श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु के सानिध्‍य एंव माया के सानिध्‍य के बीच तुलना करने वाला लेख है | लेख में प्रकाश डाला गया है कि प्रभु के सानिध्‍य में रहने पर कैसे हमारा विकाश एंव माया के सानिध्‍य में कैसे हमारा विनाश होता है | पूरा लेख नीचे पढ़े -



प्रभु से दूर जाते ही हमारा पतन और विनाश सुनिश्चित हो जाता है । इसलिए जीवन के हर पल, पल पल प्रभु के समीप, प्रभु के सानिध्य में रहना ही हमारे श्रेष्‍ठ हित में है ।


इसका जीवन में निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए क्योंकि प्रभु की माया का वेग इतना प्रबल है कि प्रभु से दूर होते ही वह हमें बहा कर ले जाती है । माया फंसाती जाती है और हमारे भीतर की अतृप्ती / कामनायें / वासनायें बढती चली जाती है । यही माया का स्वभाव है ।


मेरे प्रभु का नैसर्गिक स्वभाव है कि जीव को उबारते जाते हैं एवं प्रभु का सानिध्य जीव को तृप्त करता जाता है ।


जीवन की यह दो विपरित दिशायें हैं जिसके फल भी एक दुसरे के विपरित है । पर र्दुभाग्यवश हम माया के अशुभ फल को ही पाने के लिए लालायित रहते हैं, उसको पाने के लिए दौड-भाग करते हैं । हम जीवन सागर में गोता लगाकर कंकड (माया) लेकर खुशी खुशी बाहर आते हैं और अनमोल रत्न (प्रभु) से वंचित रह जाते हैं


जीवन सागर में (मनुष्य जन्म लेकर) गोता लगाया था अनमोल रत्न पाने हेतु, पर ले आये कंकड - कितना बडा र्दुभाग्य । इससे भी बडी हानि कि हम कंकड (माया) पाकर खुश होते रहते हैं और अपने र्दुभाग्य का हमें आभास भी नही होता क्यों कि हम उसे सौभाग्य समझ बैठे हैं । हमारी स्थिति ठीक वैसी है जैसे एक बच्चा परिक्षा में फेल हो गया और फिर भी खुशी से फुला नही समा रहा और मिठाईयां खा रहा है / बांट रहा है ।


प्रभु से दूर जाने से हमारा पतन और विनाश एंव प्रभु सानिध्य में रहने से हमारा श्रेष्ठत्तम हित - अगर इतनी सी बात अगर हमारे मन और मस्ति‍क (हृदय और बुद्धि) में बैठ जाये तो हम सैदव प्रभु के पास रहने के / समीप रहने के / सानिध्य में रहने के अवसर और बहाने खोजते नजर आयेगें । हमारी इच्छा प्रभु के विषय में पढने, श्रवण करने की, प्रभु सेवा की, तीर्थ सेवन की होने लगेगी । यह शुभ वासना हमें कभी भी नये कर्म-बंधन में नहीं बांधती और पुराने पातककर्म भी गला देती है ।


इसके ठीक विपरित माया में फंसे जीव की अशुभ वासना उसके लिए नये कर्म-बंधन तैयार करती जाती है और पुराने कर्म-बंधन के बोझ से दबा जीव पर और भार बढाती है ।


जीवन में प्रभु सानिध्य में रहने की आदत हो जाये तो प्रभु सानिध्य के प्रभाव के कारण हम विचारो से, हृदय से पवित्र होने लगते हैं । प्रभु के सानिध्य में एक अदृश्य गोलाकार रेखा बन जाती है जिसके अंदर हम र्सवदा / सदैव के लिए सुरक्षित हो जाते हैं । जैसे लक्ष्मण-रेखा को रावण जैसा दुष्ट भी नही लांध पाया, भीतर प्रवेश नही कर पाया, वैसे ही बुरार्इयां ( काम, क्रोध, द्वेष, लोभ, इर्ष्या, अहंकार, हिंसा इत्यादि ) प्रभु के गोलाकार रेखा के अंदर प्रवेश नही करती । प्रभु संरक्षण हमें बुरार्इयों से, माया के कूप्रभाव से बचाये रखने का एकमात्र सटीक और सरलतम उपाय है ।


पर हम प्रभु के संरक्षण की जगह माया के संरक्षण में बैठे हैं और तभी बुरार्इयां और माया के कूप्रभाव से हम घीरे रहते हैं। हमारे भीतर क्रोध, लालच, इर्ष्या, बदले की भावना, मेरी एक आंख के बदले उसकी दो आंखे फुटे की भावना, हिंसा की प्रवति, कथनी करनी में र्फक, अनैतिक धन र्अजन, अहंकार, दिखावा इत्यादि बड़ी लम्बी बुरार्इयों की फौज का आक्रमण होता रहता है । बुरार्इयों की जीत होती है और फिर बुरार्इयां का हमारे बुद्धि और हृदय पर कब्जा हो जाता है। जैसे युद्धभुमि में लडे जाने वाले युद्ध में एक सेना का आक्रमण और विजय एंव हारे हुये के राज्य पर कब्जा होता है- ऐसे ही प्रक्रिया इस आंतरिक युद्ध की भी है ।


अगर आक्रमण झेलने वाले के पास आक्रमण करने वाले से बडी शक्ति है तो आक्रमण करने वाला विफल हो जाता है। अगर हमारे पास प्रभु सानिध्य की शक्ति है तो हमारे उपर कोर्इ भी आक्रमण विफल हो जाता है । पाण्डवों पर कितने प्रकार के आक्रमण हुये, कितनी विपदायें आर्इ पर प्रभु सानिध्य के बल पर उनको कौरवों पर विजय मिली । अश्वमेघ का विजय अभियान हुआ । भावुक युधिष्ठिर जी ने मेरे प्रभु से कहा कि पाण्डव अश्वमेघ यज्ञ ख्याति अर्जित करने हेतु नहीं, अपितु दुनिया को यह दिखाने और बताने के लिए कर रहे हैं कि पाण्डवों के जीवन की क्या दुर्दशा थी पर सिर्फ और सिर्फ प्रभु सानिध्‍य के बल पर उन्हें जीवन में इतनी उंचाईयां प्राप्त हुर्इ है


जीवन मे प्रभु सानिध्य का प्रभाव बडा अदभूत होता है । पुराण और इतिहास इसके गवाह हैं । इसलिए जीवन मे प्रभु सानिध्य अर्जित करने का निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए ।

धन्यवाद ज्ञापन

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