श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : भक्ति में अनन्यता बिना प्रभु प्राप्ति संभव नहीं है । हम भक्ति तो करते हैं पर भक्ति में अनन्यता नहीं ला पाते इसलिए जीवन में प्रभु प्राप्ति नहीं कर पाते । पूरा लेख नीचे पढ़े -



बहुत लोग मानते हैं कि वे प्रभु की भक्ति करते हैं । ऐसा मानने में कोई दोष नहीं है । पर हमें अपनी अन्‍तरात्‍मा से पूछना चाहिए कि क्या वास्तव में हमारी भक्ति अनन्य है । अनन्यता ही भक्ति का गौरव है ।


उन्हीं ने प्रभु को पाया है जिन्होंने अनन्यता पूर्वक प्रभु की भक्ति की है । भक्ति में अनन्यता बहुत जरूरी है । अनन्यता बिना भक्ति करके प्रभु प्राप्ति संभव ही नहीं है ।


भगवती मीराबाई का एक अमर पद है "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई" । मेरे तो गिरधर गोपाल, यहाँ तक तो सभी मानते हैं । पर दूसरों न कोई, यहाँ पर हमारी चूक हो जाती है क्योंकि हमारे में भगवती मीराबाई जैसी अनन्यता नहीं है ।


प्रभु भी मेरे और संपत्ति भी मेरी, प्रभु भी मेरे और परिवार भी मेरा, प्रभु भी मेरे और व्यवसाय भी मेरा, यह अनन्यता नहीं हुई । अनन्यता की सच्ची परिभाषा यह है कि प्रभु के लिए यहाँ "भी" की जगह "ही" लगाना पड़ता है । हम प्रभु के भी हैं और समाज के भी हैं यह अनन्यता नहीं । हम केवल प्रभु के ही हैं, यह अनन्यता हुई ।


हमने चौरासी लाख योनियों में कितनी बार जन्म लिया और उसमें कितनी ही बार मनुष्य देह भी पाया है । पर अनन्यता के अभाव से हमारी भक्ति सिद्ध नहीं हो पाई और हमें जन्म-मृत्यु के बंधन से छुड़ा प्रभु के श्री कमलचरणों में स्थान नहीं दिला पाई । भक्ति में इतना बड़ा सामर्थ्‍य है कि अगर हम अपनी भक्ति में अनन्यता ले आये तो भक्ति हमारा उसी जन्म में उद्धार करवा देती है और प्रभु के श्री कमलचरणों में हमें पहुँचा देती है ।


भक्ति में अनन्यता के अभाव में आज तक हम भटक रहे हैं और जब तक हम अपनी भक्ति में अनन्यता नहीं ला पायेंगे हम भटकते ही रहेंगे । साधारण भक्ति को पराभक्ति बनाने के लिए अनन्यता अति आवश्यक होती है । अनन्यता के बिना प्रभु रीझते नहीं, यह पक्का सिद्धांत है ।


अगर हम बिना अनन्यता के भक्ति करेंगे तो हम जो प्रभु से मांगेंगे वह मिलेगा पर प्रभु नहीं मिलेंगे । जब तक जीवन में प्रभु नहीं मिलेंगे शांति और विश्राम नहीं मिलेगा ।


संसार भी मेरा है और प्रभु भी मेरे हैं यह मानना सही नहीं है । यहाँ "भी" की जगह अगर हमने "ही" लगा दिया कि केवल प्रभु ही मेरे हैं तो ही हमारा उद्धार इस अनन्यता के कारण संभव होगा । अब तक कितने कितने पूर्व जन्मों में हमने प्रभु के लिए "भी" लगाया, एक बार इस जन्म में "ही" लगाकर भी देखें ।


केवल और केवल प्रभु ही मेरे हैं, ऐसी अनन्यता आने पर उस जीव का कल्याण करने की पूरी जिम्मेवारी प्रभु ले लेते हैं । उसका इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है । प्रभु "भी" मेरे हैं यह तो हम कहते आये हैं पर प्रभु को तो "ही" सुनने की भूख है कि कोई कह देवे कि केवल प्रभु "ही" मेरे हैं ।