श्री गणेशाय नम:
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क्रम संख्या श्रीग्रंथ अध्याय -
श्लोक संख्या
भाव के दर्शन / प्रेरणापुंज
265 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 30
श्लो 32
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
मनुष्‍य अपने कुटुम्‍ब का पेट पालने में जो अन्‍याय करता है, उसका दैवविहित कुफल वह नरक में जाकर भोगता है । उस समय वह ऐसा व्‍याकुल होता है, मानो सर्वस्‍व लुट गया हो ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त उपदेश प्रभु श्री कपिलजी ने माता देवहूति को दिये ।

प्रभु कहते हैं कि अपने कुटुम्‍ब पालने हेतु जीव जो अन्‍याय करता है उसका फल उसे नर्क में जाकर भोगना पडता है । उसे यातना शरीर मिलता है और उसे नर्क के असंख्‍य कष्‍टों के भोग को भोगना पडता है । जो जो गलत कार्य उसने पृथ्वी पर किये हैं उसका कुफल उसे नर्क यातना के रूप में मिलता है ।

नर्क की यातनायें उसे इतना व्‍याकुल कर देती है मानो उसका सर्वस्‍व ही लूट गया हो । वहाँ पर उसे बचाने के लिए उसका शरीर, स्त्री, पुत्र, ग्रह, पशु, धन, बन्‍धु कोई नहीं आता ।

इससे बचने का एकमात्र उपाय प्रभु की भक्ति है । सच्‍चे भक्‍त को नर्क के दर्शन ही नहीं होते, वह तो सीधे प्रभु के धाम को जाता है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 10 मई 2015
266 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 30
श्लो 34
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
मनुष्‍य-जन्‍म मिलने के पूर्व जितनी भी यातनाएं हैं तथा शूकर-कूकरादि योनियों के जितने कष्‍ट हैं, उन सबको क्रम से भोगकर शुद्ध हो जाने पर वह फिर मनुष्‍य योनि में जन्‍म लेता है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी ने उपरोक्‍त उपदेश माता देवहूति को दिये ।

प्रभु कहते हैं कि पूर्व जन्‍म में किये पातक के कारण जितने भी नर्क हैं और जितनी भी यातनायें हैं उन्‍हें भोगकर और फिर 84 लाख जन्‍मों के बाद जिसमे कूकर-शूकर आदि योनियां भी शामिल हैं, इन सबके बाद फिर मानव जीवन दोबारा मिलता है । विभिन्‍न नर्क एवं विभिन्‍न योनियों को भोगने के बाद शुद्ध होने पर फिर मनुष्‍य योनि में जन्‍म मिलता है ।

इतना दुर्लभ है मानव जन्‍म, प्रभु इस तथ्‍य का संकेत यहाँ पर करते हैं । इसलिए मिले हुये मानव जीवन को हमें व्‍यर्थ नहीं गवाना चाहिए और इसका सदुपयोग प्रभु भक्ति करके करना चाहिए ।

प्रभु की सच्‍ची भक्ति करने वाले को न तो नर्क की यातनायें भोगनी पडती है और न ही दोबारा जन्‍म ही लेना पडता है । इसलिए प्रभु भक्ति सर्वोच्च है जिसका अभ्‍यास जीवन में करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 10 मई 2015
267 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 31
श्लो 12
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
मैं बड़ा अधम हूँ; भगवान ने मुझे जो इस प्रकार की गति दिखायी है, वर मेरे योग्‍य ही है । वे अपनी शरण में आये हुए इस नश्‍वर जगत की रक्षा के लिये ही अनेक प्रकार के रूप धारण करते हैं; अत: मैं भी भूतल पर विचरण करने वाले उन्‍हीं के निर्भय चरणारविन्‍दों की शरण लेता हूँ ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी ने गर्भ में पडे जीव की दशा बताई है जो प्रभु से अरदास करता है कि उसे गर्भ से बाहर निकाले ।

जीव माता के गर्भ में मल मूत्र के गढे में पडा रहता है । वहाँ भूखे कीडे उसे नोचते हैं । माता के खाये हुये कड़वे, तीखे, गर्म, नमकीन, खट्टे आदि उग्र पदार्थ का स्‍पर्श उसके शरीर को पीडा देता है । उसकी पीठ और गर्दन कुण्‍डलाकार मुडे रहते हैं । वह पिंजरे में बंद पक्षी के समान पराधीन और अंगों को हिलाने डुलाने में असमर्थ रहता है । उसका दम घुटता है और अत्‍यन्‍त भयभीत होकर दीन वाणी से वह प्रभु से कृपा की याचना करता है और वहाँ से मुक्ति मांगता है ।

