श्री गणेशाय नम:
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, मासिक ( हिन्दी एवं अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, monthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर छोटे आलेख ( हिन्दी एवं अंग्रेजी में ), प्रत्येक दिन
Small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every day
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एवं अंग्रेजी में ), प्रत्येक दिन
Quotes on GOD (in Hindi & English), every day
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
Our Objectives & Pledges - Also answers FAQ (Frequently Asked Questions)
Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
Words of Prayer प्रभु के लिए प्रार्थना, कविता
GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
CLICK THE SERIAL NUMBER BOX TO REACH THE DESIRED POST
793 794 795 796
797 798 799 800
801 802 803 804
805 806 807 808
809 810 811 812
813 814 815 816
क्रम संख्या श्रीग्रंथ अध्याय -
श्लोक संख्या
भाव के दर्शन / प्रेरणापुंज
793 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 47
श्लो 66
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उद्धवजी ! अब हम यही चाहते हैं कि हमारे तन की एक-एक वृत्ति, एक-एक संकल्‍प श्रीकृष्ण के चरणकमलों के ही आश्रित रहे । उन्‍हीं की सेवा के लिये उठे और उन्‍हीं में लगी भी रहे । हमारी वाणी नित्‍य-निरन्‍तर उन्‍हीं के नामों का उच्‍चारण करती रहे और शरीर उन्‍हीं को प्रणाम करने, उन्‍हीं की आज्ञा-पालन और सेवा में लगा रहे ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन ब्रजवासियों ने श्री उद्धवजी को कहे जब श्री उद्धवजी कई मास ब्रज में प्रवास के बाद वापस मथुरा के लिए रवाना हुये ।

ब्रजवासी कहते हैं कि वे चाहते हैं कि अब उनके मन की एक एक वृत्ति प्रभु के लिए हो । उनका एक एक संकल्‍प प्रभु के लिए उठे । उनका जीवन प्रभु के श्रीकमलचरणों में आश्रित रहे । उनके मन की हर क्रिया प्रभु सेवा के लिए हो और उनका मन सदा प्रभु में ही लगा रहे । उनकी वाणी नित्‍य निरंतर प्रभु के मंगल नामों का उच्‍चारण करती रहे । उनका शरीर सदैव प्रभु को प्रणाम करता रहे । वे प्रभु की हर आज्ञा का पालन करे और प्रभु की सेवा में ही लगे रहें । जीव के अंदर इतने सुन्‍दर भाव प्रभु भक्ति और प्रभु प्रेम के बल पर ही आ सकते हैं ।

इसलिए जीवन में प्रभु की भक्ति और प्रभु से प्रेम करना चाहिए जिससे ऐसी भावना हमारे भीतर जागृत हो सके ।

प्रकाशन तिथि : 07 मई 2017
794 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 47
श्लो 67
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उद्धवजी ! हम सच कहते हैं, हमें मोक्ष की इच्‍छा बिल्‍कुल नहीं है । हम भगवान की इच्‍छा से अपने कर्मों के अनुसार चाहे जिस योनि में जन्‍म लें - वहाँ शुभ आचरण करें, दान करें और उसका फल यही पावें कि हमारे अपने ईश्‍वर श्रीकृष्ण में हमारी प्रीति उत्‍तरोत्‍तर बढ़ती रहे ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन ब्रजवासियों ने श्री उद्धवजी को कहे जब श्री उद्धवजी कई मास ब्रज में प्रवास के बाद वापस मथुरा के लिए रवाना हुये ।

ब्रजवासी कहते हैं कि उन्‍हें प्रभु द्वारा प्रदान की जाने वाली मोक्ष की बिल्‍कुल इच्‍छा नहीं है । वे चाहते हैं कि उन्‍हें अपने कर्म अनुसार जिस भी योनि में जन्‍म मिले, प्रभु ऐसी कृपा करें कि उस योनि में उनकी प्रभु के लिए प्रीति निरंतर बढ़ती चली जाये । साधारण जीव प्रभु से मोक्ष की कामना करता है पर धन्‍य हैं ब्रजवासी जो कि मोक्ष के अधिकारी होते हुये भी अपने आने वाला जन्‍म भी कर्म अनुसार चाहते हैं और प्रभु से प्रभु प्रेम के अलावा कोई विशेष प्रावधान की मांग नहीं करते । वे बस प्रभु से इतना चाहते हैं कि किसी भी योनि में उनका जन्‍म हो उनकी प्रभु के प्रति प्रीति निरंतर बढ़ती चली जाये । सबसे बड़ी प्रभु की अनुकम्‍पा भी यही होती है जब प्रभु कृपा से हमारी प्रभु भक्ति और हमारा प्रभु प्रेम बढ़ता चला जाता है ।

प्रभु से हमें भी यही मांगना चाहिए कि प्रभु के लिए हमारी भक्ति और प्रेम निरंतर बढ़ता चला जाये ।

प्रकाशन तिथि : 07 मई 2017
795 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 48
श्लो 11
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... जो कोई उन्‍हें प्रसन्‍न करके उनसे विषय-सुख मांगता है, वह निश्‍चित ही दुर्बुद्धि है; क्‍योंकि वास्‍तव में विषय-सुख अत्‍यन्‍त तुच्‍छ - नहीं के बराबर है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन प्रभु श्री शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को कहे ।

