श्री गणेशाय नम:
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर दो छोटे आलेख ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक रविवार
Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक बुधवार
Quotes on GOD (in Hindi & English), every Wednesday
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
Our Objectives & Pledges - Also answers FAQ (Frequently Asked Questions)
Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
Words of Prayer प्रभु के लिए प्रार्थना, कविता
GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
CLICK THE SERIAL NUMBER BOX TO REACH THE DESIRED POST
97 98 99 100
101 102 103 104
105 106 107 108
109 110 111 112
113 114 115 116
117 118 119 120
क्रम संख्या श्रीग्रंथ अध्याय -
श्लोक संख्या
भाव के दर्शन / प्रेरणापुंज
97 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 13
श्लो 26
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
चाहे अपनी समझ से हो या दूसरे के समझाने से – जो इस संसार को दुःखरूप समझकर इससे विरक्‍त हो जाता है और अपने अन्‍त:करण को वश में करके हृदय में भगवान को धारणकर संन्‍यास के लिए घर से निकल पडता है, वही उत्‍तम मनुष्‍य है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - श्री विदुरजी का धृतराष्‍ट को दिया उपदेश में उत्‍तम मनुष्‍य की व्याख्‍या मिलती है ।

एक निश्‍चित अवस्‍था तक स्‍वधर्म पालन करने के बाद अंत समय से पहले जो संसार को दुःखों का घर समझ कर इससे विरक्‍त हो जाता है और सन्‍यास आश्रम में प्रवेश कर हृदय में मात्र प्रभु को धारण करता है, वही उत्‍तम मनुष्‍य कहलाता है ।

जीवन के अंत से पहले प्रभु का बन जाना, प्रभु के लिए समर्पित हो जाना ही मानव जीवन का लक्ष्‍य होना चाहिए । पर यह ऐकाएक अंतिम समय में नहीं हो सकता, इसका अभ्‍यास जीवन काल के मध्य चरण में ही करना प्रारंभ करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 28 अप्रैल 2013
98 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 13
श्लो 40
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
धर्मराज ! तुम किसी के लिए शोक मत करो क्‍योंकि यह सारा जगत ईश्‍वर के वश में है । सारे लोक और लोकपाल विवश होकर ईश्‍वर की ही आज्ञा का पालन कर रहे हैं । वही एक प्राणी को दूसरे से मिलाता है और वही उन्‍हें अलग करता है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब धृतराष्‍ट, गान्धारी एवं विदुरजी सन्‍यास के लिए घर से निकल पडें तो उन्‍हें अपने बीच न पाकर धर्मराज युधिष्ठिरजी ने शोक किया तब देवर्षि श्री नारदजी ने उक्‍त वचन कहें ।

ध्‍यान देने योग्‍य बात है कि किसी से बिछड़ने का (चाहे मृत्यु  या अन्‍य कोई कारण से) शोक नहीं करना चाहिए क्‍योंकि सारा संसार प्रभु के वश में है और प्रभु इच्‍छा से संयोग और वियोग होते हैं ।

दुसरी बात, सारे लोक एवं वहाँ के लोकपाल प्रभु की आज्ञा का पालन करते हैं और उस अनुरूप अपना कार्य निष्‍पादन करते हैं । ब्रह्माण्‍ड के प्रत्‍येक लोक प्रभु की आज्ञा से बंधे हें एवं उनकी आज्ञा का अनुसरण करते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 28 अप्रैल 2013
99 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 13
श्लो 47
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
इन समस्‍त रूपों में जीवों के बाहर और भीतर वही एक स्‍वयंप्रकाश भगवान, जो सम्‍पूर्ण आत्‍माओं के आत्‍मा हैं, माया के द्वारा अनेकों प्रकार से प्रकट हो रहे हैं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - देवर्षि श्री नारदजी का धर्मराज युधिष्ठिरजी को उपदेश ।

सभी जीव के बाहर और भीतर सिर्फ स्‍वयंप्रकाश भगवान हैं । दुसरा अर्थ यह है कि जगत में प्रभु के अतिरिक्‍त कुछ भी नहीं है । प्रभु ही सभी आत्‍माधारियो के आत्‍मा हैं । तभी तो महापुरूषों ने इस सत्‍य की अनुभूति की और श्रीरामचरितमानस जी में गोस्‍वामी तुलसीदासजी ने लिख दिया कि सारे जग को मैं राममय के रूप में देखता हूँ ।