वह प्रभु की शरण लेता है और जीवनभर प्रभु की शरणागत रहने का वचन देता है । फिर प्रभु दया करके उसे माता के गर्भ से मुक्ति देते हैं । बाहर आकर वह प्रभु को भुल जाता है और माया में उलझ जाता है ।

हमें चाहिए की गर्भ में की गई हमारी प्रभु प्रार्थना को हम याद रखें और अपना जीवन प्रभु सेवा में अर्पित करें ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 17 मई 2015
268 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 31
श्लो 21
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
अत: मैं व्‍याकुलता को छोडकर हृदय में श्रीविष्‍णुभगवान के चरणों को स्‍थापित कर अपनी बुद्धि की सहायता से ही अपने को बहुत शीघ्र इस संसाररूप समुद्र के पार लगा दूंगा, जिससे मुझे अनेक प्रकार के दोषों से युक्‍त यह संसार-दुःख फिर न प्राप्‍त हो ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी कहते हैं कि जीव माता के गर्भ में बड़ी दयनीय स्थिति में रहता है ।

परंतु जब उसकी चिन्‍तन की शक्ति जागृत होती है और अपने पूर्व जन्‍मों के कर्म उसे याद आते हैं तो वह व्‍याकुल हो उठता है । फिर व्‍याकुलता को छोडकर अपने हृदय को प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्‍थापित करता है और अपनी बुद्धि को भी भगवान में लगाने का संकल्‍प लेता है जिससे संसाररूपी समुद्र को पार कर सके और अनेक दोषों से युक्‍त होने पर भी दोबारा संसार सागर में नहीं आना पडे ।

गर्भ में पडा जीव अपने सैकडों जन्‍मों के कर्म को याद कर और गर्भ की यातना को सहने पर अपना हृदय और अपनी बुद्धि प्रभु को समर्पित करने का निश्‍चय करके गर्भ से बाहर आता है ।

इसलिए गर्भ से बाहर आने पर हमें अपना हृदय और अपनी बुद्धि प्रभु को समर्पित करनी चाहिए तभी हमारा उद्धार संभव है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 17 मई 2015
269 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 31
श्लो 31
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
जो शरीर इसे वृद्ध वस्‍थ आदि अनेक प्रकार के कष्‍ट ही देता है तथा अविद्या और कर्म के सूत्र से बंधा रहने के कारण सदा इसके पीछे लगा रहता है, उसी के लिये यह तरह-तरह के कर्म करता रहता है - जिनमें बंध जाने के कारण इसे बार-बार संसार-चक्र में पडना होता है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी उपरोक्‍त उपदेश माता देवहूति को देते हैं ।

प्रभु कहते हैं कि जीव अपने शरीर के पीछे लगा रहता है और अपने शरीर के लिए नाना साधन करता है । वही शरीर वृद्ध होने पर उसे नाना प्रकार के कष्‍ट देता है । पर अविद्या और कर्म के सूत्र में बंधा जीव शरीर के पीछे ही लगा रहता है ।

वह जीव उस शरीर के पोषण के लिए नाना प्रकार के कर्म करता है और कर्म बंधन में आता है । उसी कर्म बंधन के कारण उसे पुन: जन्‍म मरण के चक्र में पडना पडता है । इस तरह वह संसार चक्र में घुमता ही रहता है ।

हमें चाहिए कि हम शरीर के पीछे न लग कर, भक्ति के द्वारा प्रभु के पीछे अपने को समर्पित करे तभी हम बंधन से मुक्‍त हो संसार चक्र से छुट पायें ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 24 मई 2015
270 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 31
श्लो 38
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
अहो ! मेरी इस स्त्रीरूपिणी माया का बल तो देखो, जो अपने भ्रकुटि-विलासमात्र से बड़े-बड़े दिग्विजयी वीरों को पैरों से कुचल देती है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी ने उपरोक्‍त तथ्‍य माता दवहूति के समक्ष कहें ।

प्रभु कहते हैं कि स्त्रीरूपी माया का बल तो देखो जो दिग्विजय किये हुये बड़े-बड़े वीरों को पैरो के तले कुचल देती है । एकमात्र प्रभु को छोडकर ऐसा कौन पुरूष हो सकता है जिसकी बुद्धि स्त्रीरूपिणी माया ने मोहित न किया हो ।