उपरोक्‍त श्‍लोक में प्रभु के लिए निष्‍काम प्रेम और निष्‍काम भक्ति का प्रतिपादन मिलता है । श्‍लोक में कहा गया है कि जो प्रभु को प्रसन्‍न करके संसारिक विषयों के सुख मांगता है वह निश्‍चित ही बुद्धि से हीन है । शास्त्रों ने संसारिक विषयों के सुख को अत्‍यन्‍त तुच्‍छ बताया है और उनका म‍हत्‍व नहीं के बराबर बताया है । इसलिए प्रभु से संसारिक सुख मांगना मुर्खता है । प्रभु से सदैव प्रभु को ही मांगना चाहिए जैसा कि श्री अर्जुनजी ने महाभारत युद्ध से पहले मांगा था । प्रभु से हमारा प्रेम निरंतर बढ़ता जाये और हमारी प्रभु भक्ति दृढ होती जाये, यही प्रभु से मांगना चाहिए । जीवन में जितनी निष्‍कामता रहेगी उतना ही हम प्रभु के समीप पहुँचते चले जायेंगे ।

इसलिए जीव को निष्‍काम रहकर प्रभु से कभी संसारिक विषयों के सुख की मांग नहीं करनी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : 08 मई 2017
796 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 48
श्लो 15-16
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
पराक्षित ! उन्‍होंने पहले भगवान के चरण धोकर चरणोदक सिर पर धारण किया और फिर अनेकों प्रकार की पूजा-सामग्री, दिव्‍य वस्त्र, गन्‍ध, माला और श्रेष्‍ठ आभूषणों से उनका पूजन किया, सिर झुकाकर उन्‍हें प्रणाम किया और उनके चरणों को अपनी गोद में लेकर दबाने लगे । .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु से सभी कितना प्रेम करते थे यह यहाँ देखने को मिलता है ।

प्रभु ने एक बार श्री अक्रूरजी को आश्‍वासन दिया था कि वे उनके घर पधारेंगे । उसी आश्‍वासन को पूर्ण करने के लिए प्रभु और श्री बलरामजी ने एक बार श्री अक्रूरजी के यहाँ जाने का निश्‍चय किया । श्री अक्रूरजी ने जब देखा कि प्रभु उनके घर पधार रहें हैं तो उन्‍होंने प्रभु का भव्‍य स्‍वागत किया । उन्‍होंने सबसे पहले प्रभु के श्रीकमलचरणों को धोकर चाणामृत को अपने सिर पर धारण किया । फिर अनेक प्रकार की पूजा सामग्री से, दिव्‍य वस्त्र, गन्‍ध चंदन, माला और श्रेष्‍ठ आभूषणों से प्रभु का पूजन किया । फिर श्री अक्रूरजी ने अपने सिर को प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकाकर प्रभु को प्रणाम किया । उसके बाद श्री अक्रूरजी ने प्रभु के दोनों श्रीकमलचरणों को अपनी गोद में रखा और उसे आदर के साथ प्रभु की थकान मिटाने के लिए दबाने लगे ।

प्रभु के भक्‍त प्रभु का सानिध्य पाकर प्रभु सेवा को कोई मौका नहीं चुकते ।

प्रकाशन तिथि : 08 मई 2017
797 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 48
श्लो 26
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
प्रभो ! आप प्रेमी भक्‍तों के परम प्रियत्‍तम, सत्‍यवक्‍ता, अकारण हितू और कृतज्ञ हैं - जरा-सी सेवा को भी मान लेते हैं । भला, ऐसा कौन बुद्धिमान पुरूष है जो आपको छोड़कर किसी दूसरे की शरण में जायगा ? .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन श्री अक्रूरजी ने प्रभु से कहे ।

प्रभु अपने प्रेमी भक्‍तों के परम प्रियत्‍तम हैं । प्रभु जीव का अकारण हित करने वाले हैं । प्रभु जीव की जरा सी सेवा को बहुत बड़ा मान लेते हैं और उस पर कृपा कर देते हैं । प्रभु अपने भजन करने वाले भक्‍तों की समस्‍त अभिलाषा पूर्ण करने वाले हैं । प्रभु भक्‍तों का कष्‍ट हरने वाले हैं और जीव को जन्‍म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले हैं । इतने कृपालु प्रभु को छोड़कर भक्‍त किसी अन्‍य की शरण में जाने की बात कभी सोच भी नहीं सकता है । भक्‍त की जरा सी भी की गई भक्ति को प्रभु बहुत बड़ा मानकर उसका फल देते हैं ।

इसलिए जीव को चाहिए कि प्रभु से प्रेम और भक्ति से अपना नाता जोड़े और अपने मानव जीवन को सफल करे ।

प्रकाशन तिथि : 09 मई 2017
798 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 49
श्लो 12
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... मैं देखती हूँ कि जो लोग इस संसार से डरे हुए हैं, उनके लिये तुम्‍हारे चरणकमलों के अतिरिक्‍त और कोई शरण, और कोई सहारा नहीं है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त भाव भगवती कुन्‍तीजी ने प्रकट किये ।

