श्री गणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु के इतने उपकार हमारे ऊपर हैं कि हमें जीवन भर प्रभु का गुणगान करने का व्रत लेना चाहिए । प्रभु का गुणगान करना वैसे भी हमारे लिए परम मंगलकारी और कल्‍याणकारी है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



प्रभु का यश गाने में, प्रभु का गुणगान करने में अपनी बुद्धि की और अपने सामर्थ्य की पूर्ण और श्रेष्ठ चेष्‍टा निश्चित रूप से लगानी चाहिए । फिर भी असंतुष्टि और अतृप्ति का भाव सदा हमारे मन में रहना चाहिए ।


सभी शास्त्रों ने, ऋषियों ने, संतों ने प्रभु का गुणगान किया है । श्री वेदजी प्रभु का गुणगान करके "नेति-नेति" कहकर शान्‍त हो जाते हैं । प्रभु का पूर्ण रूप से गुणगान करना किसी के लिए भी कतई संभव नहीं है ।


अगर संसार में कोई स्तुति योग्य है तो वह एकमात्र प्रभु ही हैं । अगर पूरी पृथ्वीमाता कागज बन जाए और श्री समुद्रदेवजी का पूरा जल स्‍याही बन जाए तो भी वे अपर्याप्त होंगे प्रभु के लेशमात्र भी गुणों का बखान करने में ।


शास्त्रों में कितनी स्तुतियां प्रभु की विभिन्न ऋषियों, संतों और भक्तों ने की है । श्री विष्णुसहस्त्रनाम रूपी स्तुति श्री भीष्‍मपितामहजी ने बाणों की शय्या पर लेटे-लेटे की जब प्रभु उनके अंतिम समय में उन्हें दर्शन देने पहुँचे । प्रभु के एक हजार नामों से उन्‍होंने प्रभु की स्तुति की और फिर उनकी ज्योति प्रभु में समा गई ।


श्रीमद् भागवतजी महापुराण एवं श्री रामचरितमानसजी में एवं अन्य श्रीपुराणों में भी प्रभु की विभिन्‍न स्तुतियां देवताओं, ऋषियों, संतों और भक्तों द्वारा की हुई मिलेगी । प्रभु ने जब श्रीरामावतार एवं श्रीकृष्णावतार धारण किया तो देवताओं ने आकर गर्भ स्तुति भी की है ।


हमें भी प्रभु की स्तुति और प्रभु का गुणगान अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए । यह भक्ति का एक स्वरूप है । सच्चा भक्त संसार में किसी का गुणगान नहीं करता, वह सिर्फ और सिर्फ प्रभु का ही गुणगान करता है । सच्चा भक्त प्रभु की स्तुति करने के बाद भी अतृप्‍त रहता है और वह सोचता है कि मेरी बुद्धि इतनी कम है और प्रभु के सद्गुण इतने अधिक हैं कि मैं पूर्णरूप से प्रभु की स्तुति करना तो दूर, कर पाने की सोचने में भी पूर्णतया असक्षम हूँ ।


भक्त श्री ध्रुवजी ने जब प्रभु प्राप्ति के लिए तप किया और प्रभु ने उन्हें दर्शन दिए तो वे प्रभु की स्तुति करना चाहते थे । पर उनके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल पाया । प्रभु उनके भाव को समझ गए और प्रभु ने अपना दिव्य शंख उनके कपोल से लगाया जिससे उनके भीतर ज्ञान की जागृति हुई और उन्होंने प्रभु की दिव्‍य स्तुति करी ।


अगर हम स्वयं प्रभु की स्तुति कर पाने में समर्थ नहीं हैं तो भी हमें श्रीग्रंथों में प्रभु की विभिन्न स्तुतियों को पढ़ना चाहिए और जो स्तुति हमें प्रिय लगे उसे याद कर उसका निवेदन रोज पूजा करते वक्त प्रभु के समक्ष करना चाहिए ।


सच्‍चे मन से की गई भावपूर्ण स्तुति से प्रभु भक्त के वश में हो जाते हैं । इसलिए जीवन में प्रभु के गुणगान और प्रभु की स्तुति को अपनी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बनाना चाहिए ।


प्रभु ने हमें मानव योनि में जन्म दिया है, हमें सांसे दी है और न जाने प्रभु के हमारे ऊपर कितने उपकार हैं । उन सभी उपकारों को ध्यान रखते हुए प्रभु का नित्य गुणगान और प्रभु की नित्‍य स्तुति हमें जीवन में करते रहने का अभ्‍यास करना चाहिए ।