श्री गणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : मृत्यु के बाद हमें क्या गति चाहिए यह हमें सोचना चाहिए और उस अनुरूप ही अपने जीवन में आचरण करना चाहिए । अगर हम ऐसा करने से चूक जाएंगे तो हमारा मानव जीवन ही व्यर्थ चला जाएगा । पूरा लेख नीचे पढ़े -



मृत्यु के बाद हमें अपनी गति क्या करनी है यह हमारे हाथ में है । प्रभु ने हमें पूर्ण स्वतंत्रता दी है कि हम अपने मानव जीवन में किए उपक्रम से अपनी मृत्यु पश्चात के जीवन का निर्धारण कर सकें । दुर्भाग्य यह है कि हम अपने मानव जीवन को तो मजे से जीते हैं परन्तु हमारा ध्यान मृत्यु के पश्चात हमारा क्या हश्र होगा उस ओर जाता ही नहीं ।


मृत्यु बाद हमें फिर से चौरासी लाख योनियों में जन्म लेना है और उसके अंतर्गत पशु, पक्षी, जलचर या वनस्पति बनना है, यह हमारे हाथ में है । हमें मृत्यु के बाद नर्क की यात्रा करनी है, यह भी हमारे हाथ में है । हमें मृत्यु बाद स्वर्ग जाना है, यह भी हमारे हाथ में है । सबसे महत्वपूर्ण बात कि हमें मृत्यु बाद संसार चक्र से मुक्त होकर प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचना है, यह भी हमारे ही हाथ में है ।


मृत्यु बाद हमारा क्या होना चाहिए इस लक्ष्य का पहले निर्धारण करके ही हमें अपना जीवन जीना चाहिए । पर हम इतना विवेक भी नहीं रखते कि ऐसा कर पाएँ । हम बुढ़ापे के लिए धन-संपत्ति अर्जित करने जितना विवेक तो रखते हैं पर बुढ़ापे के बाद मृत्यु के पश्चात हमारी क्या गति होगी उस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता ।


अगर हमें चौरासी लाख योनियों में फिर से जन्म लेना है तो खूब दुनियादारी करनी चाहिए, खूब भोग भोगने चाहिए, खूब संग्रह करना चाहिए, खूब मौज-मस्ती जीवन में करनी चाहिए । अगर हमें स्वर्ग जाना है तो खूब दान-पुण्य करना चाहिए पर स्वर्ग जाने के बाद भी हमारा किया पुण्य भोग लेने पर हमें वापस मृत्युलोक भेज दिया जाएगा । अगर हमें नर्क जाना है तो अनीति, असत्य, हिंसा एवं अन्य दुराचार करने में परहेज नहीं करना चाहिए जिस कारण पाप को भोगने के लिए नर्क की यात्रा करनी पड़ेगी ।


पर अगर हमें संसार चक्र से छूटना है, आवागमन से मुक्त होना है और अपने इस जन्म को ही अंतिम जन्म बनाना है तो हमें प्रभु की भक्ति ही करनी पड़ेगी । अगर हमारा निश्चय ऐसा है तो हमें व्यर्थ की दुनियादारी तत्काल त्यागनी होगी । हमें विषयों के भोग और संग्रह से दूर रहना पड़ेगा । हमें गलत कर्म जैसे अनीति, असत्य, हिंसा और दुराचार से बचना होगा । हमें अपने जीवनयापन के लिए निहित सात्विक कर्म करने के बाद बचा हुआ समय प्रभु की भक्ति में लगाना पड़ेगा ।


भरपूर दुनियादारी करके हम अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा व्यर्थ गंवा देते हैं । भरपूर दुनियादारी सफलता से करने पर भी हमें तीन-चार पीढ़ियों बाद याद नहीं रखा जाएगा और भुला दिया जाएगा । हम भोगों को नहीं अपितु भोग हमें भोगकर शिथिल कर देंगे । जीवन भर किया हुआ संग्रह अंत में हमारे किसी काम नहीं आएगा ।


इसलिए अपने मानव जीवन का लक्ष्य जो कि प्रभु प्राप्ति है उसके लिए श्रम करने में अपना जीवन लगाना चाहिए और प्रभु की भक्ति करनी चाहिए जो प्रभु प्राप्ति का श्रेष्‍ठतम साधन है ।