे भी हैं । फिर हमारे में क्‍या कमी है की हमारी जगह हमारे प्रभु की सेवा और कोई करे । अगर प्रभु सेवा से भी ज्‍यादा, हमारे समय का हमें किसी अन्‍य प्रयोजन हेतु जरूरत है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य मानव जन्‍म लेकर और क्‍या हो सकता है ।

दुसरी घटना - प्रभु का नया मंदिर घर पर बन रहा था । जिस कमरे में मंदिर बन रहा था उस कमरे में खिडकियों का जोडा था, उनको मैं मंदिर में शामिल करना चाहता था । पत्‍नी अड गई । मंदिर के दरवाजे को मैं जिस दिशा में खोलना चाहता था, उससे हमारे बेडरूम के दरवाजे की कुछ व्‍यवस्‍था बिगडती थी । पत्‍नी फिर अड गई । मुझे बड़ा आघात लगा । मेरा पूरा हेतु मेरे ठाकुरजी की सुविधा का ध्‍यान रखना है, न की खुद की सुविधा को तवज्‍जो देना । मेरा काम मेरे ठाकुरजी की श्रेष्‍ठत्‍तम व्‍यवस्‍था करना है- अगर ऐसी श्रद्धा, आस्‍था और भावना नहीं होगी, तो कैसे बैकुंठ के ऐश्‍वर्य को छोडकर प्रभु हमारे घर के मंदिर में और फिर मन- मंदिर में आयेंगें ।

तीसरी घटना - ठाकुरजी के भोग में एक बार कांच का टुकडा आ गया । भोग की तैयारी पत्‍नी करती थी इसलिए आगे से भोग की सफाई, स्‍वच्‍छता हेतु दुगुने प्रयास की व्‍यवस्‍था लागु की । स्‍वच्‍छता हेतु दुगुने प्रयास की व्‍यवस्‍था से पत्‍नी चिढ गई और बोली कि एक बार कांच आ भी गया तो क्‍या हो गया । कांच आना मानवीय चुक था । गलती करना मानव का स्‍वभाव है पर मुझे आघात उस भावना के कारण लगा कि एक बार कांच आ भी गया तो क्‍या हो गया । मुझे लगा की मेरे प्रभु की श्रीजिव्‍हा कितनी कमलरूपी कोमल है । कांच का टुकडा हमारी गलती से प्रभु के श्रीजिव्‍हा को वेदना दे और हमारे रोंगटे भी खडे नहीं हो । अगर ऐसा नहीं होता है तो हम भोग सिर्फ मूर्ति को लगा रहे हैं, प्रभु को नहीं । प्रभु भोग के भीतर जाकर सिर्फ उसके भाव को ग्रहण करते हैं । संपादक टिप्पणी - हमें यह भी सोचना चाहिए कि एक बार प्रभु ने भी हमारी गाडी को पहाड से गिरते या अन्‍य विपदाओं, दुर्घटनाओ में हमें नहीं बचाया तो हमारा क्‍या हश्र होगा । प्रभु भी तो कह सकते हैं कि एक बार नहीं बचाया तो क्‍या हो गया ? परम दयालु, परम कृपालु परमपिता ऐसा कभी नहीं करते । दिन-रात हमें विपदाओं से, कठिन परिस्थिती से, प्रतिकूलता से बचाते रहते हैं ।

चौथी घटना - प्रभु की सेवा में परिश्रम और गुणवत्‍ता की कमी के कारण पत्‍नी ने बौखला कर कह दिया कि मैं मंदिर की सेवा नहीं करूगी । पत्‍नी ने मुझसे कहा की खुद 15 दिन आप अकेले ही सेवा करेंगें तो पता चल जायेगा । मुझे गहरा आघात लगा की प्रभु सेवा की गुणवत्‍ता बढाने की जगह वह सेवा छोडना चाहती है । मैं पत्‍नी को सदैव कहता था की घर कैसा भी अव्‍यवस्थित रखो, मुझे परवाह नहीं पर 8 x 7= 56 sq ft के मेरे हरि मंदिर को श्रेष्‍ठत्‍तम व्‍यवस्थित रखो । वह अपनी सेवा उठा नहीं पाई । मैं अपनी सेवा गिरा नहीं पाया । मेरी सिर्फ एक ही इच्‍छा थी की तन-मन-धन से श्रीहरि की सेवा हो । सच्‍चे तन-मन-धन से, न की आरती वाले "तन-मन-धन सब कुछ है तेरा" जो हम मात्र गान के लिए गाते हैं । मुझे खुद के लिए उस समय प्रभु कृपा के स्‍पष्‍ट दर्शन हुये । सम्‍पूर्ण प्रभु सेवा का इतना दुर्लभ मौका मेरे जीवन में उपस्थित हुआ । दोनों हाथों से मैंने प्रभु सेवा के मौके को पकड लिया । दो वर्ष पूर्व की यह घटना है । दो वर्ष से प्रभु की असीम अनुकम्‍पा का दर्शन रोजाना करता हूँ जब मेरे शरीर के अंग प्रभु सेवा में और मेरा मन प्रभु साधन में अर्पण हैं । साथ ही अपना स्वधर्म (व्‍यापार) भी चलता रहता है ।

चारों घटनाओं में मानवीय चुक का कोई मुद्दा नहीं है । प्रभु हेतु भावना में चुक, प्रभु हेतु भावना का पतन ही मुख्‍य बात है । संपादक टिप्पणी - प्रभु हेतु भवना का पतन होते ही अनुकूलता हमारा साथ छोड देती है । यह स्‍पष्‍ट सिद्धांत समझना चाहिए ।

पत्‍नी से रिश्ता अब बेहद सामान्‍य और साधारण है क्‍योंकि दाम्‍पत्‍य जीवन में जो अनुकूलता थी, वह प्रभु कृपा के कारण ही थी । संपादक टिप्पणी -वैवाहिक गुण नहीं मिलने पर भी प्रभु कृपा दाम्‍पत्‍य जीवन में वैसे ही काम करती है, जैसे प्रभु कृपा बिन पानी के नांव चला देती है । इसका साक्षात उदाहरण यहाँ देखने को मिलता है ।

पत्‍नी के प्रति मेरे मन में धन्‍यवाद के अलावा कोई अन्‍य भावना नहीं है क्‍योंकि उसके व्‍यवहार ने ही मेरे जीवन में प्रभु सेवा / प्रभु सानिध्य में बढ़ोत्री का मौका प्रस्‍तुत किया ।

मेरे अपने जीवन में -
प्रभु की कृपा कहाँ तक गिनाऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक बताऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक दिखाऊ !

प्रभु का
संदीप रामनिवास कर्वा
जयपुर ( राजस्‍थान )
ईमेल- dyt.srk@gmail.com

संपादक टिप्पणी -
(1) स्त्री को भारतीय संस्कृति में देवी स्‍वरूप माना गया है । एक व्याख्या है की जो स्त्री स्वयं को, अपने पति को, अपने परिवार को देव (प्रभु) से जोडे, वही देवी । भारत की परमपरा रही है कि स्त्री प्रभुकार्य (धर्माचरण) का दायित्‍व लेकर, इस हेतु परिवार में प्रेरणा बन कर ऐसे कार्य को बढाती रहती है । तीर्थ सेवन, प्रभु कथा, कर्मकाण्ड, दान पुण्‍य एवं अन्‍य धर्माचरण हेतु पति और परिवार को प्रेरित करती है । भारत की इस गौरवशाली परमपरा को अश्रुण बनाये रखने की जरूरत है । पुत्रीयों में ऐसे संस्‍कार के बीज प्रधानता से बोने चाहिए । इसका एक कारण यह भी है कि उनके भावी दाम्‍पत्‍य जीवन की अनुकूलता बढाने और प्रतिकूलता को समाप्‍त करने का साधन भी यही है ।