प्रभु की माया संसार को अनेक रूप और रंगों में प्रकट करती है । इसलिए संतों ने जब माया के पर्दे को हटाकर देखा तो संसार में सिर्फ और सिर्फ प्रभु ही दिखे ।

इस तथ्‍य को समझना जरूरी है कि प्रभु के अलावा अन्‍य कुछ भी नहीं है तभी प्रभु से सच्‍चा प्रेम हो सकेगा ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 05 मई 2013
100 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 14
श्लो 9
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उन्‍हीं भगवान की कृपा से हमें यह सम्‍पत्ति, राज्‍य, स्त्री, प्राण, कुल, संतान, शत्रुओं पर विजय और स्‍वर्गादि लोकों का अधिकार प्राप्‍त हुआ है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - धर्मराज युधिष्ठिरजी का अपने भाई भीमसेन जी को कहा गया उक्‍त वचन ।

पाण्‍डवों ने सारी सम्‍पति और राज्‍य प्रभु के अनुकम्‍पा एवं मार्गदर्शन से अर्जित की थी । भगवती द्रौपदी की लाज प्रभु ने रखी थी । पाण्‍डवों के प्राणों की रक्षा लाक्षाग्रह एवं अन्यत्र जगह प्रभु ने की थी । पाण्‍डवों के कुल और संतान की रक्षा प्रभु ने की थी जब परिक्षित जी की प्रभु ने गर्भ में प्रवेश कर रक्षा की थी । पाण्‍डवों द्वारा शत्रुओं पर विजय प्रभु के सानिध्य के कारण संभव हुआ । पाण्‍डवों के द्वारा पुण्‍यकर्म प्रभु के दिशानिर्देश मे हुये जिससे स्‍वर्ग आदि लोकों का अधिकार उन्‍हें प्राप्‍त हुआ ।

धर्मराज युधिष्ठिरजी उपरोक्‍त सभी को प्रभु कृपा का फल मानते हैं । हमारे भी जीवन में जो सकारात्‍मक हुआ है उसे प्रभु कृपा का फल मानना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 05 मई 2013
101 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 15
श्लो 13
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
यह सब जिनकी महती कृपा का फल था, उन्‍हीं पुरूषोत्‍तम भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे आज ठग लिया ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्रीकृष्णजी द्वारा अपनी लीलाओं को विश्राम दे स्‍वधाम जाने पर अर्जुनजी ने उक्‍त वचन कहें । प्रभु के वियोग में वे स्‍वयं को ठगा हुआ महसुस कर रहे थे ।

क्‍योंकि अर्जुनजी का प्रबल पराक्रम प्रभु के बल पर ही था । अपने जीवन की एक-एक घटना याद करते हुये उसमें प्रभु की महती कृपा के दर्शन अर्जुनजी करते हैं । भगवती द्रौपदी का स्‍वयंवर उन्‍होंने प्रभु प्रताप से जीता । खाण्‍डव वन में फँसने पर प्रभु ने अग्निपान कर रक्षा की । भगवती द्रौपदी की लाज की रक्षा प्रभु ने की एवं उसके अपमान का डंड कौरवों को दिया । एक पत्‍ते का भोग लगाकर दुर्वासा महर्षि के क्रोध से प्रभु ने पाण्‍डवो को बचाया । प्रभु की कृपा से अर्जुनजी ने बहुत सारे अस्त्र देवताओ से प्राप्‍त किये । प्रभु की कृपा के कारण ही मानव शरीर में स्‍वर्ग जाकर देवराज इन्‍द्र की सभा में उनके आधे आसन पर बैठकर सम्‍मान प्राप्‍त किया ।

अर्जुनजी अपने जीवन की समस्‍त घटनाओं को प्रभु कृपा से जोडकर देखते हैं । हमें भी ऐसी दृष्टी विकसित करनी चाहिए जो हमारे जीवने के हर सकारात्‍मक घटना को प्रभु कृपा से जोडकर देखने में सक्षम हो ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 12 मई 2013
102 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 15
श्लो 14
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
कौरवों की सेना भीष्‍म-द्रोण आदि अजेय महामत्‍स्‍यों से पूर्ण अपार समुद्र के समान दुस्‍तर थी, परंतु उनका आश्रय ग्रहण करके अकेले ही रथ पर सवार हो मैं उसे पार कर गया ........ ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु के श्रीकृष्णअवतार में लीलाओं को विश्राम दे स्‍वधाम गमन के बाद अर्जुनजी प्रभु की महती कृपा को याद करते हैं ।