प्रभु ने श्री अक्रूरजी को अपनी भुआ भगवती कुन्‍तीजी और पाण्‍डवों का हालचाल जानने के लिए हस्तिनापुर भेजा । जब श्री अक्रूरजी भगवती कुन्‍तीजी से मिले तो उन्‍होंने जो भावना प्रभु के लिए प्रकट करी वह हृदयस्‍पर्शी है । उन्‍होंने कहा कि प्रभु बड़े भक्‍तवत्‍सल और शरणागत रक्षक हैं । उन्‍होंने अनाथ पाण्‍डवों के नाथ प्रभु को बताया । उन्‍होंने कहा कि प्रभु पूरे विश्‍व के आत्‍मा हैं और विश्‍व के जीवनदाता हैं । भगवती कुन्‍तीजी कहती हैं कि वे दुःख पर दुःख भोग रही हैं और प्रभु की शरण ग्रहण करती हैं और पाण्‍डवों की रक्षा की जिम्‍मेवारी प्रभु को सौपती हैं । भगवती कुन्‍तीजी कहती हैं कि संसार मृत्युमय है और प्रभु के श्रीकमलचरण मोक्ष प्रदान करने वाले हैं । उन्‍होंने कहा कि जो संसार से डरे हुये हैं उनके लिए प्रभु के श्रीकमलचरण के अलावा अन्‍य कोई आश्रय या अन्‍य कोई सहारा नहीं है ।

जीव को भी प्रभु के श्रीकमलचरणों का ही आश्रय जीवन में लेकर रखना चाहिए ।


अब हम श्रीमद भागवतमहापुराण के दशम स्‍कन्‍ध के उत्‍तरार्ध में प्रभु कृपा के बल पर मंगल प्रवेश करेंगे । हमारा धन्‍य भाग्‍य है कि प्रभु श्रीकृष्णजी की दिव्‍य कथा का विस्‍तार से म्रंगलमय रसस्‍वादन हम कर रहे हैं । दशम स्‍कन्‍ध सुन्‍दर, सुखद और रस से भरा स्‍कन्‍ध है एवं प्रभु श्रीकृष्णजी की कथा होने के कारण श्रीमद भागवतजी का हृदय स्‍वरूप है ।
श्रीमद भागवतमहापुराण के दशम स्‍कन्‍ध के पूर्वार्ध तक की इस यात्रा को प्रभु के पावन और पुनीत श्रीकमलचरणों में सादर अर्पण करता हूँ ।
जगतजननी मेरी सरस्‍वतीमाँ का सत्‍य कथन है कि अगर पूरी पृथ्वीमाता कागज बन जाये एवं समुद्रदेव का पूरा जल स्‍याही बन जायें, तो भी वे बहुत अपर्याप्‍त होगें मेरे प्रभु के ऐश्‍वर्य का लेशमात्र भी बखान करने के लिए - इस कथन के मद्देनजर हमारी क्‍या औकात कि हम किसी भी श्रीग्रंथ के किसी भी अध्‍याय, खण्‍ड में प्रभु की पूर्ण महिमा का बखान तो दूर, बखान करने की सोच भी पायें ।
जो भी हो पाया प्रभु के कृपा के बल पर ही हो पाया है । प्रभु के कृपा के बल पर किया यह प्रयास मेरे (एक विवेकशुन्‍य सेवक) द्वारा प्रभु को अर्पण ।
प्रभु का,
चन्‍द्रशेखर कर्वा


प्रकाशन तिथि : 09 मई 2017
799 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 50
श्लो 37
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
परीक्षित ! भगवान श्रीकृष्ण की सेना में किसी का बाल भी बांका न हुआ और उन्‍होंने जरासन्‍ध की तेईस अक्षौहिणी सेना पर, जो समुद्र के समान थी, सहज ही विजय प्राप्‍त कर ली । .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब प्रभु ने कंस का वध किया तो कंस की दोनों विधवा पत्नियां अपने पिता जरासंध के पास गई ।

जरासंध ने बहुत बड़ी सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण किया । प्रभु और श्री बलरामजी अपनी छोटी सी सेना के साथ युद्धभूमि में आये । प्रभु जगत के स्‍वामी हैं, उनके लिए बड़ी से बड़ी सेना को नष्‍ट करना खेल मात्र है । प्रभु ने खेल खेल में जरासंध की बड़ी विशाल सेना का संहार कर दिया । जरासंध की सारी सेना मारी गई । वह भी बुरी तरह से घायल हो गया । उसके शरीर में केवल प्राण मात्र बाकि थे । प्रभु ने युक्ति करके उसे छोड़ दिया कि वह फिर बार बार सेना इकट्ठा करके आयेगा और प्रभु को दुष्‍टों का संहार करके पृथ्वी माता का भार उतारने का घर बैठे मौका मिलता जायेगा ।

ध्‍यान देने योग्‍य बात यह है कि इतने बड़े युद्ध में प्रभु की सेना में से किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ और प्रभु की सेना ने जरासंध की अनन्‍त गुणा विशाल सेना पर सहज ही विजय प्राप्‍त कर ली । सिद्धांत यह है कि प्रभु जिस पक्ष में होते हैं विजय सदैव उसी पक्ष की होती है ।

