श्री गणेशाय नम:
Devotional Thoughts
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

श्रीमद भागवतमहापुराण, श्रीमद भगवतगीता, श्रीरामचरितमानस, र्सवसम्मति से वैष्णवो का परमधन आदीकाल से रहा है । प्रथमपुज्य श्रीगणपतिजी महाप्रभु को सुमिर, भगवती जगजननी विधादात्री माँसरस्वती के श्रीकमलचरणों का ध्यान कर, आराध्य इष्टप्रभु की कृपा के कारण जब हमें इन श्रीग्रंथो में भक्तिमार्ग से प्रवेश करने का मौका मिलता है तो यह हमारे परम सौभाग्य के उदय का सूचक होता है । क्योंकि जैसे सागर में गोता लगाकर हम मोती पा सकते हैं, वैसे ही इन महाग्रंथरूपी महासागर में नित्य गोता लगाने पर हम भगवत-मोती पा सकते हैं । जरूरत है बस भक्तिमार्ग से तह तक जाने की क्योंकि मोती सागर के तह में, गर्भ में ही मिलते हैं ।

भक्तिमार्ग इसलिए जरूरी है क्योंकि ज्ञानर्माग से प्रवेश करने पर हम तर्क वितर्क में ही उलझे रहेंगे । हर दृष्टान्त, हर श्रीलीला की व्याख्या हम ज्ञान और विज्ञान के दृष्टीकोण से करेंगे जो कि आत्मधातक होगा । साक्षात भगवत कृपा से ही इन श्रीग्रंथों में भक्तिमार्ग से प्रवेश मिलता है अन्यथा हम ज्ञानर्माग के तर्क वितर्को में ही उलझ जाते हैं ।

श्रीग्रंथ इसलिए क्योंकि ये " श्री " प्रदान करती हैं, " श्री " से साक्षात्कार कराती है । श्री को संसारी धन के रूप में नही देखना चाहिए । " श्री " परमधन है, " श्री " प्रभुधन है क्योंकि श्रीपुरूष प्रभु ही हैं ।

श्रीमद भागवतमहापुराण : श्रीमद भागवतमहापुराण प्रभु का साक्षात विग्रह है । कलियुग में प्रभु का निश्चित वास है । यहाँ प्रभु के अनन्य अवतारो की अनन्य लीलार्दशन होते हैं । इस महापुराण को वेदो का सार, बिना छिलका, गुठली का पका हुआ फल ( तात्पर्य की सब कुछ ग्रहणयोग्य, त्याज्य कुछ भी नहीं ) । पके हुए आम में भी छिलका, गुठली त्याज्य होती है पर इस महापुराण को बिना छिलका, गुठली का ( यानी कुछ भी त्याज्य नहीं ) वेदो के सार रूप से पका हुआ, प्रभु की श्रीलीलाओं की मिठास से मीठा, भक्तिरस में लबालब डूबा रसीला महापुराण कहा गया है ।

श्रीमद भगवतगीता : श्रीमद भगवतगीता स्वंय प्रभु के श्रीवचन होने के कारण महानत्तम श्रीग्रंथ है । जीवन में ऐसा कोर्इ प्रश्न उदित ही नहीं हो सकता जिसका उत्तर पहले से ही प्रभु के श्रीवचनों में नहीं मिलता । श्रीमद भगवतगीता अपने बच्चो का सदैव मार्गदर्शन करती हैं, विपदा में तो निश्चित करती है । ऐसी करुणामयी श्रीग्रंथ जिनका विग्रह ही साक्षात प्रभुवाणी हो, उनकी छत्रछाया में जो न रहता हो वह निश्चित ही जीवन द्वारा ठगा हुआ शून्य है ।

श्रीरामचरितमानस : श्रीरामचरितमानस मर्यादा की पराकाष्ठा है । दो सरलत्तम शब्द " राम " रूपी परमधन है । किसी भी शब्द के आगे "आ" लगते ही उस शब्द का मतलब उलट जाता है पर " राम " के आगे "आ" लगने पर भी आराम ही होता है ( विश्राम ही मिलाता है ) । कितना अदभुत नाम " राम " जिसकी व्याख्या करते वेद भी नेती नेती कह कर शान्त हो जाते हैं क्योंकि राम नाम की व्याख्या संभव ही नहीं है । भक्तशिरोमणि, भक्तिमूरत, रामभक्त, रामदास श्रीहनुमानजी ने इस नाम की जीवन्त व्याख्या अपने श्रीचरित्र के माध्यम से श्रीमानस में की है कि नाम प्रताप से क्या नहीं हो सकता, नाम से सब संभव और सुलभ है । प्रभु के मर्यादा अवतार में प्रभु को मर्यादा के शिखर को देख हम अभिभूत हुये बिना नहीं रह सकते ।

पावन भारतभूमि में जन्म पुण्यों का फल होता है । नैतिकता का पतन, सोने की चिडिया नहीं रहने पर भी भारतवर्ष अपनी पुरातन धरोहर के कारण सदैव श्रीमन्त रहा है और सदैव श्रीमन्त रहेगा । श्रीमन्तों के पास धन होता है और मेरी भारतमाता के पास श्रीमद भागवतमहापुराण, श्रीमद भगवतगीता एंव श्रीरामचरितमानस रूपी सनातन और शाश्वत परमधन है ।