कौरवों की सेना में भीष्‍म, कर्ण, द्रोण, शल्‍य, भूरिश्रवा, सुशर्मा, जयद्रथ जैसे महाबली थे । अर्जुनजी कहते हैं कि प्रभु मेरे रथ में सारथी के रूप में आगे बैठकर अपनी दृष्टी मात्र से उन कौरव महारथीयों की आयु, मन, उत्‍साह और बल छीन लेते थे । उन महारथीयों ने कभी न चुकने वाले अस्त्र चलाये पर प्रभु के प्रभाव के कारण उन अस्त्रों ने अर्जुनजी को छुआ तक नहीं ।

कौरव महारथीयों का आपार समुद्र था पर प्रभु के कृपा रथ पर बैठकर अर्जुनजी ने बड़ी सहजता से उसे पार कर लिया ।

हम भी जीवन में प्रभु की कृपा अर्जित कर बड़े से बड़ा कार्य सुगमता से कर सकते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 12 मई 2013
103 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 15
श्लो 21
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
वही मेरा गाण्‍डीव धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है, चही घोडे हैं और वही मैं रथी अर्जुन हूँ, जिसके सामने बड़े-बड़े राजा लोग सिर झुकाया करते थे । श्रीकृष्ण के बिना ये सब एक ही क्षण में नहीं के समान सारशून्‍य हो गये ...... ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - श्री द्वारका जी से लौटते वक्‍त मार्ग में गोपों ने श्री अर्जुनजी को अबला के भांति हरा दिया ।

उस समय प्रभु अपनी श्रीकृष्ण अवतार की लीलाओं को विश्राम देकर अपने स्‍वधाम पधार चुके थे । श्री अर्जुनजी जब गोपों के हाथ परास्‍त हुये तो उन्‍होंने जाना की उनका बल, शौर्य और पराक्रम सिर्फ और सिर्फ प्रभु के कारण था । प्रभु के स्‍वधाम पधारते ही वे बल, शौर्य और पराक्रम से हीन हो गये । उनका वही गाण्‍डीव धनुष, वही बाण, वही रथ, वही घोडे और स्‍वयं वे ही अर्जुन जिनके सामने बड़े-बड़े राजा क्षणभर में झुक जाते थे, अब शुन्‍य हो गये और साधारण गोपों के सामने उन्‍हें झुकना पडा ।

हमारे भीतर भी कोई असाधारण प्रतिभा है तो उसे देवी तत्‍व के रूप में देखकर उसे प्रभु का कृपा प्रसाद मानना चाहिए और उस प्रतिभा के स्‍वअर्जन का गर्व नहीं करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 19 मई 2013
104 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 15
श्लो 29
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों के अहर्निश चिन्‍तन से अत्‍यन्‍त बढ गयी । भक्ति के वेग ने उनके हृदय को मथकर उसमें से सारे विकारों को बाहर निकाल दिया ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - भक्ति की महिमा बताता मेरा एक प्रिय श्‍लोक ।

यहाँ भक्ति के संदर्भ में दो संकेत मिलते हैं । पहला की प्रभु का चिंतन करने से भक्ति बढती है । जितना समय हम प्रभु के चिंतन को देते हैं उतना हमारे भीतर की भक्ति को बल मिलता है । इसलिए प्रभु का चिंतन करने का समय जीवन में बढाना चाहिए ।