(2) हम पुत्रीयों को उच्‍च शिक्षा देकर कितना भी सक्षम क्‍यों न बना दें, पर अगर प्रभु सेवा, प्रभु भक्ति के संस्‍कार देना भुल गये तो हमारी भी अवस्‍था पूर्वी देशों जैसी हो जायेगी जहाँ तलाक और दुसरी-तीसरी शादीयां आम बात है । भारत में भी इस पूर्वी प्रचलन ने दस्‍तक दे दी है, पर भारत में पुत्रीयों के गौरवशाली बाल संस्‍कारों ने अभी हमें बचा रखा है । पुत्रीयों के इस बाल संस्‍कार का महत्‍व समझते हुये इसको अश्रुण बनाये रखने की आवश्‍यकता है । माता पिता का दायित्‍व निभाते हुये अगर हम पुत्रीयों में प्रभु सेवा, प्रभु भक्ति रूपी संस्‍कार का संचार कर देते हैं तो धर्मशास्त्रों में वर्णित सभी स्त्री गुण स्वतः ही धीरे धीरे उनमें विकशित होते चले जायेगें । क्‍योंकि एक सिद्धांत है - सभी सदगुणों के मूल में प्रभु हैं । एक सिद्धांत यह भी है - सभी सदगुण प्रभु की छाया मात्र है, प्रभु जहाँ होंगे यह सभी सदगुण अपने आप वहाँ पहुँच ही जायेंगें ।

(3) प्रभु धन, ऐश्‍वर्य जल्‍दी दे देते हैं - यह प्रभु के दर की मिट्टी है । मिट्टी देने में देरी नहीं होती । मोक्ष भी प्रयास करने पर प्रभु दे देते हैं । मोक्ष मुक्ति है । साधक भी मुक्‍त हो जाता है (और प्रभु भी साधक से मुक्‍त हो जाते हैं) । पर प्रभु से भक्ति का दान पाना बहुत दुर्लभ होता है क्‍योंकि भक्ति से प्रभु स्‍वयं बंध जाते (मैं भक्‍त के पराधीन हूँ - यह प्रभु का श्रीवचन है) । प्रभु को बांधने के लिए बहुत भक्तिभाव की जरूरत होती है फिर भी हमारी प्रेमडोर दो अंगुल छोटी ही पड जाती है (जैसे श्रीकृष्णावतार में उखल से बांधते वक्‍त माता यशोदा की पड गई थी) । जीव पर कृपा करते हुये प्रभु जब बंधना चाहते हैं तभी उस दो अंगुल छोटी प्रेमडोर की पूर्ति प्रभु स्‍वयं करतें हैं (श्रीकृष्णावतार में माता यशोदा प्रभु को नहीं बांध पाई, तो प्रभु ने स्‍वयं कहा कि - लाओ माँ, मैं बांधु और फिर बाललीला करते हुये प्रभु ने स्‍वयं को बाधा । यह दृश्य देखकर देवता रोमांचित होकर फुल बरसाने लगे) । इसलिए जिस घर में भी प्रभु सेवा, प्रभु भक्ति है, उसे किसी भी सुरत में अश्रुण बनाये रखना और बढ़ाना चाहिए । जिस घर में ऐसा नहीं है, वहाँ इसकी शुरूआत करनी चाहिए । स्त्री इसके लिए सबसे बड़ा योगदान दे सकती है और उन्‍हें अपने स्‍वयं के मंगल, अपने दाम्‍पत्‍य के मंगल और अपने बच्‍चों के मंगल के लिए ऐसा करना चाहिए ।



नाम / Name : संदीप रामनिवास कर्वा
प्रकाशन तिथि / Published on : 19 अगस्‍त 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मैं, संदीप रामनिवास कर्वा उम्र 42 वर्ष, जयपुर (राजस्‍थान) निवासी रियल स्‍टेट के व्‍यवसाय में हूँ । भारत की दिव्‍यत्‍त्‍म आध्‍यात्‍म धरोहर ने मुझे गदगद कर दिया है । प्राचीन भारतीय ऋषियों, भक्‍तों और संतों के मार्गदर्शन से अभीभूत हूँ । भारतीय संस्कृति और विरासत मुझे बेहद प्रिय हैं और मुझे सर्वाधिक गर्व है भारतीय होने पर । मानव का तन और भारत में जन्‍म - यह बड़ा दुर्लभ संयोग होता है ( पर हम इस प्रभु कृपा को कोई तवज्‍जो नहीं देते ) । तीन वाक्‍य मुझे बेहद प्रिय हैं और मेरे जीवन का फलसफा इनमें छुपा है -
(1) If you go by the Will of GOD (अंतरआत्‍मा की आवाज )- the Will of GOD will always take you where the grace of GOD will be ready to protect you.
(2) Every thing in the world, every science in the world, every process in the world has its definite limitations, but GOD has absolutely no limitations. HE delivers freely by HIS free Will.
(3) If we are able to upkeep firmest of firm faith in GOD, HE never fails in our distress or even otherwise.
4 Real-life memoir by Ms Manisha Belani titled A MIRACLE IN MY LIFE
Indexed as (1) MEDICAL MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) works during medical crisis. Whosoever seeks GOD's kindness during period of medical crisis is able to tide over the diffucult time successfully. The memoir tries to reflect this viewpoint.

Editor's Request : You may email this memoir to anyone presently experiencing medical crisis in life for motivation. You may share this memoir directly via Email, Facebook, Twitter and various other social networks with the help of Share-Button available on the right vertical of this page.


A Miracle In My Life

It was the end of Jan 2012, when I came back from work and rushed to my room. I was in a haste to reach out to my study table. I did not realize that room cleaning was going on. I slipped on the ground. Till to date, I remember I felt a terrible current & shiver in my body. My legs were apart and therefore, it took around five minutes for me to get up from the ground.

The fall had created an internal tremor, but I did not bother and I continued working, living a routine life. As time passed, on 20th Feb, 2012 my left leg started paining very badly. I could not even walk. I kept wondering what had happened suddenly. I applied balms & home remedy but to no avail. I had to drag my foot. Finally the pain was unbearable and I visited Doctor Srinivasan of Bangalore, as I stay in Bangalore.

Doctor Srinivasan is a reputed & experienced doctor and he immediately said that it is a lower back Slip Disc. Doctor asked me to go a Diagnostic & Scan Centre and to get MRI scan of lower back.

Knowing that I am in serious problem, I prayed and prayed to TIRUPATHI BALAJI to please cure me. I kept saying “I want to serve you ! LORD BALAJI”. Editor's comment - A true prayer to ALMIGHTY from the bottom of your heart at the very beginning of your problem is half the battle won. The other half battle is our test whether we are able to keep our trust intact in our LORD during crisis. If we able to do both, we surely come out as winner. There are umpteen examples of this in present times, one such example is this. The report was brought out by the Radiologist of the Diagnostic Center on 24th February, 2012.

Lower back Slip disc was confirmed by Doctor Srinivasan. What was an apprehension earlier, was now confirmed. Doctor said very clearly that 6 months rest was foremost & mandatory. Also Doctor Srinivasan was very candid that if things don’t improve by then, he would have to operate me and put a steel part in my body. After that when I move around I have to wear the belt continuously for many months. I could not afford such long leave from my office, as I knew I will lose my job.

I was in a terrible mental stress but the best thing I did was - I did not lose my faith in LORD BALAJI. At heart, I did not agree with the doctor that I would not be able to move about for 6 months and would require a surgery.

I just prayed and prayed, as I was on the bed, I kept saying “I know you LORD BALAJI, you have so many plans for me. I know that you are so kind and you change my fate, even if I was destined to lie on bed. I know my LORD BALAJI very well; my LORD you have always stood by me!”

I applied Kerala oil for back pain and I did hot water treatments, my left leg was fine in twenty days and started moving without pain. To my surprise I felt perfectly fine after 1 & ½ months of rest at home. It was my faith in my LORD which had cured me in so less a time when medical science had predicted a possible surgery & a long period of rest. Editor's comment - At the bottom of our heart, we must always make a habbit to give credit of everything good that unfolds in our life to ALMIGHTY GOD. For doing this we need to have devotional eyes to see HIS invisiable hand behind everything good that occurs.

I told my father to take me to Doctor Srinivasan. When I went and met the doctor, after his tests, he too was surprised and he said “You can go to work”.

I thanked my LORD TIRUPATHI BALAJI at that very moment as I knew HE had bestowed me with HIS kindness in my distress. I said “I am happy that you connect with my prayers ! LORD BALAJI, you are great and I will come soon to Tirumala to Thank You for being so very loving & caring and for always being so kind to me!”