प्रकाशन तिथि : 10 मई 2017
800 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 50
श्लो 57
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... जब भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर लीला करने लगे, तब सभी सिद्धियां उन्‍होंने भगवान के चरणों में समर्पित कर दी ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जरासंध ने बार बार विशाल सेना इकट्ठा करी और प्रभु ने उसका सत्रह बार संहार किया और दुष्‍टों का नाश किया । फिर अंतिम बार युद्ध करने के लिए जब कालयवन और जरासंध दोनों आये तो प्रभु ने मथुरा से स्‍थानांतरण करने का निर्णय लिया ।

प्रभु के आदेश पर श्री विश्‍वकर्माजी ने समुद्रदेवजी के बीच श्री द्वारका नगर को बसाया । श्री इन्‍द्रदेवजी, श्री वरूणदेवजी, श्री कुबेरजी और लोकपालों ने अपने अधिकार में जो भी शक्तियां और समृद्धि थी उन्‍हें तत्‍काल श्री द्वारकाजी पहुँचा दिया । प्रभु की योगमाया ने मथुरा के समस्‍त प्रजाजनों को श्री द्वारकाजी पहुँचा दिया । श्री द्वारकाजी की शोभा अद्वितीय हो गई । सिद्धांत यह है कि जब प्रभु इच्‍छा करते हैं तो उससे पहले प्रकृति एवं सभी देवता प्रभु की सेवा के लिए अपने आपको नियुक्‍त कर देते हैं और प्रभु सेवा में समर्पित हो जाते हैं ।

प्रभु की इच्‍छा करने से पहले ही इच्‍छापूर्ति स्‍वत: ही हो जाती है ।

प्रकाशन तिथि : 10 मई 2017
801 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 38
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
यह सम्‍भव है कि कोई पुरूष अपने अनेक जन्‍मों में पृथ्वी के छोटे-छोटे धूल-कणों की गिनती कर डाले; परन्‍तु मेरे जन्‍म, गुण, कर्म और नामों को कोई कभी किसी प्रकार नहीं गिन सकता ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त श्रीवचन प्रभु ने कहे जब राजा मुचुकुन्‍द ने निद्रा से उठकर प्रभु का परिचय पुछा ।

प्रभु कहते हैं कि उनके अगणित जन्‍म, कर्म और नाम हैं । वे सभी अनन्‍त हैं इसलिए कोई भी उनकी गिनती करके नहीं बतला सकता । प्रभु कहते हैं कि यह तो संभव है कि कोई पुरूष अपने अनेको अनेक जन्‍म लगाकर पृथ्वी माता के छोटे छोटे धूलि कणों कि गिनती कर लेवे पर वह पुरूष भी प्रभु के अनन्‍त जन्‍म, गुण, कर्म और नामों की किसी भी प्रकार से गिनती नहीं कर सकता । प्रभु की महिमा, गुण, कर्म का बखान करते करते शास्त्र भी नेति नेति कह कर शान्‍त हो जाते हैं ।

शास्त्रों ने कहा है कि प्रभु के अनन्‍त जन्‍म हैं, अनन्‍त गुण हैं, अनन्‍त कर्म हैं और अनन्‍त नाम हैं जिसका पार कोई भी नहीं पा सकता ।

प्रकाशन तिथि : 11 मई 2017
802 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 44
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... जो पुरूष मेरी शरण में आ जाता है उसके लिये फिर ऐसी कोई वस्‍तु नहीं रह जाती, जिसके लिये वह शोक करे ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त श्रीवचन प्रभु ने राजा मुचुकुन्‍द से कहे ।

प्रभु ने राजा मुचुकुन्‍द को अपना परिचय दिया और फिर प्रभु ने कहा कि प्रभु उन पर कृपा करने के लिए आये हैं । प्रभु ने राजा मुचुकुन्‍द को याद दिलाया कि उन्‍होंने प्रभु की बहुत आराधना की थी और भक्‍तवत्‍सल होने के कारण प्रभु उनकी आराधना से प्रसन्‍न होकर उनकी अभिलाषा पूर्ण करने और वरदान देने आये हैं । प्रभु की आराधना कभी व्‍यर्थ नहीं जाती क्‍योंकि अपने भक्‍त को प्रभु खोज कर उसकी अभिलाषा पूर्ण करते हैं । जो एक बार प्रभु की शरण में आ जाते हैं फिर उनके लिए ऐसी कोई वस्‍तु बचती नहीं जिसकी अभिलाषा अपूर्ण रह जाये । प्रभु की शरण में आने पर सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं ।

इसलिए जीव को चाहिए कि जीवन में प्रभु की आराधना करे और प्रभु की शरण ग्रहण करे ।

प्रकाशन तिथि : 11 मई 2017
803 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 47
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... मनुष्‍य-जीवन इतना पूर्ण है कि उसमें भजन के लिये कोई भी असुविधा नहीं है । .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन राजा मुचुकुन्‍द ने प्रभु से कहे ।