दुसरा जितनी भक्ति हमारे भीतर जाग्रत होती है उतना ही हमारे विकार बाहर निकलते हैं । यह एक अद्वितीय सिद्धांत है कि हमारे भीतर भक्ति का विकास होते ही हमारे भीतर की बुराईयां कमजोर पडती जाती है और अंत में नष्‍ट हो जाती है । भक्ति मूलतः हमें प्रभु के करीब पहुँचाती है पर ऐसी पात्रता बनाने हेतु हमारे विकारों को भी नष्‍ट करती है । हमारी भक्ति कितनी प्रबल हुई है इसे मापने का एक मापडंद यह भी है कि हमारे भीतर के कितने विकार नष्‍ट हुये हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 19 मई 2013
105 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 15
श्लो 33
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
कुन्‍ती ने भी अर्जुन के मुख से ..... और भगवान के स्‍वधाम गमन की बात सुनकर अनन्‍य भक्ति से अपने हृदय को भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया और सदा के लिये इस जन्‍म-मृत्यु रूप संसार से अपना मुँह मोड लिया ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - भक्ति द्वारा आवागमन से मुक्ति मिलती है इस तथ्‍य का प्रतिपादन यहाँ मिलता है ।

चौरासी करोड योनियों में पुनःरूपी जन्‍म पुनःरूपी मरण के कालचक्र से हमें मुक्ति देने का एकमात्र सरल साधन है - प्रभु की भक्ति । यहाँ भगवती कुन्‍ती के माध्‍यम से इस तथ्‍य की पुष्टि होती है । भगवती कुन्‍ती का जीवन प्रभु की भक्ति में रंगा हुआ था इसलिए शरीर त्‍यागनें पर उन्‍हें परमगति मिली और उन्‍हें जन्‍म-मृत्यु के कालचक्र से सदैव के लिए मुक्ति मिल गई ।

भक्ति कितनी सरल है और उसका सामर्थ्‍य कितना विशाल है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 26 मई 2013
106 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 15
श्लो 46
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उन्‍होनें जीवन के सभी लाभ भलीभांति प्राप्‍त कर लिये थे; इसलिये यह निश्‍चय करके कि भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमल ही हमारे परम पुरूषार्थ हैं, उन्‍होंने उन्‍हें हृदय में धारण किया ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - एक प्रेरणादायक श्‍लोक‍ जो हमें सही मार्ग दिखलाता है ।

जीवन के सभी भौतिक लाभ प्राप्‍त करने के बाद भी हमनें सब कुछ पा लिया है - ऐसा नहीं समझना चाहिए । फिर भी एक परम पुरूषार्थ बचता है - प्रभु की भक्ति ।

पाण्‍डवों ने इतना बड़ा साम्राज्‍य, इतने लौकिक सुख प्राप्‍त किये जिसकी आज के युग में हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते । प्रभु की कृपा से पूरे पृथ्वी मंडल का साम्राज्‍य, अपार धन, वैभव और ऐश्वर्य एवं पारिवारिक रिश्तों की अनुकूलता उन्‍हें प्राप्‍त हुई । लौकिक तौर पर कुछ भी अप्राप्‍त उनके जीवन में नहीं बचा था । ऐसे में भी परम पुरूषार्थ उन्‍हें प्रभु में अपना चित लगाने में लगा ।

संसार में बहुत सारे पुरूषार्थ होते हैं पर परम पुरूषार्थ अपने आपको प्रभु को अर्पण करने का ही है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 26 मई 2013
107 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 16
श्लो 6
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
.... दुसरी व्‍यर्थ की बातों से क्‍या लाभ । उनमें तो आयु व्‍यर्थ नष्‍ट होती है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - श्री शौनक ऋषि ने श्री सूतजी से प्रभु की लीलाओं का रसपान करते हुये उक्‍त वचन कहें ।

श्री शौनक ऋषि सिर्फ प्रभु की मंगलमयी लीलाओं का ही रसपान करना चाहते थे क्‍योंकि वे जानते थे कि दुसरी बातें व्‍यर्थ की होती है जिसे करने से जीव को कोई लाभ नहीं होता । ऐसी बातें करके हम अपनी आयु को व्‍यर्थ ही नष्‍ट करते हैं । ऋषियों एवं भक्‍तों का दृष्टीकोण ऐसा ही होता है कि वे संसारिक बातों में न रम कर प्रभु के विषय में ही बोलना और सुनना चाहते हैं जिससे उनका श्रवण और वाणी पवित्र हो सके ।