Manisha Belani
Bengaluru
Email- mannbelani@gmail.com

Editor's Comments -
(1) Spiritually, there are three stage to a crisis, be it a medical crisis, family crisis, financial crisis or any crisis under the sky. At the beginning of the all crisis, we must seek GOD's kindness by real devotion / surrender to the ALMIGHTY. During the crisis, we must keep our firmest of firm faith in the LORD. At the end of it, after we come out as winners by the grace of GOD, we must thank HIM for his mercy. This memoir shows all the three stages.



नाम / Name : Manisha Belani
प्रकाशन तिथि / Published on : 23 अगस्‍त 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : I, Manisha Belani, 35 years, am working as Asst. Manager PR & Client Servicing in Flags Communications Pvt. Ltd. I am fun loving, bubbly and full of life. I love to write poems, also I love to sing and to dance. I believe humanity is the greatest gift we can give GOD.... Real Gratitude to the ALMIGHTY is in giving, that's the actual living!'
I live for Shree Krishna and I will work for Shree Krishna! As Shree Krishna is my lover & meaning of my life !!!!
I write poems based on SriMad Bhagwat Geeta & Vedanta, as it would inspire many. You can visit my poems on website - manisha677.poetrycraze. An excerpt on my poem on LORD BALAJI

Balaji God has a very soft heart,
He gives and gives and fills each one’s desire cart !

Balaji God has one hand towards himself,
He is waiting for devotees to surrender themselves !

Balaji God wants to hold our life throughout,
Filling it with blessings, joy & love,
Removing all the struggles mysteriously out !
5 Real-life memoir by Mr Roshan Gupta titled सच्चे ह्रदय से किसी की मदद के संकल्प को पूर्ण करते हैं प्रभु
Indexed as (1) HELPING-HAND MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) works during our effort to help or do good for others. If you get a inner call which leads us to help someone, we should consider ourself fortunate to be choosen by ALMIGHTY GOD for the job. Because we then become the medium for the invisible hands of ALMIGHTY at work.

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सच्चे ह्रदय से किसी की मदद के संकल्प को पूर्ण करते हैं प्रभु

बात करीब ७ वर्ष पहले की है । मेरी सबसे अच्छी दोस्त को एक पुस्तक की बहुत आवश्यकता थी, क्योंकि ७ दिनों के बाद उसकी परीक्षा थी । किसी कारणवश उसके लिये बाजार जाना संभव नही था, इसलिये उसने मुझे वह पुस्‍तक बाजार से लाकर देने का आग्रह दिया । उसने पहली बार मुझे कोई काम बताया था । कही ना कही मेरे मन में उसके लिए एकतरफा प्रेम छिपा था इसलिये मैं भी खुशी खुशी स्थानीय खजुरी बाजार किताब को लेने तत्काल चला गया । वहाँ जाकर ये पता चला कि वो किताब तो किसी भी दुकान पर उपलब्ध नही थी, २ घंटो में लगभग पुरा बाजार छान मारा । अब मन दुखी होने लगा था, थकान भी होने लगी थी । ७ दिनों के बाद उसकी परीक्षा और पहली बार मुझे कोई काम बताया था इसलिए मना करने की इच्छा भी नहीं हो रही थी । जब मैं किताब की खोज में आया था तो मन में निश्चय करके आया था की कहीं से भी हो, उसे किताब लाकर देना ही है । लगातार दुकानों में मनाही के बाद भी मन में प्रण किया था कि जाऊंगा तो किताब लेकर ही जाऊंगा । पर जितना भी मेरे से संभव था, सारे प्रयास कर लिये थे । लेकिन अंत में मुझे निराशा ही हाथ लगी ।

बहुत सोचने पर एक पुराने दोस्त का ध्यान आया क्योंकि उसने कभी बताया था कि वो उसी बाजार में काम करता है । लेकिन उससे तो मिले ही सालों हो गये थे और उसका कुछ अता-पता भी मुझे नहीं था । उसे खोजने का कोई उपाय नहीं था, इसलिए उसे खोजने मेरे लिए संभव ही नहीं था । कोई विकल्‍प नहीं बचा है, यह जानकर मेरे मन में अब निराशा हावी होने लगी थी । तभी अचानक क्या देखता हुँ कि वही पुराना दोस्त सामने से चला आ रहा है, उसे देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया ओर उसे एकटक देखने लगा । अभी उसके बारे में सोच ही रहा था की वह एकदम मेरे सामने आ गया इसलिए मेरे आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी और इस कारण मेरे मुँह से शब्द भी नहीं निकले । तब वो खुद ही मेरे पास आया और बोला “ क्या हालचाल है, कोई काम हो तो बताना ” । संपादक टिप्पणी - एक सिद्धांत है कि जब प्रभु इच्‍छा करते हैं, तो प्रभु की मदद या तो किसी रूप में हमारे समक्ष पहुँच जाती है या फिर हम कैसे भी मदद तक पहुँच जाते हैं । दोनों में से एक काम होकर रहता है । इस सिद्धांत पर पूर्ण विश्‍वास होना चाहिए । मैने उसे उस किताब के बारे में बताया । वो मुझे एकदम सामने वाली दुकान पर ले गया ओर दुकानवाले से बोला “ये मेरा दोस्त है, इसे इस किताब की जरूरत है ”। दुकानवाले ने दो मिनट में वो किताब निकालकर दे दी । मैनें २ घंटो में लगभग पुरा बाजार छान मारा था, कोई भी दुकान बाकी नहीं छोडी थी, इसलिए मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था की किताब इतनी तत्काल कैसे मिल गई । संपादक टिप्पणी - प्रेषक के अनुभव से स्‍पष्‍ट है कि उस दुकान में वह किताब उपलब्‍ध नहीं थी । पर प्रेषक के मन में मदद करने का सच्‍चा संकल्‍प था जिसकी पूर्ति हेतु प्रभु ने ऐसी व्‍यवस्‍था करवा दी ।

मैनें उस दोस्त को धन्यवाद देना चाहा और पीछे घुमा तो देखता हुँ कि वो तो वहाँ है ही नहीं । मैंने उसे आस पास सब जगह ढूंढा पर वह नहीं मिला । बाद में मुझे समझ आ गया कि वो मेरा दोस्त नहीं था, उसके रूप में भगवान ने प्रत्यक्ष मदद भेजी थी । जब भी हम सच्चे ह्रदय से किसी की मदद की बीडा उठाते हैं, भगवान हमारी सहायता करके उस नेक कार्य की पूर्ति करते हैं । इस घटना के पहले भगवान में बहुत कम विश्वास था लेकिन उस दिन जो चमत्कार देखा, साक्षात प्रभु कृपा को महसूस किया ।

रोशन गुप्‍ता
इन्‍दौर
Email- roshan_gupta1@rediffmail.com

Editor's Comments -
(1) हमारे जीवन में नेकी करने के मौके प्रभु कृपा से उपलब्‍ध होते हैं । इसलिए ऐसे मौके हमें जीवन में कभी चुकना नहीं चाहिए । नेक बंदे और नेकी का कार्य प्रभु को प्रिय होते हैं । इसलिए जीवन में की हुई नेकी हमेशा फलती है क्‍योंकि उसके प्रसाद रूप में पूण्‍य-फल प्रभु हमें देते हैं ।



नाम / Name : Roshan Gupta
प्रकाशन तिथि / Published on : 24 अगस्‍त 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : I, Roshan Gupta, 29 years, am working as a academic counsellor in a private institute in Indore.
Talking to young persons, listening to thier diffuculties and giving them practical solutions is my work as well as hobby.
My life's objective is very different. It is helping others in fulfilling or achieving their life's objective without any expectations from them. This is also my passion.
I take this a an indirect worship of ALMIGHTY GOD as HE is within me and within everyone.
6 Real-life memoir by Mr Sandip R Karwa titled प्रभु कृपा से एक परिर्वतन
Indexed as (1) CONFESSION MEMOIR (2) MATRIMONY MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir is a confession memoir. The sender has confessions in life, as everyone would have, but the courage to speak out is only due to PRABHU KRIPA (GOD's kindness). We all make blunders in life and hide it under the carpet and forget it. In the Holy test of the Christians, lot of emphasis is given to confession. Nothing is hidden from ALMIGHTY GOD, not even our thoughts which had even not come up on our lips. This memoir, which is a confession, qualifies for this section because it also shows a total U-turn (from hiring a cocotte to celibacy) which was only possible because of PRABHU KRIPA (GOD's kindness).

