श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर दो छोटे आलेख ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक रविवार
Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक बुधवार
Quotes on GOD (in Hindi & English), every Wednesday
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
Our Objectives & Pledges - Also answers FAQ (Frequently Asked Questions)
Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
Words of Prayer प्रभु के लिए प्रार्थना, कविता
GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : भक्ति के द्वारा जीवन में प्रभु के समीप जाने का प्रयास सदैव करते रहना चाहिए । भक्ति के द्वारा जीवन में प्रभु को लाना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए । पूरा लेख नीचे पढ़े -



जैसे हम किसी तीर्थ में पहुँच कर यह नहीं मान सकते कि हमें प्रभु विग्रह के दर्शन हो गये, हमें वहाँ स्थित मंदिर में जा कर प्रभु प्रतिमा के समक्ष खड़े होने पर ही प्रभु के दर्शन का लाभ मिलता है । वैसे ही अपने जीवन को प्रभु से जोड़ने पर ही जीवन में प्रभु कृपा के दर्शन होते हैं ।


जैसे मंदिर में प्रभु की प्रतिमा एक जगह गर्भग्रह में स्थित होती है और हमें चलकर सामने आना पड़ता है, वैसे ही जीवन में प्रभु राह पर चलकर हमें प्रभु के सामने आना होता है । यह प्रभु की राह क्‍या है - यह भक्ति है । जीवन में भक्ति आती है तो ही जीवन धन्‍य होता है ।


इधर उधर उलझा जीवन हमारा पतन करवायेगा । प्रभु के श्रीकमलचरणों में भक्ति द्वारा उलझा जीवन हमारा उत्‍थान करवायेगा और अन्‍त में हमें सदैव के लिए आवागमन से मुक्ति देगा ।


हमें अपने जीवन में भक्ति अर्जित कर प्रभु के समीप आना चाहिए । प्रभु के समीप आते ही हमारा जीवन पवित्र हो जाता है, बुराईयां हमें छोड़कर भागती हैं और अच्‍छाईयां आकर जीवन में बस जाती है । यह सिद्धांत है कि प्रभु की छत्रछाया में आते ही बुराईयों को जीवन से भागना पडेगा और अच्‍छाईयों को जीवन में आना पडेगा ।


भक्ति के कारण प्रभु को जीवन में लाने पर कलियुग के लोगों ने भी सतयुग जैसा आचरण किया है और अपने जीवन से प्रभु को दूर करने पर सतयुग, त्रेता और द्वापर में भी लोगों ने कलियुग जैसा आचरण किया है । रावन, कंस, हिरणाकश्यपु आदि इसके उदाहरण हैं ।


सिद्धांत स्‍पष्‍ट है कि प्रभु को जीवन में लाने पर प्रभु कृपा होती है और उस प्रभु कृपा के कारण युग के दोष (जैसे कलियुग के दोष) भी हम पर प्रभाव नहीं करते । इसके विपरित जीवन में प्रभु से दूर रहने पर युग की अच्‍छाईयां और श्रेष्‍ठ आचरण भी हमसे दूर हो जाते हैं । जैसे सतयुग, त्रेता और द्वापर की अच्‍छाईयां भी उस युग में जन्‍में दुष्‍टों के आचरण में नहीं आई क्‍योंकि उन्‍होंने प्रभु को अपने जीवन से दूर रखा ।


सबसे श्रेष्‍ठ उदाहरण हिरणाकश्यपु और भक्‍त प्रह्लादजी का है । एक ही युग में, एक ही राक्षस कुल में पिता पुत्र होते हुये एक का पतन और दूसरे का उत्‍थान हुआ । उत्‍थान भी ऐसा कि श्री प्रह्लादजी के अलावा उनकी आने वाली राक्षस पीढीयों को भी मेरे प्रभु ने अभयदान दे दिया । उन्‍हीं के पीढी में हुये राजा बलि के समय में देने वाले प्रभु, मांगने वाले बन गये और राजा बलि की मर्यादा और प्रतिष्‍ठा को प्रभु ने बढाया ।


हिरणाकश्यपु के पतन का कारण क्‍या था - जीवन में प्रभु से दूर जाना । उसने प्रभु को कभी स्‍वीकारा नहीं । श्री प्रह्लादजी के उत्‍थान का कारण क्‍या था - जीवन में प्रभु को लाना । यही कारण था कि हिरणाकश्यपु को कही प्रभु नहीं दिखे और श्री प्रह्लादजी को कण कण में प्रभु के दर्शन हुये । हिरणाकश्यपु ने जब पुछा कि क्‍या इस खम्भे में भी प्रभु हैं तो श्री प्रह्लादजी ने बेहिचक कह दिया कि उन्‍हें वहाँ भी साक्षात प्रभु के दर्शन हो रहें हैं । हिरणाकश्यपु ने खम्भे को गदा से तोड़ा और अपने भक्‍त की वाणी को सत्‍य करने के लिए प्रभु खम्भे से प्रकट हुये ।


जिसने जिसने भी अपने जीवन को प्रभु से जोड़ा है उसको प्रभु कृपा जीवन में मिली है जिसके कारण उसे उत्‍थान और प्रतिष्‍ठा जीवन में मिली है । बड़ी लम्‍बी सुची है - भगवती मीरा बाई, पांच पाण्‍डव, श्री नरसी मेहता, भक्‍त सुदामाजी, श्री ध्रुवजी, संत तुलसीदासजी, भक्त सुरदासजी - सुची इतनी लम्‍बी है कि उसको पूरा लिखना संभव नहीं है ।


इसलिए जीवन में भक्ति अर्जित कर प्रभु के समीप जाना चाहिए । प्रभु को जीवन में लाना और अपने जीवन को प्रभुमय बनाना हमारे जीवन का लक्ष्‍य होना चाहिए । जिन जिन भक्‍तों ने ऐसा किया है उनका उद्धार हुआ है और जो दुष्‍ट ऐसा नहीं कर पाये उनका पतन हुआ है ।


जीवन को सफल बनाना है तो जीवन में प्रभु के समीप जाना ही पड़ेगा । इसके अलावा कोई विकल्‍प नहीं है । जीवन में प्रभु को लाना मानव जीवन की जीत है, मानव जीवन की सफलता है और मानव जीवन का उद्देश्य भी है । इसलिए भक्ति के द्वारा जीवन में प्रभु के समीप जाने का प्रयास सदैव करते रहना चाहिए ।


धन्यवाद ज्ञापन

इस वेबसाइट की कोशिश है कि प्रभु के करीब चले | इस कोशिश में जहाँ जहाँ से हमें सहयोग मिला है उसे अभिस्वीकार करते हुए यहाँ दर्ज “विचारों को फैलाने” में जिन्होंने हमें सहयोग दिया है उनका हम सादर आभार प्रकट करते हैं |

प्रकाशन हेतु :
इन्होने प्रभु के बारे में हमारे लेखन का समालोचन करने के बाद प्रकाशन किया | इनके प्रति हमारा हार्दिक आभार | वर्णक्रमानुसार :
SWARGVIBHA.
ब्लॉग हेतु:
लेख ब्लॉग के रूप में यहाँ उपलब्ध हैं | इन सभी ब्लॉग मंच का धन्यवाद | सभी का आभार | वर्णक्रमानुसार :
HINDIBLOGS, HINDIBLOGSPOT, JAGRANJUNCTION.