यह तीनों महाग्रंथ मेरी तीन माता-पिता हैं जिनके आँचल में आते ही ये प्रभु के श्रीलीलाओं, श्रीवचनों के दर्शन कराती हैं । प्रभु की अकारण (मेरी कोर्इ योग्यता नहीं यह कृपा पाने की, इसलिए अकारण ) कृपा कि मैं नियमित रूप से इनके आँचल में आता हूं और सदैव नये नये मोती मिलते ही रहते हैं ।

हर दिन, प्रभु कृपा के कारण संभव होगा तो, ऐसे ही कुछ मोती आपके साथ बाँटने का प्रयास करूंगा ।

मंगल शुरूआत श्रीमद भागवतमहापुराण से, फिर श्रीमद भगवतगीता एंव श्री रामचरितमानस - यह क्रम रहेगा । यह तीनों श्रीग्रंथ लम्बे समय तक चलेगी क्योंकि यह अगनित मोतीयों का पुनीत महासागर है और कितने भी गोता लगाने पर भी हमारी क्षमता नहीं कि मुठठीभर से ज्यादा मोती पा सकें । मोतीयों से भरे इन पुनीत महासागरों का 0.0000000000001 हिस्सा भी अगर हम जीवन पर्यन्त संग्रह कर पाये तो भी हमारा जीवन धन्य हो जाता है ।

फिर अन्य धर्मो के महाग्रंथो के मोती बटोरने का प्रयास, प्रभु कृपा से करेंगे । क्योंकि जैसे किसी र्तीथ में स्थित सरोवर के कर्इ घाट होते हैं पर किसी भी घाट से उतरे, जल तो एक ही है - वैसे ही अगर विभिन्न र्धमरूपी घाट से भी उतरे तो भी परमपुरूष परमपिता के दर्शन तो एक ही मिलेंगे ।

श्रीग्रंथों के प्रेरणस्तोत्र चुनिंदा श्लोको का हिन्दी अनुवाद ( खण्ड संख्या, श्लोक संख्या के साथ ) एंव नीचे भाव के दर्शन / प्रेरणापुंज शीर्षक के अंतर्गत छोटा आलेख - ऐसा क्रम रहेगा जिसकी क्रमसंख्या अंकित होगी ।

ये कोर्इ भाष्य / व्याख्या / टीका नहीं है प्रत्येक श्लोको की, ये मात्र उन चुनिदा श्लोको का प्रभाव उजागर करने का नम्र प्रयास है जिन्होंने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित / प्रेरित / आनंदित किया है । टीका या भाष्य लिखने की मेरी क्या औकात ! क्या एक चीटी कभी महासागर पार कर सकती है ? मेरी औकात उस चीटी की तरह और हमारे श्रीग्रंथ भव्य महासागर के तरह हैं । इन श्रीग्रंथो को छु पाने की भी मेरी क्या औकात, पढ़ने की मेरी औकात है ही नहीं, फिर समझने की मेरी औकात तो बिलकुल भी नहीं । जैसे एक चीटी स्‍वयं नदी पार नहीं कर सकती पर एक नाव पर चढ़ जाये तो वह नाव उसे सहजता से नदी पार करावा देती है । वैसे ही मेरे प्रभु की "कृपा नाव" पर बैठने के कारण ही इन श्रीग्रंथो को किंचित मात्र पढ़ने की शक्ति जो मुझे मिली है, वह मेरे प्रभु की महती कृपा के अलावा और कुछ भी तो नहीं हो सकती है । मेरी सामर्थ नहीं, मेरी क्षमता नहीं इन श्रीग्रंथो को पढ़ने या समझने की । इसलिए यहाँ पर भगवती जगदम्बा सरस्वती माता की मुझ पर अकारण कृपा मझे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है ।

सभी श्लोको का हिंदी अनुवाद साभार गीताप्रेस गोरखपुर से लिया गया है ।

अपने व्यस्त जीवनचर्या से समय निकाल कर हर दिन इस वेबसार्इट पर जीवन के अनमोल मोती के लिंक पर क्लिक कर नर्इ क्रमसंख्या का अवलोकन करें । जहां तक की क्रमसंख्या को आपने पढ़ लिया हो, उस क्रमसंख्या को कही नोट करके रखें जिससे अगले दिन उसके आगे की क्रमसंख्या देख पाये ।

हर दिन ज्यादा से ज्यादा 1 क्रमसंख्या ही बढेगी क्योंकि भाव की गहराई का दर्शन ही कल्याणकारी होती है इसीलिए ही कहावत बनी है कि संख्या की नहीं, गुणवत्ता का महत्व होता है ।

जीवन के अनमोल मोती रूपी इस तीर्थ के नियमित दर्शन आप और हम करते रहें - इसी प्रभुकृपा की प्रार्थना प्रभु से करते हुए, देवाधिदेव महादेवजी ( जिनकी महिमा आपार, असीम और अनन्‍त है ) के भक्तिअवतार श्रीहनुमानजीप्रभु के श्रीकमलचरणों में सादर समर्पित यह प्रयास ।

।। श्री कृष्णं वन्दे जगद्‌गुरूम्‌ ।।

> > > चन्द्रशेखर कर्वा

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