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प्रभु कृपा से एक परिर्वतन

अपनी गलती का सच्‍चा पश्चाताप उसे छुपाने में नहीं बल्कि उसे सबको बताने में होता है । छिपाने का कोई कारण नहीं रह जाता क्‍योंकि परमपिता परमेश्‍वर से तो कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता । जब प्रभु को सब कुछ ज्ञातव्‍य है तो बाकि किसी से छुपाने का कोई हेतु या कारण नहीं बचता । गलत कार्य छुपाना ही है तो प्रभु से छुपाना चाहिए और प्रभु से छुपाने का एक ही उपाय है कि वह गलत कार्य किया ही न जाये ।

नारी में आर्कषण और कामुकता मुझे प्रिय थी । यही कारण था कि एक गलत संगति के कारण विवाह पूर्व 3 बार मैंने वैश्‍यागमन भी किया । यह नैतिकता का पतन था जो उस समय जवानी के मौज एंव अति सम्‍पन्‍न लोगों के शौक पूर्ति के रूप में सामान्‍य बात मुझे लगी थी ।

विवाह के बाद पत्‍नी से प्रेम इतना हुआ एवं पूर्ण एकनिष्‍ठा थी इसलिए विवाह के बाद कभी भी कोई गलत कार्य नहीं हुआ । यह प्रभु कृपा ही होती है कि पति का मन पत्‍नी में रम जायेगा और कही अन्यत्र नहीं भटके । संपादक टिप्पणी - जहाँ ऐसा है वहाँ पत्‍नी को इसे प्रभु कृपा प्रसादी माननी चाहिए और जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ पत्‍नी को प्रभु के श्रीकमलचरणों में अनन्यता से ऐसी अरदास नित्‍य करते रहना चाहिए ।

जब प्रभु में भक्ति बढने लगी तो यह किया हुआ गलत कृत्य मुझे वेदना देने लगा । विवाह के 10 वर्षों तक जो बात कभी मन में भी नहीं आई थी एंव जिसके प्रति लेशमात्र ध्‍यान भी कभी नहीं जाता था और जो गलत प्रतीत ही नहीं होती थी, वही बात अब वेदना देने लगी । मन कहने लगा कि पत्‍नी को यह गलती बतानी चाहिए, तभी बोझ हल्‍का होगा एंव सच्‍चा प्रायश्चित होगा । संपादक टिप्पणी - एक तथ्य यहाँ स्‍पष्‍ट होता है कि प्रभु भक्ति कैसे आत्‍म शुद्धि करती है । दुसरा विचार आया कि यह विवाह पूर्व का कृत्य है, विवाह के बाद पूर्ण एकनिष्‍ठा है, कभी भी कही भी कोई चुक नहीं हुई है तो फिर उसे बता कर अपने पैर पर कुल्‍हाडी क्‍यों मारी जाये । कही पत्‍नी से मधुर रिश्ते बिगड न जायें । बात पुरानी है, अभी तक किसी को भी पता नहीं है, आगे पता लगने की कोई संभावना भी नहीं है ।

पर प्रभु भक्ति की शक्ति देखें की इन दो भावो ने पूरी बात ही समाप्‍त कर दी - पहला भाव आया, जब प्रभु को पता है तो अन्‍य किसी से भी छुपाने का कोई औचत्‍य नहीं बचता । गलत कृत्य का डर, शर्मिंदगी, जवाबदेही प्रभु के समक्ष होनी चाहिए और प्रभु से माफी तभी मिलती है जब सच्‍चा प्रश्चाताप हो । सच्‍चा प्रश्चाताप क्‍या है - गलत कृत्य को गलती के रूप में स्‍वीकार किया जाये एंव गलती जीवन में नहीं दौहराने का पूर्ण संकल्‍प हो । दुसरा भाव आया, पति-पत्‍नी के रिश्ते की मधुरता प्रभु कृपा से ही होती है । प्रभु की कृपा रहेगी तो कुछ भी बताने के बाद भी मधुरता जस-की-तस बनी रहेगी ।

काफी कशमकश के बाद प्रभु प्रेरणा हुई और प्रभु कृपा के कारण इतना आत्‍मबल उदित हुआ की पत्‍नी को ऐकान्‍त में यह रहस्‍य बताया । प्रभु की कृपा स्‍पष्‍ट दिखी एंव हम दोनों पति-पत्‍नी हाथ में हाथ पकडे रोते रहे । पत्‍नी गदगद थी प्रेम में (प्रभु ने उसके मन में मेरे लिए सम्‍मान और प्रेम बहुत बढा दिया था) । मैं गदगद था कि मेरे प्रश्चाताप को करूणानिधान प्रभु ने स्‍वीकार कर लिया ।

उसके बाद के 6-7 वर्ष बहुत ही मधुर संबंध के थे । विवाह के बाद के सर्वोत्‍तम वर्ष यही थे । इसमें परिपक्‍व प्रेम था । परिवक्‍व प्रेम के बडे शिखर को जैसे हमने छू लिया । यह मात्र और मात्र प्रभु की अदभुत कृपा थी, प्रभु के श्रीकमलचरणों में सच्‍चे प्रश्चाताप का मीठा फल था ।

मेरी प्रभु भक्ति बढने लगी थी । हम पति-पत्‍नी नित्‍य प्रभु सेवा करते थे, प्रभु पूजन, प्रभु भजन आदी नित्‍य होते थे । सब ठीक चल रहा था, तभी एक एक करके चार घटनायें जीवन में घटी (इसका विवरण "प्रभु कृपा के दर्शन" स्‍तम्‍भ के क्रमांक 3 पर "दाम्‍पत्‍य जीवन में प्रभु कृपा" नामक आलेख में मिलेगा) ।

पत्‍नी ने प्रभु सेवा छोडी और उसके स्‍वभाव में परिवर्तन आना शुरू हुआ । उसने सामने बोलना शुरू किया, अपमान करना शुरू किया और पूर्णतः अमर्यादित शब्‍दों का प्रयोग करने लगी । संपादक टिप्पणी - अपनो की वाणी कितना आघात, कितनी वेदना दे सकती है यह प्रत्‍यक्ष अनुभव करने पर पता चलता है । संसार के बडे से बडे घाव तलवार से नहीं अपितु वाणी से हुये हैं, यह तथ्य तभी समझ में आता है । इतना समझने पर आगे की बात समझ में आती है जो श्रीमद भगवतगीता जी में मेरे प्रभु के श्रीवचनों में देवीगुण के तहत "अहिंसा" और उसमें "वाणी की अहिंसा" के रूप में मेरे प्रभु द्वारा उद्घोषित की गई है । मेरे प्रभु द्वारा मानव कल्‍याण हेतु जो सूत्र बताये गये हैं उसका आज यर्थाथ में कितना बड़ा महत्‍व है, यह स्‍पष्‍ट प्रतीत होता है ।

मुझे पता था कि हमारी अनुकूलता मात्र और मात्र प्रभु कृपा के बल पर ही थी क्‍योंकि शुरू से ही व्यावहारिक रूप से में हमारे एक भी गुण कभी नहीं मिलते थे । पत्‍नी ने प्रभु सेवा छोडी, अनुकूलता हटी और हमारे रिस्‍ते में इतना पतन हुआ की पत्‍नी ने मेरे उपर हाथ उठा लिया ।

यह संकेत था कि पलको पर मैंने पत्‍नी को बैठा रख था, वह गलत था । अब वह स्वतः ही वहाँ से उतर चुकी थी । भक्ति जल से पलको का शुद्धिकरण करके अब सदैव के लिए सिर्फ और सिर्फ प्रभु को वहाँ विराजमान किया ।

पत्‍नी द्वारा वेदना पहुँचाने का दुःख भी इस तरह जाता रहा । कामुकता के कारण पति अपनी पत्‍नी की वेदना को भी सहता है । प्रभु ने इतनी कृपा कर दी की जीवन से कामुकता का ही क्षय हो गया । प्रभु के चौखट पर सच्‍चा प्रश्चाताप का फल था कि नैतिकता का पतन फिर मेरे प्रभु ने कभी नहीं होने दिया । काम वासना के कारण मन कभी भी (पत्‍नी से प्रतिकूलता के बाद भी) अन्यत्र नहीं भटका । इन्‍टरनेट पर कामुकता के इतने साधन उपलब्‍ध हैं पर इन्‍टरनेट का व्‍यापार में इस्‍तेमाल करते हुये भी कभी हाथ ने गलत शब्‍द या माउस ने गलत साईट को क्लिक नहीं किया । संपादक टिप्पणी - इसे प्रभु की असीम असीम कृपा माननी चाहिए, नहीं तो पारिवारिक प्रतिकूलता के कारण व्‍यक्ति अवसाद में चला जाता है या गलत दिशा में मुड जाता है ।

