श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : भष्टाचार, अनीति, दुर्विनियोग तभी होते हैं जब हमारी अंतरआत्मा हमें ऐसा करने से रोकती नहीं हैं | प्रभु की सच्ची भक्ति में कमी के कारण आज हमने अपनी अतंरआत्मा की आवाज को दबा दिया है या शायद उसे मार ही दिया है | पूरा लेख नीचे पढ़े -



एक मंदिर है जहाँ साफ सफार्इ का पूरा ध्यान रखा जाता है । मैं रोजाना वहाँ मंदिर सेवको को नियमित सफार्इ करते / पौछा लगाते देखता हूँ । निरंतर मंदिर प्रांगण में पौछा लगते रहने पर भी रोजाना पौछे का पानी काला / मैला हो जाता है, यानी मैल निकल ही आता है । मैनें कभी ऐसा नहीं देखा कि पौछे का पानी, पौछा लगने के बाद साफ रहा हो । मैं वो दिन देखना चाहता हूँ जब पौछे के बाद पानी एकदम स्वच्छ दिखे (यानी कोर्इ गंदगी नहीं निकले) । पर यह संभव नहीं लगता क्योंकि दिन भर मंदिर में दर्शनार्थी का / सामान-सामग्री का आना जाना लगा रहता है ।


ऐसे ही हमारे मन में भी सभी प्रकार के संसारिक विचारों का निरंतर आना-जाना लगा रहता है और इससे गंदगी होती रहती है । शुद्ध अवस्था के मन को भी मैला होते देर नहीं लगती । उदाहरण स्वरूप आप देखें कि एक बच्चे की 2-3 वर्ष की अवस्था में मन कितना शुद्ध और विकार रहित होता है । फिर हर बढते वर्ष में अशुद्धि बढती जाती है । बडो को देखकर बच्चा झुठ बोलना सीखता है, अन्य बहुत सारी बुराईयां आती चली जाती है । अच्छार्इ को देखकर सिखने में और अच्छार्इ को अपने मन-मस्तिष्क में उतारने में बड़ा श्रम है पर बुराईयां बिना श्रम ही मन- में उतर कर, चिपक जाती है ।


अच्छार्इ को ग्रहण करना और बनाये रखना बड़ा कठिन है । पर बुराइयों को ग्रहण करना और अपनाये रखना बड़ा आसान है क्योंकि यह स्वत: होने वाली प्रक्रिया है, इसमें हमारे श्रम की आवश्यकता नहीं होती ।


बुरार्इयां हमसे चिपके नहीं - इसकी सावधानी रखने में श्रम की जरूरत होती है । और जो बुरार्इयां हमारे मन-मस्तिष्क में वास कर रही हैं, उन्हें त्यागने में भी श्रम की जरूरत होती है । इसलिए सबसे सरलतम उपाय है, सबसे सरलतम साधन है कि नित्य प्रभु भक्ति द्वारा प्रभु सानिद्ध में रहकर मन-मस्तिष्क को पोछते रहना – भक्ति का पोछा लगाते हुये स्वच्छ रखना । प्रभु सानिद्ध की एक विलक्षण और अदभूत शक्ति है कि स्वत: ही हमारे मन-मस्तिष्क की शुद्धिकरण और सफार्इ करती रहती है । जैसे कम्प्युटर में ऐन्टी-वार्इरस सोफ्टवेयर अपना काम निरंतर करता रहता है - भीतर की सफार्इ करता है और बाहर से अवांछित चीजों को कम्प्युटर में प्रवेश करने से रोकता है । वैसे ही हमारे मन-मस्तिष्क में प्रभु भक्ति / प्रभु सानिद्ध भी बुराइयों की सफार्इ करती है और बाहर से अवांछित बुराईयां / विकार के लिए प्रवेश निषेध कर देती है ।


विश्व की किसी भी अन्य वस्तु में सामर्थ्य नहीं / किसी चीज में ताकत नहीं कि वह हमारे मन-मस्तिष्क को शुद्ध कर सके । यह ताकत, यह सामर्थ्य सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ति में ही है । उदाहरण स्वरूप प्रभु सत्ता से डरने वाला, प्रभु की भक्ति करने वाला एक मनुष्य कभी अनैतिक कृत्य नहीं करेगा । उसे पता है कि अनैतिक कृत्य के लिए उसे मृत्यु उपरान्त दंडित होना पडेगा और अपनी मैली चादर लेकर वह प्रभु के द्वार में प्रवेश नहीं कर पायेगा । प्रभु की भक्ति ने, प्रभु प्रेम ने उसके मन-मस्तिष्क को इतना पवित्र कर दिया कि वह बुराइयों से बचता-बचता जीवन यापन करता है । ऐसा व्यक्ति रिश्वत नहीं लेगा, अपने व्यापार में नाप-तोल में गडबडी नहीं करेगा, मिलावट नहीं करेगा, किसी के हक को नहीं मारेगा ।


संसार में रहकर ऐसा दिन कभी भी नहीं आयेगा कि हमारा मन मैला ही न हो । संसार तो हमेशा गंदगी देगा और प्रभु सानिद्ध से ही उसकी सफार्इ संभव है ।


रिश्वत का पैसा हमें आकर्षित नहीं करे, जीवन मूल्यों और सिद्धान्तों से हम डिगे नहीं, व्यापार में नाप-तोल में हेराफेरी या मिलावट करने का विचार मन में आये ही नहीं - यह सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ति में ही करवाने की ताकत है और प्रभु भक्ति के बल पर ही ऐसा संभव है । सच्ची प्रभु भक्ति की यह कसौटी है । अगर ऐसा नहीं है तो हमारी भक्ति सच्ची नहीं है अपितु दिखावटी है, जिसका कोई विशेष लाभ नहीं है ।


अशुद्ध विचार , अवांछित र्इच्छाओं / वासनाओं को मन-मस्तिष्क से दूर रखने का एकमात्र और सरलतम उपाय है –प्रभु की सच्ची भक्ति । प्रभु की सच्ची भक्ति ही शुद्ध विचार, शुद्ध आचरण, शुद्ध इच्छा और शुद्ध वासना की कुंजी / स्त्रोत्र है ।


धन्यवाद ज्ञापन

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