तपस्‍या करते-करते ऋषि विश्‍वामित्र को मेनका ने मोहित किया और उनकी तपस्‍या भंग की । दिग्विजय किये हुये एवं परम धार्मिेक और ज्ञानी राजा दशरथ को रानी कैकई ने मोहित किया और उनके कारण दो वर मागने पर श्री अयोध्‍याजी में अनर्थ हुआ ।

काम वासना बड़ी प्रबल है और यह भक्ति द्वारा प्रभु सानिध्य में रहने पर ही काबु में रहती है । प्रभु जिसपर कृपा करते हैं उसे ही इस वासना से छुटकारा मिलता है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 24 मई 2015
271 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 07
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
वे अन्‍त में सूर्यमार्ग के द्वारा सर्वव्‍यापी पूर्णपुरूष श्रीहरि को ही प्राप्‍त होते हैं - जो कार्य कारणरूप जगत के नियन्‍ता, संसार के उपादान कारण और उसकी उत्‍पत्ति, पालन एवं संहार करने वाले हैं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त उपदेश प्रभु श्री कपिलजी ने माता दवहूति को दिये ।

प्रभु कहते हैं की जो लोग सकामता से गृहस्‍थ धर्म का पालन करते हैं और तरह तरह की कामनाओ से मोहित होते हैं और देवताओ तथा पितरो की उपासना करते है, वे मृत्यु उपरान्‍त उनके धाम जाकर पूण्‍य क्षीण होने पर फिर इसी लोक में लौट आते हैं ।

पर जो जीव भोग विलास का उपभोग नहीं करते और प्रभु की प्रसन्‍नता के लिए कर्म करते हैं वे शुद्धचित हो जाते हैं और अन्‍त में प्रभु को प्राप्‍त होते हैं जो संसार के नियंता एवं कारण स्‍वरूप है और संसार की उत्‍पत्ति, पालन एवं संहार करने वाले हैं ।

इसलिए जीव को चाहिए की उसका मानव जीवन का अंतिम लक्ष्‍य प्रभु प्राप्‍ति ही होनी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 31 मई 2015
272 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 11
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
इसलिये माताजी ! अब तुम भी अत्‍यन्‍त भक्तिभाव से उन श्रीहरि की ही चरण-शरण में जाओ; समस्‍त प्राणियों का हृदय कमल ही उनका मन्दिर है और तुमने भी मुझसे उनका प्रभाव सुन ही लिया है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन प्रभु श्री कपिलजी ने माता दवहूति को कहें ।

प्रभु यहाँ दो बातों का प्रतिपादन करते हैं । पहला, प्रभु कहते हैं की भक्ति से हमें प्रभु की शरण में जाना चाहिए । भक्ति करते हुये प्रभु की शरणागत होना - यह हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए । प्रभु ने सीधा कहा है की भक्तिभाव से श्रीहरि के चरण-शरण में जाओ ।

दूसरा, प्रभु कहते है की प्रभु समस्‍त प्राणियों के हृदय कमल में रहते हैं, वही उनका स्‍थाई मंदिर है । प्रभु प्रत्‍येक जड और चेतन में समाये हुये हैं । प्रत्‍येक जीव के हृदय कमल में प्रभु का निश्‍चित वास है । इसलिए संतो ने प्रभु की खोज में अन्‍तरमुखी होने को कहा है क्‍योंकि हमारे अन्‍त:करण में ही प्रभु का वास है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 31 मई 2015
273 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 18
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
ये लोग अर्थ, धर्म, और काम के ही परायण होते हैं; इसलिये जिनके महान पराक्रम अत्‍यन्‍त कीर्तनीय हैं, उन भवभयहारी श्रीमधुसूदन भगवान की कथा-वार्ताओं से तो ये विमुख ही रहते हैं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी ने माता दवहूति से उपरोक्‍त वचन कहे ।

प्रभु कहते हैं कि जो लोग अर्थ (धन), धर्म, काम (कामना) के पीछे लगे रहते हैं वे अपना जीवन का उपयोग उसी हेतु के लिए करते हैं । वे पराक्रमी एंव भवभयहारी प्रभु जिनका यश अत्‍यन्‍त कीर्तनीय है उनके गुनानुवाद (प्रभु कथा) से वंचित रह जाते हैं ।