भक्‍तराज श्री नरसी मेहताजी का एक भजन "वैष्णव जन तो तेने कहिये " (जो राष्‍टपिता बापु का प्रिय भजन है) की एक पंक्ति "परस्त्री जैने मात रे" ने मुझे बहुत प्रभावित किया । सच्‍चा वैष्णव (भक्‍त) वही जो परस्त्री को माता के रूप में देखें ।

मर्यादा पुरषोत्‍तम मेरे प्रभु श्रीराम जी का जीवन मेरे लिए परम और पुनित आर्दश है । प्रभु का एकपत्‍नीव्रत और अन्‍य सभी स्त्री को मातृशक्ति के रूप में देखने का परम आर्दश मेरे प्रभु ने स्‍थापित किया वह मेरे लिए प्रेरणापुंज है ।

पत्‍नी के जिस शरीर ने प्रभु की सेवा छोडी, उस शरीर के साथ संबंध रखने का कोइ मतलब नहीं रहता । इसलिए ब्रह्मचर्य व्रत का एक पुष्‍प मैं अपने प्रभु को अपर्ण करू - ऐसा मौका प्रभु प्रेरणा से जीवन में उपस्थित हो गया । प्रभु ने यह ब्रह्मचर्यरूपी पुष्‍प स्‍वीकार कर लिया । संपादक टिप्पणी - प्रभु की असीम कृपा देखे की एक कामपरायण व्‍यक्ति जिसने अपने जीवन में वैश्‍यागमन भी किया, प्रभु ने उस व्‍यक्ति को स्‍वेच्‍छा से ब्रह्मचर्य लेने जितना सार्मथ्यवान बना दिया । यह कोई मजबुरी में लिया ब्रह्मचर्य नहीं है । पत्‍नी सब तरह से आज भी वैवाहिक जीवन की अनुकूलता वापस पाने के लिए प्रयासरत है ।

मेरे मन में भी पत्‍नी के प्रति कोई क्षोभ नहीं है । बच्‍चों और कर्मचारियों के बीच पत्‍नी से भयंकर अपमानित होने पर भी कोई द्वेष या बदले की भावना नहीं है (यह भी असीम प्रभु कृपा है क्‍योंकि 4-5 वर्ष पूर्व तक मेरा भंयकर क्रोधमय स्‍वभाव था । पता नहीं क्रोध में मैं क्‍या कदम उठा लेता क्‍योंकि क्रोध व्‍यक्ति को अंधा कर देता है और उसकी विवेक की आंखे बंद हो जाती हैं । पर प्रभु भक्ति ने क्रोध का भी क्षय कर दिया) । पत्‍नी के प्रति हार्दिक धन्‍यवाद की भावना के अलावा कोई प्रतिकूल भावना नहीं है, धन्‍यवाद इसलिए क्‍योंकि उसके इस व्‍यवहार के कारण ही मेरे जीवन का ब्रह्मचर्य रूपी एक दुर्लभ पुष्‍प मैं मेरे प्रभु के श्रीकमल चरणों में अर्पण कर पाया । ब्रह्मचर्य रूपी पुष्‍प प्रभु को अर्पण करने में 4 वर्ष लगे क्‍योंकि 4 वर्षो तक प्रयास के बाद भी सफल नहीं हो पाया । फिर प्रभु की कृपा हुई और 01 जनवरी 2017 से पूर्ण ब्रह्मचर्य लेना संभव हो पाया ।

मेरे अपने जीवन में -
प्रभु की कृपा कहाँ तक गिनाऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक बताऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक दिखाऊ !

प्रभु का
संदीप रामनिवास कर्वा
जयपुर ( राजस्‍थान )
ईमेल- dyt.srk@gmail.com


नाम / Name : संदीप रामनिवास कर्वा
प्रकाशन तिथि / Published on : 27 अगस्‍त 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मैं, संदीप रामनिवास कर्वा उम्र 42 वर्ष, जयपुर (राजस्‍थान) निवासी रियल स्‍टेट के व्‍यवसाय में हूँ । भारत की दिव्‍यत्‍त्‍म आध्‍यात्‍म धरोहर ने मुझे गदगद कर दिया है । प्राचीन भारतीय ऋषियों, भक्‍तों और संतों के मार्गदर्शन से अभीभूत हूँ । भारतीय संस्कृति और विरासत मुझे बेहद प्रिय हैं और मुझे सर्वाधिक गर्व है भारतीय होने पर । मानव का तन और भारत में जन्‍म - यह बड़ा दुर्लभ संयोग होता है ( पर हम इस प्रभु कृपा को कोई तवज्‍जो नहीं देते ) । तीन वाक्‍य मुझे बेहद प्रिय हैं और मेरे जीवन का फलसफा इनमें छुपा है -
(1) If you go by the Will of GOD (अंतरआत्‍मा की आवाज )- the Will of GOD will always take you where the grace of GOD will be ready to protect you.
(2) Every thing in the world, every science in the world, every process in the world has its definite limitations, but GOD has absolutely no limitations. HE delivers freely by HIS free Will.
(3) If we are able to upkeep firmest of firm faith in GOD, HE never fails in our distress or even otherwise.
7 Real-life memoir by Mrs Prema VasantRao Rashatwar titled एक सुखद अनुभव
Indexed as (1) HELPING-HAND MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) helps us, when we undertake to work for the cause of ALMIGHTY GOD. If we selflessly do so, we get divine help all the way in our endeavour. Because it is GOD's work and therefore the invisible hands of ALMIGHTY GOD is always on our side to protect us, help us and to lead us to our goal.

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एक सुखद अनुभव

दिसम्बर 2008 की बात है । हर शनिवार को मैं नियमित रूप से बाल संस्कार की 1 घंटे की कक्षा नगर परिषद विद्यालय, यवतमाल में लेती हूँ । बाल संस्कार के कार्य से जुडने के कारण मुझे ऐसी अनुभूति होती है मानो मेरे प्राण, मन और इंद्रिया नित्य श्री बालकृष्ण जी से जुडे रहते हैं । संपादक टिप्पणी - प्रभु के कार्य में तन-मन से जुडने पर ही ऐसी अनुभूति जगती है, फिर प्रभु कृपा अदृश्य रूप से हमारे साथ रहती है । यह तथ्‍य इस प्रसंग में आगे देखने को मिलेगा ।

किसी कारणवश दो शनिवार से मैं बाल संस्कार की कक्षा नहीं ले पाई, इस कारण मन व्याकुल था । पर ज्यादा चिंता इस बात की थी कि आज भी किसी कारणवश मैं कोई तैयारी नहीं कर पाई हूँ । कक्षा में पढाने के लिए नया कुछ पढ कर तैयार नहीं किया था । दो बार की चुक हो चुकी थी इसलिए आज कक्षा लेने की इच्छा तो जरूर थी, पर आज कुछ नया नहीं बोल पाउगीं - इस बात का दुःख और पछतावा था । मैंने प्रभु का स्‍मरण किया और मेरे मन में ऐसा संकल्प उठा कि आज तो प्रभु आपको ही प्रत्यक्ष नैया पार लगानी है ।

हमेशा की तरह मैंने कक्षा में मंगलाचरण, प्रातःस्‍मरण से शुरू किया और कक्षा के अंत में धन्याष्टकम तक कैसे पहुँच गई, पता ही नहीं चला । सबसे बड़ा आश्चर्य तो अभी बाकि था । जो आज तक कभी नहीं हुआ वह दृश्य मैंनें देखा कि विश्रामग्रह से निकल कर अन्य सभी गुरूजन, स्कुल के कर्मचारी मेरी कक्षा के बाहर खडे थे और मेरा व्याख्यान बडे गौर से सुन रहे थे और आश्चर्य से मुझे देख रहे थे । मैंने क्या बोला वह मुझे भी पता नहीं था पर वे आश्चर्य व्‍यक्त‍ कर रहे थे कि मैनें इतना सुन्दर व्याख्यान कैसे दे दिया । बालक, बालिकायें भी अवाक थे और एकाग्रचित होकर सुन रहे थे ।