पर साधारण लोग ज्‍यादा‍तर व्‍यर्थ की चीजें देखने, सुनने और बोलने में ही अपना पूरा मानव जीवन व्‍यर्थ कर देते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 02 जून 2013
108 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 16
श्लो 9
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
एक तो थोडी आयु और दूसरे कम समझ । ऐसी अवस्‍था में संसार के मन्‍दभाग्‍य विषयी पुरूषों की आयु व्‍यर्थ ही बीती जा रही है - नींद में रात और व्‍यर्थ के कामों में दिन ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - विषयी जीव पर कटाक्ष करता यह श्‍लोक और साथ ही मानव जीवन का उद्देश्य बताता यह श्‍लोक ।

मानव जीवन विषयों के पीछे भागने के लिए नहीं मिला है । विषयों के भोग से मानव कभी तृप्‍त नहीं होता और वह जीवन पर्यन्त यही करता रहता है । वह निरंतर विषयों के चक्‍क्‍र में उलझा रहता है । ऐसे जीव को मन्‍दभाग्‍य कहा गया है और ऐसे कर्म को आयु व्‍यर्थ करने वाला कर्म माना गया है ।

विषयों को त्‍यागकर प्रभु का स्‍मरण, चिन्‍तन और भजन करना ही मानव जीवन का सच्‍चा उद्देश्य माना गया है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 02 जून 2013
109 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 16
श्लो 13
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उन्‍हें उन देशों में सर्वत्र अपने पूर्वज महात्‍माओं का सुयश सुनने को मिला । उस यशोगान से पद-पद पर भगवान श्रीकृष्ण की महिमा प्रकट होती थी ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब राजा परीक्षित दिग्विजय करने निकले तो वह जिन देशों में गये सर्वत्र उन्‍हें अपने पूर्वज पाण्‍डवों का सुयश सुनने को मिला ।

पाण्‍डवों को सुयश दिलाने का पूरा श्रेय प्रभु को था । प्रभु के कारण ही उन्‍हें कीर्ति मिली थी इसलिए सर्वत्र पाण्‍डवों पर प्रभु कृपा की चर्चा थी । पाण्‍डवों की प्रभु में कितनी भक्ति थी यह चर्चा भी सर्वत्र थी ।

पाण्‍डवों द्वारा अर्जित की गई एक-एक कीर्ति में प्रभु की असीम कृपा की छाप साफ झलकती थी । प्रभु की पाण्‍डव वंश पर इतनी असीम कृपा रही थी यह तथ्‍य राजा परीक्षित जी जानते थे और यह प्रसंग सुनकर वे बहुत प्रसन्‍न हुये और उनके नेत्र प्रेमजल से तर हो गये ।

हमें भी जीवन में प्रभु कृपा अर्जित करना चाहिए और ऐसा हो तो गौरवान्वित अनुभव करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 09 जून 2013
110 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 16
श्लो 16
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... इतना ही नहीं, अपने प्रेमी पाण्‍डवों के चरणों में उन्‍होंने सारे जगत को झुका दिया । तब परीक्षित की भक्ति भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में और भी बढ जाती ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब राजा परीक्षित दिग्विजय करने निकले तो उन्‍हें अपने पूर्वज पाण्‍डवों पर प्रभु की कृपा के दृष्टान्त सुनने को मिलें ।

उन्‍हें सुनने को मिला कि पाण्‍डव कितने कष्‍ट में थे और उन पर कितनी आपदा आयी । पर उन्‍होनें प्रभु की प्रेम डोर को पकड के रखा जिसके फलस्‍वरूप हर विपदा से प्रभु ने उनको निकाला । पाण्‍डवों ने अपने जीवनकाल में प्रभु की कृपा अर्जित की जिसका परिणाम था कि प्रभु ने पाण्‍डवों के चरणों में सारे जगत को झुका दिया । जिन्‍होंने पाण्‍डवों से बैर किया वे समाप्‍त हो गये । बाकि पृथ्वी मंडल में जो भी राजा थे वे सब पाण्‍डवों के आधीन हो गये । प्रभु कृपा के कारण पूरे पृथ्वी मंडल का एकछत्र राज्‍य पाण्‍डवों को प्राप्‍त हुआ ।

अपने पुर्वजो पर प्रभु कृपा की गाथा सुनकर परीक्षित जी की प्रभु भक्ति और भी बढ गई ।