मनुष्‍य जीवन प्रभु का स्‍मरण, कीर्तन और गुनानुवाद करने के लिए हमें मिला है । इसे अगर हम सिर्फ धन कमाने, धर्म करने और कामना पूर्ति के लिए उपयोग करते हैं तो इसका लाभ अधिक नहीं होगा । धन कमाने से धन हमारे साथ जाने वाला नहीं, धर्म करने से अल्‍प समय के लिए हम स्‍वर्ग का सुख भोगकर फिर मृत्यु लोक में आना होगा और कामना पूर्ति के प्रयास से सभी कामना कभी पूर्ण होगी नहीं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 07 जून 2015
274 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 19
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
हाय ! विष्‍ठा-भोजी कूकर-सूकर आदि जीवों के विष्‍ठा चाहने के समान जो मनुष्‍य भगवतकथामृत को छोडकर निन्दित विषय-वार्ताओं को सुनते हैं - वे तो अवश्‍य ही विधाता के मारे हुए हैं, उनका बड़ा ही मन्‍द भाग्‍य है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त उपदेश प्रभु श्री कपिलजी ने माता दवहूति को दिये ।

प्रभु कहते हैं कि जो संसार के विषय वार्ताओ को सुनते हैं वे कुत्‍ते और सुअर की विष्‍ठा खाने के बराबर कर्म करते हैं । वे विधाता द्वारा भाग्‍य के मारे हुये होते हैं यानी मन्‍द भाग्‍य के होते हैं ।

जीव को चाहिए कि वह प्रभु की भगवत कथा अमृत का पान करे । जीव से यही अपेक्षा होती है कि वह भगवत चरित्र सुने । पर हम संसार के विषय वार्ताओ में रस लेते हैं ।

सच्‍चा भाग्‍यवान वे ही होते हैं जो प्रभु की कथाअमृत को सुनते हैं और मन्‍द भाग्‍य उनके होते हैं जो संसार के विषय वार्ताओ में उलझे रहते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 07 जून 2015
275 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 22
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
इसलिये माताजी ! जिनके चरण-कमल सदा भजने योग्‍य हैं, उन भगवान का तुम उन्‍हीं के गुणों का आश्रय लेने वाली भक्ति के द्वारा सब प्रकार से भजन करो ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी ने उपरोक्‍त उपदेश अपनी माता दवहूति को दिये ।

प्रभु कहते हें कि जिनके श्रीकमलचरण सदा भजनेयोग्‍य हैं ऐसे प्रभु के गुणों का आश्रय लेकर मन, वाणी एवं शरीर से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।

प्रभु ने यहाँ स्‍वयं भक्ति का प्रतिपादन किया है और कहा है कि मन, वाणी एवं शरीर को प्रभु भक्ति में लगाना ही श्रेयकर है । भक्ति के द्वारा प्रभु का सभी प्रकार से आश्रय लेकर भजन करना चाहिए । भक्ति ही जीव को तारने वाली है इसलिए मानव जीवन लेने पर हमें चाहिए कि हमें भक्ति से प्रभु तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 14 जून 2015
276 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 23
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
भगवान वासुदेव के प्रति किया हुआ भक्तियोग तुरंत ही संसार से वैराग्‍य और ब्रह्म साक्षात्‍कार रूप ज्ञान की प्राप्ति करा देता है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन प्रभु श्री कपिलजी ने माता दवहूति से कहे ।

प्रभु कहते हैं कि प्रभु की भक्ति तुरंत ही हमारे भीतर वैराग्‍य उत्‍पन्‍न कर देती है और ब्रह्म साक्षात्‍कार रूपी ज्ञान की प्राप्ति करवा देती है ।

भक्ति का ही सामर्थ्‍य है कि वह संसार से वैराग्‍य उत्‍पन्‍न करवा देती है अन्‍यथा जीव संसार में ही लिप्‍त रहता है । दूसरा, भक्ति का ही सामर्थ्‍य है कि वह प्रभु साक्षात्‍कार के लिए जरूरी ज्ञान की प्राप्ति करवाती है अन्‍यथा जीव संसारिक ज्ञान में ही उलझा रहता है ।

इसलिए जीवन में अविलम्‍ब भक्ति का आश्रय लेना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 14 जून 2015
277 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 33
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... वैसे ही शास्त्र के विभिन्‍न मार्गो द्वारा एक ही भगवान की अनेक प्रकार से अनुभूति होती है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री कपिलजी ने उपरोक्‍त वचन अपनी माता दवहूति को कहे ।