विद्यालय से निकल कर मैं धीरे-धीरे घर की ओर चलने लगी । चलते समय सोचने लगी कि आज मैंनें ऐसा क्या पढ़ा दिया जिसको सुनने के लिए स्कुल के सभी गुरूजन, कर्मचारी मेरी कक्षा की ओर खीचे चले आये ।

फिर याद आया की मैंनें प्रभु का आश्रय लिया था, आज प्रभु की वाणी ही मेरे मुंह से स्वतः निकल रही थी । संपादक टिप्पणी - किसी प्रतिकुल परिस्थिती में सच्‍चे मन से लिया प्रभु का आश्रय, उस परिस्थिती को तत्‍काल अनुकूल कर देती है । "प्रभु का आश्रय" को अनुकूलता का पर्यायवाची मानना चाहिए । जब घर पहुँची तो सब चकित थे, मेरे नत्रों से अश्रुधरा बह चली थी, जो रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी ।

अपने आप को बहुत भाग्यशाली मान रही थी कि प्रभु कृपा मेरे साथ है क्यों कि मैं श्री बालकृष्ण जी के कार्य से जुडी हुई हूँ । प्राणों के अंतिम श्वास तक श्रीकृष्ण सेवा में जुडी रहना चाहती हूँ । सदगुरूजी ने ऐसी प्रेरणा जो दी है ।

प्रेमा वसंतराव रसहतवर
यवतमाल (महाराष्‍ट)
Email- pvryavatmal@gmail.com

Editor's Comments -
(1) जब भी जीवन में प्रभु कार्य से जुडने का मौका आये, तो इसे प्रभु द्वारा भेजा अवसर मानकर कभी चुकना नहीं चाहिए । समय और संसाधन की परवाह किये बिना प्रभु कार्य से तत्‍काल जुडना चाहिये । सच्‍चे उद्देश्य और सच्‍चे मन से जुडने पर समय और संसाधन की किसी भी प्रतिकुलता को अनुकूलता में बदलते देर नहीं लगती । प्रतिकुलता को अनुकूलता में बदलने की प्रभु कृपा जब होने लगती है तो वह प्रभु कार्य तक ही सीमित नहीं रहती अपितु हमारे जीवन के हर फुल में प्रभु कृपा के कारण अनुकूलता का रंग भरने लगता है ।



नाम / Name : Mrs Prema VasantRao Rashatwar
प्रकाशन तिथि / Published on : 15 सितम्‍बर 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : I, Prema VasantRao Rashatwar, 59 years, have done my M.A in Eco with Music. I have a liking for spiritual activities since childhood. I like singing "Bhajana". I play role in devotional drama.
My life's objective is to work with "Geeta Parivaar" and to do the work of "Bal-sanskar" for the young ones.
Two books containing my collection of poems has been published.
8 Real-life memoir by Mr Sandeep R Karwa titled बचपन में अर्जित प्रभु कृपा का परिणाम
Indexed as CHILD PARENTING MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) refines & purifies the heart and mind of young ones, if they are brought closer to the ALMIGHTY LORD during childhood. The power to restrain oneself from indulding in wrong doings is only possible with devotion towards ALMIGHTY. This is because the goodness of ALMIGHTY GOD sows the seed of goodness in us which redefines the ideology of our life for doing 'rights' and avoiding 'wrongs' in our life. This fact is reflected in this memoir.

Editor's Request : You may email this memoir to anyone who are upbringing/ parenting a child for motivation. You may share this memoir directly via Email, Facebook, Twitter and various other social networks with the help of Share-Button available on the right vertical of this page.


बचपन में अर्जित प्रभु कृपा का परिणाम

एक पुत्र है देवयुक्‍त, जो अभी 9 वर्ष का है एवं कक्षा 3 में पढ रहा है । महिने भर पहले की घटना है । स्‍कुल की परीक्षा चल रही थी । एक दिन परीक्षा के बाद वह घर पर बड़ी प्रसन्‍न मुद्रा में आया और बिना किसी से कुछ कहे सीधे मन्दिर में गया । प्रभु के दर्शन करने के प्रश्चात उसने जो बताया उससे मैं गदगद हो गया । मैनें तुरंत उसके प्रधानाचार्य को अंग्रजी में एक पत्र लिखा (क्‍योंकि अंग्रजी माध्‍यम का स्‍कुल है) । पत्र का मूल यहाँ दे रहा हूँ क्‍योंकि पूरी घटना का ब्‍योरा पत्र में मिलेगा ।

Respected Madam,
Namaskaar !

I have something good to share with you. The Principal of a school would be delighted to see the moral values in their student.

Devyukta, a student of Class III B had told me the following. I am writing this letter (a) to check its authencity with you (b) if found true, to appraise you of the same.

Devyukta came very happy from school on 16th Aug after giving the English Literarure exam . He went to our Mandir at home and then told me that " today I had a good paper. I only left 3 small things (costing me 3 marks) and completed the rest satisfactorily. One out of the three which I left, a word meaning (Flit- To move quickly) of Chapter 3 (Little Musician) was known me but I was not able to recall . While I was trying to recall, my eyes unintentionally feel on my neighbour’s answer sheet and on seeing the answer I could immediately recall and therefore I wrote the same. "

Devyukta is taught to complete his answer sheet with a prayer to ALMIGHTY GOD (before handing the sheet to teacher). While he did so he felt that he had done something wrong. He knew what he had done wrong. He immediately took out his eraser and wiped the answer he had written for the word "Flit".

I petted him on his back and asked him- Why ? He said that "my inner voice told me that you can gain one number here in the exam but you will loose a big number in the eye’s of ALMIGHTY GOD. " I was truly thrilled with what he said.

You will kindly recall that even at cost of studies ( what time we give to GOD is more than & aptly compensated by the long hands of the ALMIGHTY GOD ), I take Devyukta with me every shrawan month of Hindu calendar to SwargAshram for Maas Katha. There he had heard HOLY RAMAYANA JI Katha in full details .

We would recall that in older times, Spiritualism was a subject of study and in modern times, moral science used to be a compulsory classroom subject till sometimes back.

Victory over bad things is only be possible when our inner self restrains us from indulging in it. Today due to lack of real devotion towards GOD, we have suppressed or may have even killed our inner voice.

But this small kid had thrilled me with what he did. As it is, character building is foremost part in a academic carrer. Therefore I believe it is utmost necessary to go towards Spiritualism which I do for my ward.

But I need to check the credentials of Devyukta’s narration as said to me and as narrated by me hereinabove. May I therefore request you to kindly see his answer paper of English Literature (and the Word meaning- Flit ) holding it in proper light so as you are able to judge his pencil writing for the answer he had written and thereafter his process of erasing it.

I will be obliged to hear from you so that I am confirmed that what he said to me was right. I believe his words but I want to recheck, since he is only a child of 9 years.

GOD's sincerely
Sandeep R Karwa

तीन दिन बाद, सभी परीक्षायें पूरी होने पर, प्रधानाचार्य का मेरे पास फोन आया की मैनें खुद देवयुक्‍त के पेपर को मंगवा कर देखा है । उसने उक्‍त उत्‍तर को लिखकर फिर मिटाया है । उन्‍होंने आगे कहा कि मुझे हार्दिक प्रसन्‍नता है यह बताते हुये की एक 9 वर्ष के नन्‍हे बच्‍चे ने अपनी अंतरआत्‍मा से प्ररित होकर ऐसा किया है । फोन रखते ही मेरे कदम सीधे मंदीर की तरफ दौडे - मेरे प्रभु को धन्‍यवाद ज्ञापित करने, जिनकी अनुकम्‍पा से ऐसा हो पाया है ।

आज के युग में बच्‍चे अगर किसी सहपाठी का देखकर कुछ लिख आते हैं और घर पर आकर बेहिचक माता- पिता को गर्व से बता भी देते हैं की मैनें ऐसा किया है । और आज के माता- पिता भी इसे अन्‍यथा नहीं लेते - ऐसा देवयुक्‍त की एक अध्‍यापिका ने मुझे पेरेन्‍ट मिटींग के दौरान बताया ।