भक्‍तों पर प्रभु की कृपा के दृष्टान्त सुनकर हमारे भीतर की प्रभु भक्ति भी हमें बढानी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 09 जून 2013
111 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 16
श्लो 23
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... क्‍योंकि उन्‍होंने तुम्‍हारा भार उतारने के लिये ही अवतार लिया था और ऐसी लीलायें की थी, जो मोक्ष का भी अवलम्‍बन है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु अधर्म का भार उतारने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेते हैं । प्रभु अवतार का यह एक कारण है ।

दुसरा कारण जो सबसे बड़ा है वह यह कि अवतार लेकर प्रभु मनोहर लीलायें करते हैं । इन लीलाओं को युगों-युगों तक गाया और सुना जाता है । लीलाओं को गाने और सुनने का यह प्रवाह मोक्षदायिनी होता है यानि मोक्ष की प्राप्ति करवाता है ।

इसलिए हमें भी प्रभु की मंगल मनोहर लीलाओं का रसपान करते रहना चाहिए । मोक्ष प्राप्ति करने का यह एक अति उत्‍तम साधन है जिसको हम प्रायः नजरअंदाज कर देते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 16 जून 2013
112 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 16
श्लो 30
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
बहुत से महान गुण उनकी सेवा करने के लिये नित्‍य निरंतर निवास करते हैं, एक क्षण के लिए भी उनसे अलग नहीं होते । उन्‍हीं समस्‍त गुणों के आश्रय भगवान श्रीकृष्ण .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - यह श्‍लोक मुझे इसलिए प्रिय है क्‍योंकि इसके पहले उनतालीस गुणों की एक सुची दी गई है और इन सभी गुणों का आश्रय प्रभु को माना गया है ।

गुण इस प्रकार कहे गये हैं - सत्‍य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्‍याग, सन्‍तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्‍य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्‍साह, सौभाग्‍य, गम्‍भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति और गौरव ।

उपरोक्‍त सभी गुण प्रभु से आश्रय पाते हैं इसलिए जब भक्ति के द्वारा हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं तो यह गुण हमारे भीतर आकर बसने लग जाते हैं । प्रभु के सानिध्य में रहने का यह फल होता है कि इन गुणों के बीज स्वतः हमारे भीतर अंकुरित होने लगते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 16 जून 2013
113 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 17
श्लो 26
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
ये गौ माता साक्षात पृथ्वी हैं । भगवान ने इनका भारी बोझ उतार दिया था और ये उनके राशि-राशि सौन्‍दर्य बिखेरने वाले चरणचिन्हों से सर्वत्र उत्‍सवमयी हो गयी थीं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उक्‍त वचन धर्म ने पृथ्वी माता का गौरूप में परिचय कराते हुये राजा परीक्षित जी को कहें ।

ध्‍यान देने योग्‍य दो बाते हैं । पहली बात, पृथ्वी माता के बोझ उतारने का दायित्‍व प्रभु ने ले रखा है । इसका प्रतिपादन श्रीमद भगवत गीता जी में प्रभु के श्रीवचनों में भी मिलता है ।

दूसरी बात, पृथ्वी लोक पर प्रभु के अवतार से और प्रभु के पावन विचरण के कारण श्रीकमलचरणों की छाप से पृथ्वी ओजस्वी और गौरवान्वित होती हैं । व्रज मंडल इसका जीवन्‍त उदाहरण है जहाँ प्रभु के श्रीकमलचरण रज के कारण यह अत्‍यन्‍त पूज्‍यनीय और पावन है ।

पृथ्वी पर प्रभु के लीला स्‍थल परम पावन और पूज्‍यनीय होते हैं । इनके लिए हमारे हृदय में सदैव विशेष स्‍थान होना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 23 जून 2013
114 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 2
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
जिस समय ब्रह्मण के शाप से उन्‍हें डसने के लिये तक्षक आया, उस समय वे प्राणनाश के महान भय से भी भयभीत नहीं हुए; क्‍योंकि उन्‍होंने अपना चित्‍त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर रखा था ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - मृत्यु का भय बहुत बड़ा होता है और सभी को होता है । अन्‍त समय समीप जान सभी भयभीत रहते हैं ।