जगत के सभी जीव माया से मोहित हैं और प्रभु से विमुख होकर अनर्थ में ही फंसे रहते हैं । वे घर गृहस्‍थी के झंझटो में फंसे रहते हैं और प्रभु का भजन नहीं करते । यही संसारिक जीव के दुःख का मूल कारण है । इस तरह बिना प्रभु का भजन किये सारे जीव जीवन में ठगे जा रहे हैं । भारत भूमि अत्‍यन्‍त पवित्र कर्मभूमि है और इस भूमि में मनुष्‍य जन्‍म पाना अत्‍यन्‍त दुर्लभ है । मनुष्‍य जीवन प्रभु भजन के लिए सर्वथा योग्‍य है क्‍योंकि एकमात्र मनुष्‍य जीवन ही इतना पूर्ण है कि उसमें भजन के लिए कोई असुविधा नहीं है । जो लोग संसार के विषयों में, घर गृहस्‍थी में उलझे रहते हैं और प्रभु की उपासना और भजन नहीं करते वे पशुतुल्‍य हैं ।

इसलिए जीव को अपना मानव जन्‍म सफल करने के लिए प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : 12 मई 2017
804 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 51
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
जो पहले सोने के रथों पर अथवा बड़े-बड़े गजराजों पर चढ़कर चलता था और नरदेव कहलाता था, वही शरीर आपके अबाध काल का ग्रास बनकर बाहर फेंक देने पर पक्षियों की विष्‍ठा, धरती में गाड़ देने पर सड़कर कीड़ा और आग में जला देने पर राख का ढ़ेर बन जाता है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन राजा मुचुकुन्‍द ने प्रभु से कहे ।

राजा मुचुकुन्‍द कहते हैं कि मैं राजा था और राजकुमार, रानी, खजाना तथा राज्‍य के मोह में फंसा हुआ था । इन सबकी चिन्‍ता करते करते उनका अमुल्‍य जीवन बिल्‍कुल निष्‍फल और व्‍यर्थ चला गया । वे अपने संसारिक कर्तव्यों में लगे रहे और मनुष्‍य के एकमात्र कर्तव्य भगवत प्राप्ति से विमुख हो गये । विषयों की दिन दूनी रात चौगुनी लालसा बढ़ती रही और काल अब उनका ग्रास करने के लिए तैयार बैठा है । राजा मुचुकुन्‍द कहते है कि जैसे एक असावधान चुहे को सांप दबोच लेता है वैसे ही काल उन्‍हें अब दबोच लेगा । मृत्यु के बाद या तो उनके शरीर को पक्षी या जानवर खायेगें या सड़ जाने के कारण कीड़े खायेगें और या आग में जला देने के बाद राख का ढेर बन जायेगा ।

इसलिए जीव को जीवन काल में ही प्रभु की भक्ति करनी चाहिए और संसार में ही उलझ कर नहीं रहना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : 12 मई 2017
805 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 56
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... भगवन ! भला, बतलाइये तो सही - मोक्ष देने वाले आपकी आराधना करके ऐसा कौन श्रेष्‍ठ पुरूष होगा, जो अपने को बांधने वाले संसारिक विषयों का वर मांगे ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन राजा मुचुकुन्‍द ने प्रभु से कहे ।

जब प्रभु ने राजा मुचुकुन्‍द को वरदान मांगने के लिए कहा तो राजा ने कहा कि वे प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा के अतिरिक्‍त अन्‍य कोई वर नहीं चाहते । राजा मुचुकुन्‍द कहते हैं कि प्रभु मोक्ष देकर मुक्‍त करने वाले हैं और भला कौन प्रभु से बंधन वाले संसारिक विषयों का वर मांगेगा । प्रभु से जो संसारिक विषयों की कामना करता है वह मूढ़ है क्‍योंकि संसारिक विषय बंधन के कारण होते हैं । प्रभु की आराधना या तो मोक्ष प्राप्ति के लिए या फिर उससे भी बढ़कर निष्‍काम भक्ति के लिए करनी चाहिए । पर जीव प्रभु की आराधना संसारिक विषयों की मांग के लिए करता है ।

प्रभु की आराधना निष्‍काम भक्ति और निष्‍काम प्रेम के लिए करनी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : 13 मई 2017
806 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 58
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... शरणदाता ! अब मैं आपके भय, मृत्यु और शोक से रहित चरणकमलों की शरण में आया हूँ । सारे जगत के एकमात्र स्‍वामी ! परमात्‍मन ! आप मुझ शरणागत की रक्षा कीजिये ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन राजा मुचुकुन्‍द ने प्रभु से कहे ।

राजा मुचुकुन्‍द कहते हैं कि वे अनादि काल से अनेक जन्‍मों में अपने कर्म फलों को भोगते भोगते दीन हो चुके हैं । दुःख की ज्‍वाला उन्‍हें रात दिन जलाती रहती है । उनकी पांच इन्द्रियां और मन कभी शान्‍त नहीं होते और उनके विषय सेवन की प्‍यास निरंतर बढ़ती ही जाती है । कभी किसी प्रकार से उन्‍हें एक क्षण के लिए भी शांति नहीं मिलती है । इसलिए अब वे प्रभु की शरण में आये हैं । प्रभु जगत के एकमात्र स्‍वामी हैं इसलिए अब वे प्रभु के श्रीकमलचरणों की शरण ग्रहण करते हैं जो भय, मृत्यु और शोक से उन्‍हें रहित कर देगा । प्रभु का व्रत है कि प्रभु शरणागतों की रक्षा करते हैं इसलिए अब वे प्रभु की शरण में आकर प्रभु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं ।

