श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर दो छोटे आलेख ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक रविवार
Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक बुधवार
Quotes on GOD (in Hindi & English), every Wednesday
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
Our Objectives & Pledges - Also answers FAQ (Frequently Asked Questions)
Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
Words of Prayer प्रभु के लिए प्रार्थना, कविता
GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : अन्‍त समय प्रभु के स्‍मरण से हमें पुन: जन्‍म-मृत्यु के चक्‍कर में नहीं पड़ना पड़ता । पर ऐसा हो सके इसका अभ्‍यास जीवन के आरम्‍भ से ही करना पड़ता है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



जैसे सुबह 4 बजे उठने की आदत अगर हम डालते हैं तो हमारी नींद रोजाना सुबह 4 बजे स्‍वत: ही खुल जाती है । आदत बड़ी पक्‍की चीज है, जिसकी भी आदत डालते हैं वह होता ही है । वैसे ही प्रभु स्‍मरण की आदत हम जीवन भर डालते हैं तो अन्‍त समय में प्रभु स्‍मरण स्‍वत: ही होगा । इसके लिए कोई विशेष प्रयास करने की जरूरत नहीं होगी ।


अन्‍त समय प्रभु का स्‍मरण होते ही आवागमन से सदैव के लिए मुक्ति मिल जाती है । हम प्रभु के पास पहुँच जाते हैं जहाँ से फिर जन्‍म-मृत्यु के चक्‍कर में नहीं पड़ना पड़ता ।


कितना सरल उपाय है जन्‍म-मृत्यु के बंधन से सदैव के लिए छुटने का जिसे हम प्राय: नजरअंदाज कर देते हैं । कितना सरल उपाय है कि अगर हम जीवन भर प्रभु स्‍मरण का अभ्‍यास करते हैं तो अन्‍त समय प्रभु का स्‍मरण होगा और हम आवागमन से मुक्‍त हो जायेगें । इसके विपरीत अगर इसका जीवन में प्रयास नहीं किया गया तो अन्‍त समय कितने भी परिजन प्रभु नाम का उच्‍चारण हमारे कानों में करे, कितने भी भजन, जप अंतिम समय हमारे परिजन करें पर हमें अंतिम घड़ी प्रभु का स्‍मरण नहीं हो पायेगा ।


अगर जीवन में प्रभु स्‍मरण का दैनिक अभ्‍यास किया गया हो तो ही अंतिम समय प्रभु का स्‍मरण बिना बाधा के स्‍वत: ही हो जाता है । अन्‍यथा कितने उदाहरण ऐसे मिलेगें जब प्रभु नाम का उच्‍चारण, प्रभु का स्‍मरण करवाने की परिजन भरसक प्रयास करते हैं पर अंतिम समय ऐसा नहीं हो पाता है ।


इसलिए जीवन में निरंतर प्रभु स्‍मरण की आदत बनानी चाहिए जिससे हमारा अन्‍त समय सुधर जाये और मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति भी हो सके । मानव जीवन का उद्देश्य क्‍या है - "जीव" का "शिव" से मिलन और सदैव के लिए जन्‍म-मृत्यु के चक्रव्युह से मुक्ति । पर क्‍या हमारा प्रयास इस दिशा में हो रहा है ।


हमारी वासना जिसमें फंसी होगी अन्‍त समय में हमें उसी का स्‍मरण होगा । जिसका स्‍मरण होगा वैसी ही गति होगी । श्रीमद भागवतजी में जड़ भरतजी का प्रसंग इसका जीवन्त उदाहरण है । जड़ भरतजी ने एक बार एक हिरण के बच्‍चे की जान बचाई और फिर उसके मोह में फंस गये । दिन रात उनका अनुसंधान उस मृग के बच्‍चे का होता । उनका अन्‍त समय आया और उनका चिंतन मृग के बच्‍चे का ही हुआ और उन्‍हें अगला जन्‍म उसी योनि में लेना पड़ा । वे इतने ज्ञानी थे, संत थे और मुक्‍त हो सकते थे पर अंतिम समय गलत स्‍मरण के कारण बंधन में आ गये ।


यह कथा हमें क्‍या शिक्षा देती है ? शिक्षा यह है कि अंतिम समय गलत चीज का स्‍मरण हमारा पतन करवा देती है । अंतिम समय स्‍मरण सिर्फ ओर सिर्फ प्रभु का ही होना चाहिए । पर यह एकाएक नहीं होगा । इसके लिए जीवन में प्रयास करने होंगे तभी अंतिम समय ऐसा संभव होगा ।


आम तौर पर मनुष्‍य की वासना धन-सम्पत्ति, बेटे-पोतो इत्‍यादि में फंसी होती है और अन्‍त समय में वह इनका ही स्‍मरण करके अपना जीवन व्‍यर्थ कर लेता है । संत कहते हैं कि अंतिम समय अगर धन-सम्पत्ति का स्‍मरण होता है तो अगली योनि सर्प की मिलती है जहाँ उसे गढे हुये धन की रक्षा करनी पड़ती है । उसका चिन्‍तन धन-सम्पत्ति का था इसलिए अगली योनि धन-सम्पत्ति की रक्षा हेतु मिली ।


कितनो का दुर्भाग्य होता है कि अन्‍त समय बिमारी ने उन्‍हें घेर रखा होता है और उसकी पीड़ा में ही उनका ध्‍यान अटका रहता है । इस कारण अन्‍त समय प्रभु स्‍मरण नहीं हो पाता ।


इसलिए प्रभु के स्‍मरण की आदत अगर जीवन के आरम्‍भ से हमने बनाई हो तो अन्‍त समय प्रभु का स्‍मरण बिना किसी बाधा के हो जायेगा । फिर चाहे बिमारी की पीड़ा हो या न हो, प्रभु का स्‍मरण निश्‍चित ही हो जायेगा ।


अन्‍त समय में प्रभु स्‍मरण हुआ तो हमारा कल्‍याण निश्‍चित है । हमें फिर किसी योनि में भटकना नहीं पड़ेगा और सीधे प्रभु के पास पहुँच जायेगें ।


इसलिए जीवन में निरंतर प्रभु स्‍मरण की आदत बनानी चाहिए । यह सबसे आवश्‍यक और जरूरी साधन है । जीवन भर प्रभु का स्‍मरण हर पल, हर लम्‍हें रहना चाहिए । इससे हमारा अन्‍त सुधर जायेगा, हमारी गति सुधर जायेगी ।


धन्यवाद ज्ञापन

इस वेबसाइट की कोशिश है कि प्रभु के करीब चले | इस कोशिश में जहाँ जहाँ से हमें सहयोग मिला है उसे अभिस्वीकार करते हुए यहाँ दर्ज “विचारों को फैलाने” में जिन्होंने हमें सहयोग दिया है उनका हम सादर आभार प्रकट करते हैं |

प्रकाशन हेतु :
इन्होने प्रभु के बारे में हमारे लेखन का समालोचन करने के बाद प्रकाशन किया | इनके प्रति हमारा हार्दिक आभार | वर्णक्रमानुसार :
SWARGVIBHA.
ब्लॉग हेतु:
लेख ब्लॉग के रूप में यहाँ उपलब्ध हैं | इन सभी ब्लॉग मंच का धन्यवाद | सभी का आभार | वर्णक्रमानुसार :
HINDIBLOGS, HINDIBLOGSPOT, JAGRANJUNCTION.