इस पूरे वाक्‍ये को मैं एक महिने के श्रीराम प्रभु की कथा से जोडकर देखता हूँ जो देवयुक्‍त ने मेरे साथ 2 वर्ष पूर्व स्‍वर्गाश्रम में सुनी थी । तब स्‍कुल से एक महिने की छुट्टी करवाकर मैं उसे अपने साथ ले गया था जिसका परिवार में, स्‍कुल में सभी जगह विरोध हुआ था । पर मैनें किसी की नहीं सुनी क्‍योंकि मुझे पता था की मैं क्‍या तुच्छ चीज खो रहा हूँ और उसके एवज में क्‍या अनमोल चीज पा रहा हूँ । कथा के दौरान वह अपना स्‍वधर्म (पढाई) भी कर रहा था जिसके कारण लौटने पर हुये परीक्षा में उसे 92 प्रतिशत अंक मिलें थे । संपादक टिप्पणी - एक सिद्धांत है की सच्‍चाई से प्रभु के लिए जो भी हम तन से, मन से, धन से खर्च करते हैं, व्‍यय करते हैं उसकी चौतरफा भरपाई स्वतः ही हो जाती है ।

बचपन में अगर प्रभु श्रीरामचंद्र जी हमारे जीवन के आदर्श बन जायें तो धर्म आचरण का एक ऐसा पट्टा हमारी आँखों पर लग जाता है, ठीक उस घोडे की तरह जिसके दायें-बायें न देखने का पट्टा लगाकर उसे सडक पर लाया जाता है जिससे वह सीधा देखें और सही चलें । मर्यादा पुरूषोत्‍तम प्रभु श्रीरामजी से बड़ा आदर्श पूरे विश्‍व पटल पर न कभी था, न आज है और न ही आगे कभी होगा । संपादक टिप्पणी - प्रभु ने अपने मर्यादा अवतार में जो कर दिखाया है उससे आगे की परिकल्‍पना करना भी संभव नहीं है । एक पुत्र के रूप में (श्री दशरथजी कैकयीजी की आज्ञापालना), एक भाई के रूप में ( श्रीभरतजी श्रीलक्ष्‍मणजी के साथ आत्‍मीयता), एक मित्र के रूप में (श्रीसुग्रीव एवं श्रीविभीषण के साथ मित्रता की मर्यादा), एक शत्रु के रूप में (रावण से द्वेष न कर उसके अवगुणों हेतु दण्डित करना), एक राजा के रूप में (रामराज्‍य का आदर्श अनुशासन) - इससे आगे की परिकल्‍पना करना पूर्णता असं‍भव है । क्‍योंकि प्रभु श्रीरामजी नीति, शील, विवेक, संयम, नैतिकता, शालीनता, सदाचार, शौर्य एवं अगनित अन्‍य सदगुणों की अदभूत पराकाष्‍ठा हैं । ऐसा कोई सदगुण नहीं जो मेरे प्रभु में प्रतिबिम्बित न हो, ऐसा कोई अवगुण नहीं जिसकी झलक मात्र भी मेरे प्रभु में दिखे । इतने दिव्‍य, श्रेष्‍ठ, तेजस्‍वी, मर्यादा अवतार का किंचित प्रभाव भी एक शिशु पर हो जायें और प्रभु श्रीरामजी उसके आदर्श बन जायें तो वह शीशु जीवन पर्यन्त धन्‍य हो जाता है

मैनें मर्यादा अवतार में पुरूषोत्‍तम मेरे प्रभु श्रीरामजी के एक-एक लीलाओं का प्रभाव उस समय के 7 वर्ष के नन्‍हें देवयुक्‍त पर होते देखा था । प्रभु के बारे में सुनते हुये उसे आत्‍मविभोर होते देखा, उसके आंसु छलकते हुये देखा और उन आंसुओं की भेट को प्रभु को स्‍वीकारते हुये देखा । कैसे देखा ? पुरूषोत्‍तम श्रीराम प्रभु को हृदय में सबसे बड़े आदर्श के रूप में विराजते हुये देखा और रामभक्‍त शिरोमणी श्री हनुमानजी को भक्ति और प्रभु सेवा के आदर्श के रूप में हृदय में विराजते हुये देखा ।

मेरे प्रभु की एक-एक लीलाओं ने नन्‍हें देवयुक्‍त को अपनी ओर खींचा - भगवती अहिल्‍या का उद्धार, श्री केवट प्रसंग, भगवती शबरी की नवधा भक्ति, श्री भरतजी की भातृ भक्ति, श्री लक्ष्‍मणजी की प्रभु सेवा, श्री जटायुजी का रामकाज हेतु प्राणों की आहुति देना एवं प्रभु द्वारा उनका पित्रतुल्‍य उद्धार, श्री विभीषणजी का सर्म्‍पण और सबसे ज्‍यादा रामभक्‍त श्री हनुमानजी का प्रभु प्रेम, प्रभु भक्ति, प्रभु सेवा से ओत-प्रोत दिव्‍यत्‍तम, अदभूत, आलौकिक, अनुपम, श्रेष्‍ठ, परम मनोहर लीलायें ।

हम नन्‍हें बच्‍चों को टोम एंड जेरी दिखाते हैं - न जीवन में " टोम " कुछ काम आने वाला, न जीवन में " जेरी " कुछ भला करने वाली है । इन चीजों को दिखाने की मनाही नहीं है पर बच्‍चों को दिखाने की हमारी प्रधानता प्रभु की लीलाओं की ही होनी चाहिए । यही आग्रह, यही उपदेश शास्त्रों का भी है जिससे नन्‍हें हृदयों में प्रभु प्रेम के बीज बोयें जा सकें जो अंकुरित होकर भक्तिवृक्ष बन कर जीवन पर्यन्त उसके जीवन को सुगंन्धित करता हुआ जीवन काल में सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक एवं नैतिक कर्मो की उँचाईयां प्रदान करें और अंत में भक्ति के बल पर मुक्ति का रास्‍ता दिखा देवें । जीवन में प्रभु प्रेम का एक बीज कितना कार्य कर सकता है, यह हम स्‍वयं ही सोच कर अनुभव कर सकते हैं ।

मेरे अपने जीवन में -
प्रभु की कृपा कहाँ तक गिनाऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक बताऊ !
प्रभु की कृपा कहाँ तक दिखाऊ !

प्रभु का
संदीप रामनिवास कर्वा
जयपुर ( राजस्‍थान )
ईमेल- dyt.srk@gmail.com

संपादक टिप्पणी -
मातृऋण और पितृऋण तब बनता है जब हम अपने बच्‍चों को प्रभु मार्ग पर आगे बढायें, प्रभु को आदर्श के रूप में नन्‍हें हृदयपटलों पर अंकित कर पायें । अभी हमारे बच्‍चों के आदर्श कामिक पात्र जैसे सुपरमैन, स्‍पाईडरमैन, शक्तिमान इत्‍यादि या फिल्‍म स्‍टार या क्रिकेट स्‍टार बने हुये हैं जो हमारे बच्‍चे को जीवन में वह उँचाई कभी प्रदान नहीं कर सकते जिसकी आकांक्षा हर माता-पिता रखते हैं । बच्‍चो में नैतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय मूल्‍यों का ह्रास इसी कारण हो रहा है । प्रभु श्रीरामजी अगर किसी बच्‍चे के आदर्श होगें तो वह बच्‍चा कभी नैतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय मूल्‍यों के उच्‍च मापदण्‍डों से कभी फिसल नहीं सकता । यह स्‍पष्‍ट सिद्धांत है । हमारे देश के महापुरूषों ने ऐसा करके दिखाया है । अब जरूरत है भारत के इसी ओजस्‍वी परम्परा को आगे बढाने की ।



नाम / Name : संदीप रामनिवास कर्वा
प्रकाशन तिथि / Published on : 16 सितम्‍बर 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : मैं, संदीप रामनिवास कर्वा उम्र 42 वर्ष, जयपुर (राजस्‍थान) निवासी रियल स्‍टेट के व्‍यवसाय में हूँ । भारत की दिव्‍यत्‍त्‍म आध्‍यात्‍म धरोहर ने मुझे गदगद कर दिया है । प्राचीन भारतीय ऋषियों, भक्‍तों और संतों के मार्गदर्शन से अभीभूत हूँ । भारतीय संस्कृति और विरासत मुझे बेहद प्रिय हैं और मुझे सर्वाधिक गर्व है भारतीय होने पर । मानव का तन और भारत में जन्‍म - यह बड़ा दुर्लभ संयोग होता है ( पर हम इस प्रभु कृपा को कोई तवज्‍जो नहीं देते ) । तीन वाक्‍य मुझे बेहद प्रिय हैं और मेरे जीवन का फलसफा इनमें छुपा है -
(1) If you go by the Will of GOD (अंतरआत्‍मा की आवाज )- the Will of GOD will always take you where the grace of GOD will be ready to protect you.
(2) Every thing in the world, every science in the world, every process in the world has its definite limitations, but GOD has absolutely no limitations. HE delivers freely by HIS free Will.
(3) If we are able to upkeep firmest of firm faith in GOD, HE never fails in our distress or even otherwise.
9 Real-life memoir by Sharon H. titled THE CHOSEN
Indexed as (1) HELPING-HAND MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) helps us, when we seek GOD's intervention in crisis. Stranded two weeks into an airport strike, she was desperate to get home from South Africa, as were thousands of others. So she did the only thing she could, she prayed.

