श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु की शरणागति हमें जीवन की विपत्ति में बहुत बड़ा बल देती है और हमारा उद्धार करती है । प्रभु ने शास्त्रों में कहे अपने श्रीवचनों में भी शरणागति का बहुत बड़ा महत्व बताया है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



कभी-कभी प्रारब्धवश किसी जीव के जीवन में घोर विपदा आती है । हमारे पूर्व जन्मों के संचित पापों के कारण और जीवन में प्रभु का भजन नहीं होने के कारण जीव घोर विपदा और प्रतिकूलता में घिर जाता है ।


कभी-कभी विपत्ति की बेला इतनी कड़ी होती है कि जीव के पास आत्महत्या करना ही विकल्प रूप में बचता है । वह घोर विषाद में चला जाता है और जीवन को आत्मघात करके अंत करना ही उसे एकमात्र राह दिखती है । विपत्ति उसे जकड़ चुकी होती है, उसकी विपत्ति से लड़ने की क्षमतायें खत्म हो चुकी होती है और वह मानता है कि वह जीवन की बाजी हार चुका है ।


ऐसी घोर विपदा में उसके पास एक और विकल्प बचता है जिसे वह प्राय: नजरअंदाज कर चुका होता है । यह विकल्प है प्रभु की शरणागति ग्रहण करने का । जब कोई भक्त या संत के कारण या कोई सत्संग के प्रभाव के कारण वह इस विकल्प को पहचान पाता है और उसके मन में यह बात दृढ़ता से उतर जाती है कि इससे उसकी सभी विपदाओं का निश्चित अंत हो जायेगा तो वह विषाद से बाहर आ जाता है । ऐसा इसलिए क्योंकि आत्मघात के मुकाबले यह बहुत सरल और प्रभावी विकल्प है ।


आत्मघात करके हम अपने अमूल्य मानव जीवन को ही नष्ट कर लेते हैं । मुर्खता में हमने इतनी योनियों में भटकने के बाद प्रभु की कृपा के फलस्वरूप प्राप्त अनमोल मानव जीवन का ही अंत कर लिया । दूसरी तरफ प्रभु की शरणागति लेकर हम उस विपदा से तो निकलते ही हैं और साथ ही अपने मानव जीवन को भी सफल कर लेते हैं क्योंकि प्रभु की शरणागति ही मानव जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य है ।


बहुत सारे भगवद भक्तों ने घोर विपत्ति में और अंतिम बेला में प्रभु की शरणागति ग्रहण की और प्रभु ने तत्काल उनका उद्धार किया । शरणागति लेना हमारा काम है और शरणागत की रक्षा और उसका उद्धार करना प्रभु का कार्य है । प्रभु अपना कार्य सदैव से करते आये हैं और करते रहेंगे पर चूक हमसे ही हो जाती है । हम ही अपनी विपत्ति में उलझे रहते हैं, विषाद में चले जाते हैं, आत्मघात की सोचते हैं पर इन सबसे सरल प्रभु की शरणागति ग्रहण नहीं करते ।


प्रभु की शरणागति ग्रहण करते ही जीव की रक्षा और कष्ट निवारण का दायित्व स्वतः ही प्रभु पर आ जाता है । प्रभु अपना दायित्व बखूबी निभाते हैं । प्रभु का कितना बड़ा आश्वासन है सभी के लिए कि किसी भी परिस्थिति में प्रभु की शरण में आ जायें तो उसके उद्धार का दायित्व प्रभु तत्काल ले लेते हैं ।


प्रभु के शरणागत होकर जीया हुआ जीवन ही सबसे उत्तम होता है और सबसे सफल होता है । इसलिए जीव को जीवन के प्रारंभ काल से ही प्रभु की शरणागति ग्रहण करके जीवन जीना चाहिए जिससे उसका कभी अमंगल होने की संभावना ही खत्म हो जाये ।


धन्यवाद ज्ञापन

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