प्रभु कहते हैं कि शास्त्रों में भगवत प्राप्ति के विभिन्‍न मार्ग बताये हुये हैं पर उन सभी मार्गो से एक ही भगवान की प्राप्ति होती है ।

जैसे एक सरोवर के विभिन्‍न घाट होते हैं पर हर घाट से उतरने पर एक ही जल की प्राप्ति होती है वैसे ही विभिन्‍न शास्त्रयुक्‍त मार्गो से जाने पर एक ही परमात्‍मा की अनुभूति होती है ।

इसलिए शास्त्रयुक्‍त किसी भी मार्ग का चुनाव करके हम प्रभु तक पहुँच सकते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 28 जून 2015
278 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 32
श्लो 43
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
मां ! जो पुरूष मुझमें चित्‍त लगाकर इसका श्रद्धापूर्वक एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह मेरे परमपद को प्राप्‍त होगा ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त उपदेश प्रभु श्री कपिलजी ने अपनी माता दवहूति को दिया ।

प्रभु कहते हैं कि जो जीव प्रभु में अपने चित्‍त को लगाकर श्रद्धापूर्वक प्रभु के द्वारा दिये उपदेश का श्रवण करेगा और दूसरे भक्‍त के सामने इसका कथन करेगा वह प्रभु के परमपद को प्राप्‍त करेगा ।

हमें प्रभु के उपदेश चाहे वह प्रभु श्री कपिलजी द्वारा अपनी माता देवहूति को दिया हुआ अथवा प्रभु श्री कृष्णजी द्वारा श्रीमद भगवत गीता के माध्‍यम से अर्जुन को दिया हुआ का श्रद्धापूर्वक श्रवण करना चाहिए और प्रभु भक्‍तो के बीच इसका कथन भी करना चाहिए ।

जीवन में प्रभु उपदेशों का श्रवन और कथन हो तो जीवन पवित्र और प्रभुमय बनता है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 28 जून 2015
279 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 33
श्लो 06
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
भगवन ! आपके नामों का श्रवण या कीर्तन करने से तथा भूले-भटके कभी-कभी आपका वन्‍दन या स्‍मरण करने से ही कुत्‍ते का मांस खाने वाला चाण्‍डाल भी सोमयाजी ब्रह्माण के समान पूजनीय हो सकता है; फिर आपका दर्शन करने से मनुष्‍य कृतकृत्‍य हो जाय - इसमें तो कहना ही क्‍या है ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - माता देवहूति ने स्‍तुति करते हुये प्रभु श्री कपिलजी से उपरोक्‍त वचन कहे ।

भगवान के नामों का श्रवण और कीर्तन करने वाले की गति उत्‍तम होती है । भूले-भटके भी कोई प्रभु का वन्‍दन या स्‍मरण करता है तो भी वह पूजनीय हो जाता है ।

प्रभु का नाम कैसे भी लिया जायेगा वह मंगल ही करता है । कंस और रावण ने प्रभु का नाम वैर से लिया, अजामिल ने अपने बेटे को पुकारने के लिए प्रभु का नाम लिया और ऋषि वाल्मिकी ने प्रभु का नाम उलटा लिया पर प्रभु के नाम ने सबका मंगल किया ।

प्रभु का नाम कैसे भी लिया जाये वह जीव का मंगल ही करेगी - यह एक अनिवार्य सत्‍य है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 05 जुलाई 2015
280 श्रीमद भागवतमहापुराण
(तीसरा स्‍कन्‍ध)
अ 33
श्लो 07
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
अहो ! वह चाण्‍डाल भी इसी से सर्वश्रेष्‍ठ है कि उसकी जीव्हा के अग्रभाग में आपका नाम विराजमान है । जो श्रेष्‍ठ पुरूष आपका नाम उच्‍चारण करते हैं, उन्‍होंने तप, हवन, तीर्थस्‍नान, सदाचार का पालन और वेदाध्‍ययन - सब कुछ कर लिया ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - माता देवहूति प्रभु श्री कपिलजी की स्‍तुति करते हुये उपरोक्‍त वचन कहती हैं ।

एक चाण्‍डाल जो जाति में सबसे नीचा माना गया है, अगर उसके मुँह से भी प्रभु का नाम निकलता है तो वह भी सर्वश्रेष्‍ठ बन जाता है । फिर जो श्रेष्‍ठ जाति में जन्‍में हैं, ऐसे लोग जब प्रभु के नाम का उच्‍चारण करते हैं तब मानो उन्‍होंने तप, हवन, तीर्थस्‍नान, सदाचार पालन और वेदाध्‍ययन सब कुछ कर लिया । सबका फल उन्‍हें प्रभु के नाम को जपने से ही मिल जाता है ।