जीव को भी चाहिए कि प्रभु की शरणागति ग्रहण करे तभी उसका कल्‍याण संभव है ।

प्रकाशन तिथि : 13 मई 2017
807 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 51
श्लो 60
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... मेरे जो अनन्‍य भक्‍त होते हैं, उनकी बुद्धि कभी कामनाओं से इधर-उधर नहीं भटकती ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन प्रभु ने राजा मुचुकुन्‍द से कहे ।

प्रभु कहते हैं कि प्रभु के जो अनन्‍य भक्‍त होते हैं उनकी बुद्धि कभी कामनाओं से इधर उधर नहीं भटकती । प्रभु के अनन्‍य भक्‍तों को संसार के विषय और संसारिक कामनाओं से कोई लेना देना नहीं होता । वे अपनी बुद्धि को भक्ति के माध्‍यम से प्रभु में केंद्रित रखते हैं । अपनी संसारिक कामनाओं की पूर्ति करना कभी भी प्रभु के अनन्‍य भक्‍तों का लक्ष्‍य नहीं होता । इसलिए प्रभु के अनन्‍य भक्‍त कभी भी प्रभु से संसारिक कामना पूर्ति की इच्‍छा नहीं रखते । प्रभु के अनन्‍य भक्‍तों का मन विषयों के लिए मचलता नहीं है । वे प्रभु से विषयों और वासनाओं से शुन्‍य निर्मल भक्ति ही मांगते हैं ।

जीव को भी संसारिक विषयों और कामनाओं के पीछे नहीं पड़कर प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : 14 मई 2017
808 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 52
श्लो 20
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
ब्रह्मर्षे ! भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के सम्‍बन्‍ध में क्‍या कहना है ? वे स्‍वयं तो पवित्र हैं ही, सारे जगत का मल धो-बहाकर उसे भी पवित्र कर देने वाली हैं । उनमें ऐसी लोकोत्‍तर माधुरी है, जिसे दिन-रात सेवन करते रहने पर भी नित्‍य नया-नया रस मिलता रहता है । भला ऐसा कौन रसिक, कौन मर्मज्ञ है, जो उन्‍हें सुनकर तृप्‍त न हो जाय ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन राजा परीक्षित ने प्रभु श्री शुकदेवजी से कहे ।

जब प्रभु श्री शुकदेवजी ने संक्षिप्‍त में भगवती माता रूक्मिणीजी के प्रभु के साथ विवाह का प्रसंग सुनाया तो राजा परीक्षित ने उसे विस्‍तार से सुनने की प्रार्थना की । उन्‍होंने क‍हा कि प्रभु की लीला वे सदैव विस्‍तार से सुनना चाहते हैं क्‍योंकि प्रभु की लीला परम पवित्र होती है और जगत के मल को धो कर उसे भी पवित्र करने वाली होती है । प्रभु की मधुर लीला का दिन रात श्रवण करने पर नित्‍य नया नया रस मिलता रहता है । ऐसा कोई रसिक भक्‍त आज तक नहीं हुआ जो प्रभु की मधुर लीलाओं को सुनकर तृप्‍त हो गया है । भक्‍त सदैव प्रभु की लीला श्रवण करते वक्‍त अतृप्‍त रहते हैं और प्रभु की लीला नित्‍य निरंतर सुनना चाहते हैं ।

जीव को भी प्रभु की लीला कथा का नित्‍य श्रवण करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : 14 मई 2017
809 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 52
श्लो 38
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... मनुष्‍य लोक में जितने भी प्राणी हैं, सबका मन आपको देखकर शान्ति का अनुभव करता है, आनन्दित होता है । .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त भाव भगवती माता रूक्मिणीजी ने प्रभु को भेजे अपने संदेश में व्‍यक्‍त किये ।

भगवती माता रूक्मिणीजी कहती हैं कि संसार में जितने भी प्राणी हैं सबका मन प्रभु को देखकर शांति और आनंद का अनुभव करता है । प्रभु शांति और आनंद के दाता हैं । जीव प्रभु की आराधना कर शांति पाता है और प्रभु के स्‍वभाव, प्रभाव, गुण और लीला का श्रवण कर आनंदित होता है । संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने प्रभु के सम्पर्क में आकर शांति का अनुभव न किया हो और आनंदित न हुआ हो । चाहे जिस भी दृष्टि से देखें प्रभु अद्वितीय हैं और प्रभु के समान आनंद और शांति प्रदान करने वाले केवल प्रभु ही हैं । प्रभु का हर रूप हमें शांति का अनुभव कराता है और प्रभु की हर लीला हमें आनंदित करती है ।

जीव को अगर शांति और आनंद चाहिए तो उसे संसार में वह नहीं मिलेगी, उसके लिए तो उसे प्रभु के पास ही आना पड़ेगा ।

प्रकाशन तिथि : 15 मई 2017
810 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 52
श्लो 39
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... मैं आपको आत्‍मसमर्पण कर चुकी हूँ । .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त भाव भगवती माता रूक्मिणीजी ने प्रभु को भेजे अपने संदेश में व्‍यक्‍त किये ।