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THE CHOSEN

Have you ever been in a situation where you feel alone, lost, darkness all around and thought GOD had forgotten you existed ?

We all experience times like these. I will never forget my own a few years ago while in South Africa visiting my parents.

The ten-day vacation was coming to an end and I expected to be home in the States within the three days. Unfortunately, the staff of the airline I was to travel on went on strike, resulting in no flights coming to or leaving South Africa.

Initially, I was not concerned. Surely, I thought, this will resolve itself within the next three days. But no, it did not resolve. It went on for weeks.

Panic set in because I needed to get back to the States as work and family were waiting for me. I prayed and prayed, begging God to intervene so that I could fly home. Daily I called the airlines. There was never any change.

Finally, after two long weeks of striking, a few flights left South Africa. But by this time there was such a backlog of passengers camped out at the airport that it would be weeks longer before I was able to leave.

Still, I could not wait any longer. I had to get home. I presented my problem to the LORD once more. And, in faith, took action on my request to HIM.

My parents took me to the airport, which was a good two-hour drive. Not knowing what to expect when I got there, I planned to join those sleeping on the floor hoping to get a flight out.

We arrived at the airport and it brought my stomach to my throat. The sight of the throngs was too awful to bear !

"We're just going to turn around now and return home," my mom said.

My dad, on the other hand, is one of those old time believers in God's amazing work in the worst of situations. Editor's comment - Keeping faith in ALMIGHTY in tiring circumstances is always rewarded.

"I think she should just step out in faith and see what happens," he said.

We parked miles away and fought the crowd to the terminal. People were sleeping, standing, camping out in the terminal. No line was moving. I had no idea where to go to even begin to put my name on a waiting list.

And then God intervened, as He always does in such circumstances. There I was standing with my huge suitcase, in the middle of the crowd, totally dazed, not knowing where to turn, when one of the airport attendees suddenly reached for me and asked, "Where are you going ?" I said, "New York."

He replied, "Come with me." He picked up my suitcase and escorted me right to the front of the line, leaving everyone else yelling and cursing at me. He waited with me at the counter and helped me get on a flight. The flight had one seat open to New York.

After checking in, I went to find my parents, who were still in shock at what they had just witnessed. My dad, tears running down his face, smiled and hugged me, saying, "Well ? Once again, all you had to do was step out in faith, making your requests known to ALMIGHTY GOD and He answered. But you had to act on your faith. Why do we doubt GOD ?" Editor's comment - GOD had answered the call, like HE always does when we do not doubt HIM.

Looking back over the whole situation, my faith in God increased tremendously. What happened ? Why was I chosen out of the crowd ? I will never know why, but I can only say that GOD took this situation to prove to me that HE knows who I am, that HE alone can work out the toughest challenges in our lives. HE knew I had to get home to fulfill commitments in the church. I asked and HE answered.

There are times when we have to take GOD at HIS word when HE says HE will make a way in the wilderness when there is no way. Editor's comment - If we keep our faith intact, GOD will always make a way where there is no way at all.

Was the gentleman in the airport who took me out of the crowd an angel ? I don't think so. He was looking in the crowd for someone to put on the flight. GOD helped him to pick me. Editor's comment - Who is to be chosen is the prerogative of GOD and true prayers lead HIM to choose us.

We miss out on so many blessings when we say, "The situation is impossible." We must come to the realization that our GOD is a GOD who transcends the impossible. We need to step out in faith, knowing HE hears our cry. Editor's comment - Impossible is always possible with GOD.

Sharon H.
East Rockaway, NY (USA)


नाम / Name : Sharon H.
प्रकाशन तिथि / Published on: 25 December 2012

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : This article is reproduced with kind permission from the website Touched by the Hand of GOD. The referred website contains many such amazing GOD miracle real-life stories. Visitors to the website – Touched by the Hand of GOD – will find motivational stories to inspire and guide one along their spiritual path.
10 Real-life memoir by Jonathan S. titled TWO OF A KIND
Indexed as (1) HELPING-HAND MEMOIR


Editor's Introduction : This memoir shows how PRABHU KRIPA (GOD's kindness) helps us, when we seek GOD's intervention in our effort of goodness. His mother, needing a kidney transplant, was desperate for a donor. As an adoptive son he was having all odds against a match. He prayed to GOD and the Almighty answered his call.

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TWO OF A KIND

I'm originally from El Salvador. At the age of five months, on May 8, 1980, I was adopted by two loving parents from the United States.

During the five months that I was in El Salvador, the country was going through a Civil War. Since the orphanage where I lived didn't have the necessities to take proper care of its infants, my parents were sending money to them so I could get that care.

Unfortunately, the money was being spent toward weapons for underground criminals. When my parents arrived to take me to my new home, I was very malnourished. I was very sick with various illnesses throughout my childhood because of this. My Mom often took me to doctors' appointments for things ranging from ear infections to strep throat. I even needed to be hospitalized for asthma. Not much was known about asthma back then, so many doctors couldn't figure out what was wrong with me. My Mom would spend the day at the hospital with me and my Dad would come to the hospital at night. They would sit in my hospital room while I slept. Editor's comment - By grace of Almighty GOD, whatever good things that we do in life is ably rewarded by the LORD. The goodness of the adoptive mother is rewarded when the adoptive son rises to the occasion when her mother gets into distress.

In 1985, my mom found out that she was suffering from diabetes and needed to be on insulin. Twenty-four years later, she found out that her kidneys were failing due to the ravages of this disease. She needed a kidney transplant.

Immediately, I told my Dad that I would be willing to donate my kidney to her. My parents, being the loving parents that they are, didn't want me to go through a procedure like that. And considering that we are not blood relatives nor even from the same country, the odds seemed tremendous against a tissue and organ match. Editor's comment - Where the odds are against us and we still keep unshaken faith in Almighty GOD, the situation turns favorable. Blood relatives offered, but due to their own medical complications, they were unable to go through with a donation.

Meanwhile, mom’s health continued to decline. I kept pursuing my goal to be tested as an organ and tissue donor for her. From July through September of 2009, my Mom and I went through many tests to see if this would be the case. I prayed to GOD that I should be a match. Editor's comment - Prayer from the heart is always fulfilled. Prayer done for a noble cause is also fulfilled.

In October of 2009, we as a family learned that my mom and I were a perfect tissue and organ match ! On Monday, October 12, 2009, we had the surgery. It was a complete success and there were no complications ! It is now over a year later, and my mom’s new kidney is working very well.

I like to tell everyone this story not because I want to sound like a hero, but because I want people out in the world to know that miracles do happen. I believe GOD did all the work, I just volunteered ! Editor's comment - If we volunteer for a noble cause, Almighty GOD will definitely do the work for us. Almighty GOD loves goodness as HE is an ocean of goodness and therefore all our efforts of goodness will be endorsed and executed by the Almighty GOD.

Jonathan S.
Peabody, MA


नाम / Name : Jonathan S.
प्रकाशन तिथि / Published on: 20 January 2013

संक्षिप्त प्रेषक परिचय / Brief Introduction of Sender : This article is reproduced with kind permission from the website Touched by the Hand of GOD. The referred website contains many such amazing GOD miracle real-life stories. Visitors to the website – Touched by the Hand of GOD – will find motivational stories to inspire and guide one along their spiritual path.