प्रभु नाम का उच्‍चारण हमारे मुँह से निरंतर होता रहे, ऐसा आग्रह शास्त्रों और संतो ने किया है ।

जीवन में प्रभु के नाम को जपने की आदत हमें बनानी चाहिए ।


अब हम श्रीमद भागवतमहापुराण के चतुर्थ स्‍कन्‍ध में प्रभु कृपा के बल पर मंगल प्रवेश करेंगे ।
श्रीमद भागवतमहापुराण के तीसरे स्‍कन्‍ध तक की इस यात्रा को प्रभु के पावन और पुनित श्रीकमलचरणों में सादर अर्पण करता हूँ ।
जगजननी मेरी सरस्‍वतीमाँ का सत्‍य कथन है कि अगर पूरी पृथ्वीमाता कागज बन जाये एवं समुद्रदेव का पूरा जल स्‍याही बन जायें, तो भी वे बहुत अप्रर्याप्‍त होगें मेरे प्रभु के ऐश्‍वर्य का लेशमात्र भी बखान करने के लिए - इस कथन के मद्देनजर हमारी क्‍या औकात कि हम किसी भी श्रीग्रंथ के किसी भी अध्‍याय, खण्‍ड में प्रभु की पूर्ण महिमा का बखान तो दूर, बखान करने की सोच भी पायें ।
जो भी हो पाया प्रभु के कृपा के बल पर ही हो पाया है । प्रभु के कृपा के बल पर किया यह प्रयास मेरे (एक विवेकशुन्‍य सेवक) द्वारा प्रभु को अर्पण ।
प्रभु का,
चन्‍द्रशेखर कर्वा


प्रकाशन तिथि : रविवार, 05 जुलाई 2015
281 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 01
श्लो 25
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
उनकी आँखों से कृपा की वर्षा हो रही थी ...... ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब अत्र‍ीमुनि तप करने लगे तब उनके तप से प्रसन्‍न होकर तीनों देव एक साथ प्रकट हुये ।

ऋषि अत्र‍ीजी ने पृथ्वी पर दण्‍ड के समान लोटकर प्रभु को प्रणाम किया और पुजन सामग्री हाथ में लेकर उनका पुजन किया ।

तब ऐसा प्रतीत हुआ मानो तीनों देवो की आँखों से कृपा की वर्षा हो रही थी । प्रभु के श्री नेत्र सदैव कृपा बरसाते रहते हैं । प्रभु अकारण ही कृपा करते हैं - यह प्रभु का स्‍वभाव है । जिस भी संत ने प्रभु के दर्शन को पाया है उसने प्रभु की कृपा का स्‍वयं अनुभव किया है । इसलिए संत प्रभु को कृपालु कह कर संबोधित करते हैं ।

प्रभु कृपा के सागर हैं - ऐसा सभी संतों का अनुभव है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 12 जुलाई 2015
282 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 01
श्लो 48
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... और एक संसार का संहार करनेवाले तथा जन्‍म-मृत्यु से छुडाने वाले भगवान शंकर को दी ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - श्री ब्रह्माजी के पुत्र दक्षप्रजापति की सोलह कन्‍याए थी । उनमें से एक भगवती माता सतीजी का विवाह प्रभु श्री महादेवजी से हुआ ।

यहाँ ध्‍यान देने योग्‍य बात यह है कि प्रभु श्री महादेवजी के लिए एक विशेषण का प्रयोग किया गया है ।

प्रभु जन्‍म-मृत्यु के चक्र से छुडाने वाले हैं - ऐसा कहा गया है । यह एक शाश्‍वत सत्‍य है कि मनुष्‍य को जन्‍म-मरण के चक्‍कर से प्रभु के अलावा कोई भी नहीं छुडा सकता है । जीव जन्‍म-मरण के चक्‍कर में फंसा रहता है और अनेक योनियो में भटकता रहता है । एकमात्र प्रभु ही हैं जो कृपा करके उसे इस जन्‍म-मरण के चक्‍कर से सदैव के लिए छुडाते हैं ।