भगवती माता रूक्मिणीजी कहती हैं कि वे प्रभु के समक्ष आत्‍मसमर्पण कर चुकी हैं । वे प्रभु से विवाह करना चाहती हैं जबकि उनके भाई ने उनका विवाह अन्‍यत्र तय कर दिया है । अब उन्‍हें भरोसा एकमात्र प्रभु का ही है कि प्रभु आकर उनकी रक्षा करेंगे और उनकी इच्‍छा की पूर्ति करेंगे । इसलिए वे अपना पूर्ण आत्‍मसमर्पण प्रभु को कर चुकी हैं । अब उन्‍हें एकमात्र प्रभु से ही आस है और इसलिए उन्‍होंने प्रभु को ही अपना संदेशा भिजवाया है ।

प्रभु को किये आत्‍मसमर्पण में बड़ा सामर्थ्‍य होता है क्‍योंकि सच्‍चा आत्‍मसमर्पण होते ही रक्षा या इच्‍छापूर्ति का पूरा का पूरा दायित्‍व प्रभु पा आ जाता है और प्रभु उस दायित्‍व को सहर्ष स्‍वीकारते हैं ।

प्रकाशन तिथि : 15 मई 2017
811 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 52
श्लो 43
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... चाहे उसके लिये सैकड़ों जन्‍म क्‍यों न लेने पड़े, कभी-न-कभी तो आपका वह प्रसाद अवश्‍य ही मिलेगा ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त भाव भगवती माता रूक्मिणीजी ने प्रभु को भेजे अपने संदेश में व्‍यक्‍त किये ।

भगवती माता रूक्मिणीजी कहती हैं कि बड़े बड़े महापुरूष भी आत्‍मशुद्धि के लिए प्रभु के श्रीकमलचरणों की रज में स्‍नान करना चाहते हैं । माता कहती हैं कि उनकी भी अभिलाषा है कि वे प्रभु के श्रीकमलचरणों के रज को प्राप्‍त कर अपना जीवन धन्‍य करे । माता कहती हैं कि चाहे प्रभु के श्रीकमलचरणों की रज प्राप्‍त करने में उन्‍हें सैकड़ों जन्‍म क्‍यों न लेने पड़े पर उनका दृढ संकल्‍प है कि कभी न कभी प्रभु के श्रीकमलचरणों की रज उन्‍हें प्रसाद रूप में अवश्‍य प्राप्‍त होगी ।

प्रभु के श्रीकमलचरणों की रज की महिमा अपार है और संसार में उससे पवित्र और कल्‍याणकारी कुछ भी नहीं है ।

प्रकाशन तिथि : 20 मई 2017
812 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 53
श्लो 40
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
वे प्रेममूर्ति श्रीकृष्णचन्‍द्र के चरणकमलों का चिन्‍तन करती हुई भगवती भवानी के पादपल्‍लवों का दर्शन करने के लिये पैदल ही चली ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब भगवती माता रूक्मिणीजी परिवार की रीति के अनुसार विवाह से पूर्व भगवती जगजननी माता पार्वतीजी की पूजा अर्चना करने चली उस समय का यह वर्णन है ।

भगवती माता रूक्मिणीजी परिवार के रिवाज के अनुसार पैदल मार्ग से चली । पर उनका मन प्रभु के श्रीकमलचरणों का नित्‍य चिन्‍तन कर रहा था । मन से प्रभु का चिन्‍तन करते हुये वे भगवती जगजननी माता पार्वतीजी का आर्शीवाद लेने के लिए मंदिर चली । यहाँ ध्‍यान देने योग्‍य बात यह है कि प्रभु का चिन्‍तन और माता का आर्शीवाद लेने के लिए वे चली । जीव को भी किसी भी शुभ कार्य या किसी विपदा में प्रभु का चिन्‍तन और प्रभु और माता का आर्शीवाद लेना चाहिए तभी उसे सफलता मिलती है ।

यह स्‍पष्‍ट सिद्धांत है कि शुभ अवसर या विपत्ति में प्रभु और माता का चिन्‍तन और उनका आर्शीवाद ही हमारा मंगल करता है ।

प्रकाशन तिथि : 20 मई 2017
813 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 54
श्लो 60
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
महाराज ! भगवती लक्ष्‍मीजी को रूक्मिणी के रूप में साक्षात लक्ष्‍मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियों को परम आनन्‍द हुआ ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन प्रभु श्री शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को कहे ।

जब प्रभु ने सभी राजाओं को जीत कर भगवती माता रूक्मिणीजी को लेकर श्री द्वारकाजी में प्रवेश किया तो श्री द्वारकापूरी के घर घर में बड़ा उत्‍सव मनाया जाने लगा । प्रभु ने माता के साथ विधिपूर्वक विवाह किया । श्री द्वारकाजी के सभी नर नारी प्रभु से अनन्‍य प्रेम करते थे इसलिए सभी ने बहुत सुन्‍दर उत्‍सव मनाया जिसकी शोभा दिपावली से भी बड़ी विलक्षण थी । उस समय श्री द्वारकाजी की अपूर्व शोभा हो रही थी । सभी लोगों को बड़ा आनंद का अनुभव हुआ । सभी जगह श्री रूक्मिणी मंगल की कथा गायी जाने लगी ।