पर प्रभु भक्‍त जो पूरी तरह प्रभु को समर्पित है उसे मृत्यु का भंयकर भय भी भयभीत नहीं कर पाता । क्‍योंकि वह जानता है कि उसने जीवन काल में ही प्रभु का सानिध्य प्राप्‍त किया है तो मृत्यु उपरान्‍त भी प्रभु उसके साथ होगें । यही कारण था कि राजा परीक्षितजी तक्षक के डसने के कारण प्राण नाश के भय से विचलित नहीं हुये ।

जीवन काल में बनाये सांसारिक संबंध जीवन काल तक ही सीमित रहते हैं पर प्रभु से संबंध चिरकाल तक ( यानि जन्‍म जन्‍मात्‍तर तक ) चलता है । इसलिए जीवनकाल में प्रभु के श्रीकमलचरणों में समर्पित हो जाना ही श्रेष्‍ठ है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 23 जून 2013
115 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 4
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
जो लोग भगवान श्रीकृष्ण की लीलाकथा कहते रहते हैं, उस कथामृत का पान करते रहते हैं और इन दोनों ही साधनों द्वारा उनके चरणकमलों का स्‍मरण करते रहते हैं, उन्‍हें अन्‍तकाल में भी मोह नहीं होता ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - अन्‍तकाल में हुआ मोह हमें मुक्‍त नहीं होने देता और हमारे पुनःरूपी जन्‍म का कारण बनता है ।

मनुष्‍य जीवन भर मोह में फंसा रहता है और इस मोह-जाल में भ्रमित होता रहता है । अन्‍तकाल में उसे मोह रहित होना चाहिए तभी उसका कल्‍याण संभव है पर ऐसा होता नहीं है और मोह उसे अन्‍तसमय तक जकडे रहता है ।

संसार के मोह से छुटने का एक श्रेष्‍ठ उपाय है प्रभु से प्रीति और प्रभु का स्‍मरण । यह प्रभु के लीलामयी कथामृत का पान करते रहने से ही संभव है ।

इसलिए जीवन में निरंतर प्रभु के लीलारूपी कथामृत का कथन, श्रवण, मनन और चिन्‍तन करते रहना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 30 जून 2013
116 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 10
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
भगवान श्रीकृष्ण कीर्तन करने योग्‍य बहुत सी लीलाएं करते हैं । इसलिये उनके गुण और लीलाओं से सम्‍बन्‍ध रखनेवाली जितनी भी कथाएं हैं, कल्‍याणकामी पुरूषों को उन सबका सेवन करना चाहिए ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु के अवतरण का एक उद्देश्य यह होता है कि उनकी लीलाओं का गुणगान हमारे पापों का क्षय करता है और पुण्‍यों की वृद्धि करता है ।

अपना कल्‍याण चाहने वाले जीव को सदा इसका सेवन करना चाहिए । इस तथ्‍य की पुष्टि इस श्‍लोक में मिलती है ।

प्रभु के गुण एवं लीलाओं का गान करना, श्रवण करना और स्‍मरण करना जीव के लिए परम मंगलकारी और परम कल्‍याणकारी होता है । पर हम अकसर जीवन में ऐसा नहीं कर पाते और इस परम सौभाग्‍य से चुक जाते हैं । हमें नियमित रूप से इसके लिए जीवन में समय निकालना चाहिए क्‍योंकि यह हमारे कल्‍याण का सुचक है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 30 जून 2013
117 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 13
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
भगवत प्रेमी भक्‍तों के लवमात्र सत्‍संग से स्‍वर्ग एवं मोक्ष की भी तुलना नहीं की जा सकती; फिर मनुष्‍यों के तुच्‍छ भोगों की तो बात ही क्‍या है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु के भक्‍त जहाँ मिलते हैं प्रभु के लीलाओं और गुणों की चर्चा करते हैं । सत्‍संग यानी सत्‍य यानी प्रभु (प्रभु ही एकमात्र सत्‍य हैं) का संग ।

सत्‍संग की महिमा स्‍वर्ग और मोक्ष से भी अधिक है । इसके आगे मानव जीवन में मिलने वाले तुच्‍छ भोग की गिनती ही क्‍या है ।