जिसने भी जन्‍म-मरण के चक्‍कर से मुक्ति पाई है वह प्रभु कृपा के कारण ही पाई है ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 12 जुलाई 2015
283 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 04
श्लो 14
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
जिनका "शिव" यह दो अक्षरों का नाम प्रसंगवश एक बार भी मुख से निकल जाने पर मनुष्‍य के समस्‍त पापों को तत्‍काल नष्‍ट कर देता है और जिनकी आज्ञा को कोई भी उल्‍लंघन नहीं कर सकता .....।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - भगवती माता सती ने उपरोक्‍त वाक्‍य दक्षप्रजापति की सभा के मध्‍य कहे जब उन्‍होंने देखा कि यज्ञ में प्रभु श्री शंकरजी के लिए कोई भाग नहीं दिया गया है ।

माता कहती हैं कि अकारण या प्रसंगवश भी जिनके मुख से प्रभु के दो अक्षरो का नाम "शिव" निकल जाता है उस मनुष्‍य के समस्‍त पाप तत्‍काल ही समाप्‍त हो जाते हैं । दूसरी बात जो कही गई है वह यह कि प्रभु आज्ञा का उल्‍लंघन कोई नहीं कर सकता ।

जैसे कपास (रूई) के एक बड़े गोदाम में एक अग्नि की चिंगारी लग जायेगा तो कुछ ही समय में पूरा कपास जल जाता है वैसे ही प्रभु का सच्‍चा नाम मुख से निकल जाये तो समस्‍त पाप जल जाते हैं । इसलिए प्रभु के नाम के जप की आदत जीवन में बनानी चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 26 जुलाई 2015
284 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 04
श्लो 15
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
अरे ! महापुरूषों के मन-मधुकर ब्रह्मानन्‍दमय रस का पान करने की इच्‍छा से जिनके चरणकमलों का निरन्‍तर सेवन किया करते हैं और जिनके चरणारविन्‍द सकाम पुरूषों को उनके अभीष्‍ट भोग भी देते हैं..... ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - भगवती माता सती ने उपरोक्‍त वचन अपने पिता प्रजापति दक्ष के सभा में कहे ।

माता कहती हैं कि महापुरूषों का मन ब्रह्मानंद के रस का पान करने की इच्‍छा से प्रभु श्री शिवजी के श्रीकमलचरणों का निरन्‍तर सेवन करता है । जो सकामता चाहते हैं प्रभु श्री शिवजी के श्रीकमलचरण उनको उनके अभीष्‍ट भोगो को प्रदान करते हैं ।

प्रभु के श्रीकमलचरण निष्काम पुरूषों को ब्रह्मानंद के रस की प्राप्ति और सकाम पुरूषों को उनकी इच्‍छाओं की पूर्ति करवाते हैं । अत: दोनों ही अवस्‍था में प्रभु के श्रीकमलचरणों का नित्‍य ध्‍यान और सेवन करना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 26 जुलाई 2015
285 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 06
श्लो 05
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
..... परंतु शंकरजी बहुत शीघ्र प्रसन्‍न होने वाले हैं, इसलिये तुम लोग शुद्ध हृदय से उनके पैर पकडकर उन्‍हें प्रसन्‍न करो - उनसे क्षमा मांगो ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री ब्रह्माजी ने उपरोक्‍त बात देवतागण से कही जब प्रभु श्री शंकरजी के रूष्‍ट होने पर वीरभद्र द्वारा यज्ञ का विध्‍वंस करने पर देवताओ को वहाँ से भागना पडा ।

प्रभु श्री ब्रह्माजी कहते हैं की प्रभु श्री शंकरजी आसुतोष हैं और बहुज जल्‍दी प्रसन्‍न होने वाले हैं । इसलिए शुद्ध हृदय से उनके श्री कमलचरणों को पकड कर उन्‍हें प्रसन्‍न करने का प्रयास करो ।

ध्‍यान देने योग्‍य बात यह है की प्रभु बहुत जल्‍दी प्रसन्‍न होते हैं अगर हम हृदय की गहराई से अपनी गल्‍ती मानते हैं । गल्‍ती मानने पर प्रभु हमें तुरंत क्षमा कर देते हैं - यह प्रभु का स्‍वभाव है ।