भगवती श्री लक्ष्‍मीजी को भगवती श्री रूक्मिणीजी के रूप में एवं लक्ष्‍मीपति प्रभु श्री नारायणजी को प्रभु श्री कृष्णजी के रूप में देखकर श्री द्वारकापूरी के नर नारियों को परम आनंद का अनुभव हुआ ।

प्रकाशन तिथि : 21 मई 2017
814 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 56
श्लो 26
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
प्रभो ! मैं जान गया । आप ही समस्‍त प्राणियों के स्‍वामी, रक्षक, पुराणपुरूष भगवान विष्‍णु हैं । आप ही सबके प्राण, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबल हैं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन ऋक्षराज श्री जाम्‍बवानजी ने प्रभु से कहे ।

जब श्री सूर्यनारायणजी प्रभु द्वारा दी गई स्‍यमन्‍तक मणि को श्री सत्राजित का भाई प्रसेन पहनकर वन में गया तो एक सिंह ने उसे मार डाला । सिंह को ऋक्षराज श्री जाम्‍बवानजी ने मार डाला और मणि लेकर अपनी गुफा में चले गये । प्रभु जब मणि को खोजते हुये गुफा में पहुँचे तो श्री जाम्‍बवानजी प्रभु को पहचान नहीं पाये और मणि के लिए प्रभु से उनका युद्ध हुआ । जब कई दिनों के युद्ध के बाद प्रभु की चोट से श्री जाम्‍बवानजी का शरीर टुटने लगा तो उन्‍हें ज्ञात हो गया की यह तो साक्षात प्रभु ही हैं । उन्‍होंने कहा कि मैं जान गया कि आप प्रभु ही हैं । उन्‍होंने कहा कि प्रभु समस्‍त प्राणियों के स्‍वामी हैं, समस्‍त प्राणियों के रक्षक हैं और पुराणपुरूष हैं । फिर जो उन्‍होंने प्रभु के लिए चार विशेषणों का प्रयोग किया वह ध्‍यान देने योग्‍य है । उन्‍होंने कहा कि प्रभु ही सभी के प्राणबल, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबल हैं ।

सभी के प्राण को, इन्द्रियों को, मन को और शरीर को जो बल मिलता है वह प्रभु से ही मिलता है ।

प्रकाशन तिथि : 21 मई 2017
815 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 56
श्लो 35
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
...... भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिये महामाया दुर्गादेवी की शरण में गये, उनकी उपासना करने लगे ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - इस श्‍लोक में भगवती जगजननी माता दुर्गाजी की उपासना के प्रभाव को दर्शाया गया है ।

जब प्रभु का श्री जाम्‍बवानजी के साथ कई दिनों तक युद्ध हुआ तो गुफा के बाहर जो लोग प्रभु के साथ वन में गये थे वे बारह दिन की प्रतिक्षा के बाद हताश होकर श्री द्वारकाजी लौट आये । प्रभु गुफा से बाहर नहीं आये जब ऐसा समाचार माता देवकीजी, श्री वसुदेवजी, भगवती माता रूक्मिणीजी और अन्‍य सम्‍बन्धियों ने सुना तो वे सभी अत्‍यन्‍त चिन्तित हुये । प्रभु के सकुशल लौटने के लिए सबने भगवती जगजननी माता दुर्गाजी की उपासना की और माता की शरण में गये । उनकी उपासना से माता प्रसन्‍न हुई और माता ने उन्‍हें आर्शीवाद दिया । माता के आर्शीवाद देते ही प्रभु मणि एवं नववधु भगवती माता जाम्‍बवतीजी को लेकर सकुशल लौट आये ।

माता जगत की जननी हैं एवं माता की आराधना कभी विफल नहीं जाती ।

प्रकाशन तिथि : 22 मई 2017
816 श्रीमद भागवतमहापुराण
(दशम स्‍कन्‍ध)
अ 57
श्लो 42
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
सर्वशक्तिमान सर्वव्‍यापक भगवान श्रीकृष्ण के पराक्रमों से परिपूर्ण यह आख्‍यान समस्‍त पापों, अपराधों और कलंकों का मार्जन करने वाला तथा परम मंगलमय है । .....


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु की कथा श्रवण का क्‍या फल होता है उसकी व्याख्या इस श्‍लोक में की गई है ।

सर्वशक्तिमान और सर्वव्‍यापक प्रभु के पराक्रम की कथा श्रवण करने से हमारे समस्‍त पापों का नाश होता है । प्रभु की कथा श्रवण करने से हमारे अपराधों का मार्जन होता है । प्रभु की कथा श्रवण करने से हमारे उपर लगे दोष का भी मार्जन हो जाता है । प्रभु की कथा श्रवण हमारा परम मंगल करती है । जो प्रभु की कथा पढ़ता, सुनता अथवा स्‍मरण करता है वह सभी प्रकार की अपकीर्ति और पापों से छुट जाता है । प्रभु की कथा श्रवण करने वाला परम शांति को प्राप्‍त करता है ।

इसलिए प्रभु की कथा का श्रवण जीवन में नित्‍य करने की आदत बनानी चाहिए क्‍योंकि ऐसा करना परम कल्‍याणकारी है ।

प्रकाशन तिथि : 22 मई 2017