इस तथ्‍य का प्रतिपादन श्रीरामचरितमानस जी की अमर चौपाई में मिलता है जहाँ तराजू के एक पलड़े में स्‍वर्ग का सुख (मानव जीवन के सुख की तो यहाँ गिनती भी नहीं की गई है) एवं दुसरे पलड़े में लेशमात्र क्षण का सत्‍संग रखने पर सत्‍संग का पलड़ा भारी रहता है ।

बिना सत्‍संग का जीवन बिना वस्त्र के शरीर के समान है जो लज्‍जा का कारण होता है । हमें अपने जीवन से लज्‍जा आनी चाहिए अगर उस जीवन में हमने सत्‍संग नहीं किया ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 07 जुलाई 2013
118 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 14
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
ऐसा कौन रस-मर्मज्ञ होगा, जो महापुरूषों के एकमात्र जीवन-सर्वस्‍व श्रीकृष्ण की लीला-कथाओं से तृप्‍त हो जाय ?


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त श्‍लोक एक प्रश्‍न के रूप में है पर दो तथ्‍य का प्रतिपादन यहाँ मिलता है ।

पहला, महापुरूष कौन हैं - जिन्‍होनें अपना जीवन सर्वस्‍व प्रभु में लगा दिया हो । शास्त्रों ने महापुरूष उन्‍हें माना है जिनका एकमात्र आधार, एकमात्र जीवन-सर्वस्‍व प्रभु हैं ।

दूसरा ऐसे महापुरूष निरंतर भक्ति रस के मर्मज्ञ होते हैं और प्रभु की लीला कथाओं के पान से कभी तृप्‍त नहीं होते । प्रभु का गुणगान करना हमें निरंतर प्रिय लगे और इससे कभी तृप्ति नहीं हो - यह भक्ति का एक सिद्धांत है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 07 जुलाई 2013
119 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 23
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
जैसे पक्षी अपनी शक्ति के अनुसार आकाश में उड़ते हैं, वैसे ही विद्वानलोग भी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार ही श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन करते हैं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु की अथाह लीलाओं का वर्णन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है । प्रभु के गुणों और लीलाओं का वर्णन करते करते वेद भी "नेती-नेती" कह कर शान्‍त हो जाते हैं ।

जिन्‍होनें भी प्रभु की लीलाओं का वर्णन किया है उन्‍होनें अपनी बुद्धि के अनुसार ही किया है । जैसे एक पक्षी अपनी शक्ति के अनुसार ही उड़ सकता है वैसे ही एक महापुरूष अपनी बुद्धि के अनुसार ही वर्णन कर पाता है ।

प्रभु के गुण और लीला एक समुद्र की तरह अथाह हैं । जैसे हम समुद्र का अंजुलि मात्र जल हाथों में भर पाते हैं और पूरा समुद्र का जल भरना अंजुलि में संभव नहीं है वेसे ही महापुरूषों के लिये भी प्रभु के गुण और लीला का पूर्ण वर्णन करना कतई संभव नहीं है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 14 जुलाई 2013
120 श्रीमद भागवतमहापुराण
( प्रथम स्‍कन्‍ध )
अ 18
श्लो 48
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
भगवान के भक्‍तों में भी बदला लेने की शक्ति होती है, परंतु वे दूसरों के द्वारा किये हुए अपमान, धोखेबाजी, गाली-गलौज, आक्षेप और मार-पीट का कोई बदला नहीं लेते ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - भक्ति हमें कितना स्थिरचित्त बना देती है यह तथ्‍य इस श्‍लोक से पता चलता है ।

एक साधारण व्‍यक्ति अपने अपमान, धोखेबाजी, आक्षेप का बदला लेने के लिए आतुर होता है । उसकी सहनशीलता बहुत कम होती है । वह परिस्थितियो से जल्‍दी विचलित हो उठता है और प्रतिकार करता है ।

पर भक्‍त की सहनशीलता अपार होती है । उसके मन में किसी का प्रतिकार करने का विचार भी नहीं उठता । वह स्थिरचित होता है । उसे अपने प्रभु पर विश्‍वास होता है । वह मान-अपमान से उपर उठ चुका होता है ।

भक्ति का सामर्थ्‍य इतना होता है कि वह जीव को शान्‍तचित्त कर देता है । जगत के लोग उसे सुख-दुःखादि के द्वन्दो में डालते भी हैं तो भी वह हर्षित या व्‍यथित नहीं होता ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 14 जुलाई 2013