इसलिए अगर कोई गल्‍ती हो जाये तो जीव को चाहिए की वह प्रभु से सच्‍चे मन से क्षमा याचना करे और भविष्‍य में उस गल्‍ती को नहीं दोहराने का संकल्‍प करे, तब प्रभु उसे तत्‍काल क्षमा कर देते हैं ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 02 अगस्‍त 2015
286 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 06
श्लो 37
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
वे एक कुशासन पर बैठे थे और अनेकों साधु श्रोताओं के बीच में श्री नारदजी के पुछने से सनातन ब्रह्म का उपदेश कर रहे थे ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - जब देवतागण प्रभु श्री शंकरजी से क्षमा मागने के लिए श्रीकैलाश पर्वत पर पहुँचे तो उन्‍होंने देखा की प्रभु श्री शंकरजी वहाँ बैठे हैं और साधुगणों एवं श्री नारदजी को ब्रह्म का उपदेश कर रहे हैं ।

ध्‍यान देने योग्‍य बात यह है की सत्‍संग का महत्‍व यहाँ प्रकट होता है । प्रभु स्‍वयं ब्रह्म चर्चा करते हैं एवं साधुओ को सत्‍संग का लाभ प्रदान करते हैं । प्रभु यहाँ बताना चाहतें हैं की नित्‍य सत्‍संग किया जाना चाहिए ।

जो जीव नित्‍स सत्‍संग कर ब्रह्म चर्चा करता है उसने ही मानव जन्‍म लेकर मानव जीवन का सच्‍चा लाभ लिया है । हमारे सभी ऋषि मुनियों ने सदैव ब्रह्म चर्चा रूपी सत्‍संग किया है ।

हमें भी चाहिए की हम नित्‍य सत्‍संग में ब्रह्म चर्चा कर अपने मानव जीवन को सफल बनाये ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 02 अगस्‍त 2015
287 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 06
श्लो 45
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
आप शुभ कर्म करने वालों को स्‍वर्गलोक अथवा मोक्षपद प्रदान करते हैं तथा पापकर्म करने वालों को घोर नरकों में डालते हैं ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - प्रभु श्री ब्रह्माजी ने उपरोक्‍त वचन प्रभु श्री शिवजी से कहे ।

प्रभु शुभकर्म करने वाले को उसकी योग्‍यता अनुसार स्‍वर्गलोक या मोक्षपद प्रदान करते हैं और पापकर्म करने वाले को अनेक प्रकार के जो नर्क है उसमें डालते हैं ।

इसलिए जीव को चाहिए कि जीवन में शुभकर्म करने का प्रयास करे । हमसे जीवन में शुभकर्म हो इसका निरंतर ध्‍यान रखना चाहिए ।

हमसे पापकर्म न हो इसका भी विशेष ध्‍यान रखना चाहिए । श्री गरूडपुराण जी में नर्को का वर्णन है कि कितने प्रकार के नर्क हैं और कौन-कौन से पापकर्म करने पर किस-किस नर्क में कौन-कौन सी यातना जीवात्‍मा को झेलनी पडती है ।

इसलिए जीवन में पापकर्म से दूर रहना और शुभकर्म करते रहने का प्रयास जीवन में करते रहना चाहिए ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 09 अगस्‍त 2015
288 श्रीमद भागवतमहापुराण
(चतुर्थ स्‍कन्‍ध)
अ 06
श्लो 50
श्लोक का हिंदी अनुवाद -
भगवान ! आप सबके मूल हैं ..... ।


श्लोक में व्यक्त भाव एवं श्लोक से प्रेरणा - उपरोक्‍त वचन प्रभु श्री ब्रह्माजी ने प्रभु श्री शिवजी को कहे ।

इस छोटे से वाक्‍य में एक बहुत बड़ी बात का प्रतिपादन मिलता है । प्रभु सभी के मूल में स्थित हैं - यह समझना जरूरी है । हर जड एवं चेतन के मूल में प्रभु हैं । प्रभु के अलावा इस जग में कुछ है ही नहीं । इसलिए संतों ने पूरे जग को प्रभुमय देखा है । कण कण में भगवान - यह सनातन धर्म का दृष्टीकोण रहा है ।

जब हम सबके मूल में स्थित भगवान के दर्शन हर जगह पर करने लगेगे तभी हमारा सच्‍चा कल्‍याण होगा । यह दृष्टीकोण सिर्फ भक्ति के कारण ही जीवन में आ सकता है । इसलिए जीवन में भक्ति को बढाना चाहिए जिससे कण कण में प्रभु की अनुभूति हो और प्रभु सबके मूल में हैं यह सिद्धांत जीवन में दृढ हो जाये ।

प्रकाशन तिथि : रविवार, 09 अगस्‍त 2015