श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : मानव जीवन के सही उपयोग पर ध्‍यान केन्द्रित कराने वाला लेख जो की दो जीवन शैली के बीच तुलना कर बताता है कि हमें क्‍या करना चाहिए जिससे हमारा मानव जीवन सफल हो । पूरा लेख नीचे पढ़े -



दो आत्‍माओं को मानव शरीर मिला । पहली आत्‍मा ने मानव शरीर पाकर खुब रूपया पैसा कमाया, विदेश यात्रायें की, ऐशो आराम किया । थोड़ा धर्म पूण्‍य भी किया, साधारण पूजा पाठ भी की, परिवार फुला फला, सभी अनुकूलता रही । बुढापा आया तो बुढापे का कष्‍ट झेलना पडा, कुछ चीजें प्रतिकुल होने लगी । शरीर ने साथ छोडा, रोग लग गये । पत्‍नी जीवन काल में साथ छोड गई, बच्‍चे अपनी मनमर्जी करने लगे । अन्‍त समय प्राण कंठ में आये, शरीर छुटा और एक नई यात्रा प्रारम्‍भ हुई ।


जो दान पूण्‍य किया था, पूजा पाठ की थी उसका सुख भोगने के लिए स्‍वर्ग मिला । फिर वहाँ का भोग पूरा होने पर नर्क की यात्रा हुई और यातना शरीर मिला । अशुद्धि से धन कमाने के लिए जो पातक और अनिति की थी, प्रतिस्‍पर्धा के कारण जो प्रतिकुल कर्म किये थे उसके लिए नर्क के भोग भोगने पडे । नर्क में यातना शरीर से यातनायें भोग कर फिर शुद्ध हुआ आत्‍मा को दोबारा जन्‍म मिला ।


अपने पूर्व कर्मो के अनुसार यह जन्‍म नभचर, जलचर, थलचर या वनस्‍पति योनियों में किसी भी योनी में मिल सकता है । उदाहरण के लिए माने कि पशु योनि में जन्‍म मिला । पशु बने तो फिर भय, भोजन और मैथुन के चक्‍कर में पड गये । बचपन में बड़े पशु मार न डाले उसका भय, बड़े होने पर भोजन की चिन्‍ता और फिर मैथुन के द्वारा परिवार का दायित्‍व । ऐसे ही एक योनि में नहीं लाखों योनियों में जन्‍म मरण का यह चक्र चलता रहा । जन्‍म-मृत्यु, स्‍वर्ग-नर्क भोगने का क्रम चलता रहा ।


दूसरी आत्‍मा जिसको मानव शरीर मिला था उसने अपने संसारिक कर्मो का निवार्ह तो किया पर उसमें विशेष रूची नहीं ली । क्‍योंकि उसकी रूची सिर्फ और सिर्फ प्रभु में थी । जो संसारिक कर्म किया वह प्रभु को निमित मानकर और प्रभु को अपर्ण करके किया । प्रभु की खुब सेवा, पूजा और भजन किया । आवश्‍यकता अनुसार रूपया पैसा कमाया पर सबसे बड़ा संतोष धन कमाया । बच्‍चें बड़े अनुकूल थे, गृहस्थ का सुख था क्‍योंकि पूरा गृहस्थ ही प्रभु शरण में रहता था । बुढापा आया तो कोई विशेष व्‍याघी नहीं हुई । किसी की सेवा नहीं लेनी पडी और हंसते हंसते शरीर छुट गया । खुब भजन-पूजन और भक्ति जीवन पर्यन्त हुआ था इसलिए प्रभु स्‍मरण की जीवनभर की आदत थी । अन्‍त समय भी प्रभु स्‍मरण बना हुआ था इसलिए अन्‍त समय प्रभु का सानिध्य मिला और आत्‍मा परमात्‍मा में विलीन हो गई । फिर कोई जन्‍म-मरण का चक्‍कर नहीं हुआ, कोई स्‍वर्ग-नर्क का भोग नहीं । सीधा प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्‍थान मिल गया । लाखों बार के जन्‍म-मरण के चक्‍कर से छुट गये, लाखों बार के स्‍वर्ग-नर्क के चक्‍कर से छुट गये । मानव जीवन के सच्‍चे उद्देश्य की पूर्ति हो गई क्‍योंकि मानव जीवन मिला ही प्रभु की प्राप्ति हेतु था ।


दोनों आत्‍माओं ने मानव जीवन का उपयोग किया पर दोनों आत्‍माओं में कौन विजयी रहा । जिसने प्रभु को पा लिया वह विजयी रहा । जीवन में धन, संपत्ति, ऐश्‍वर्य और कीर्ति कमाई पर प्रभु को नहीं पा सके तो वह जीव हार गया । दूसरी तरफ जिसने धन, संपत्ति, ऐश्‍वर्य और कीर्ति नहीं कमाई पर जिसने सिर्फ और सिर्फ प्रभु की भक्ति की कमाई की वह जीव जीत गया ।


हम कौन-सी गति चाहते हैं यह हमारे उपर है । लाखों योनियों के चक्‍कर में फसें रहना चाहते हैं या सदैव के लिए आवागमन से मुक्‍त होना चाहते हैं, यह हमारे उपर है । स्‍वर्ग-नर्क का सुख-दुःख भोगते रहना चाहते हैं या प्रभु सानिध्य में परमानंद का आनंद चाहते हैं, यह हमारे उपर है ।


इसलिए जीवन की दिशा हमें ऐसी रखनी चाहिए कि मानव जीवन में हमें प्रभु की प्राप्ति हो जाये । यही मानव जीवन का सफलतम उपयोग है । मानव जीवन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें मिला है । जीवन का दृष्टीकोण अगर हम ऐसा बना लेते हैं कि हमें प्रभु की प्राप्ति करनी है तो हम उसके लिए सही साधन करते चलेगें । अन्‍यथा यह जीवन व्‍यर्थ ही बर्बाद हो जायेगा और फिर जन्‍म-मरण, स्‍वर्ग-नर्क के चक्‍करों में हमें फंसना पडेगा ।


इसलिए भक्ति के द्वारा प्रभु की प्राप्ति का उद्देश्य जीवन में बनाना चाहिए और इसी दिशा में आगे बढना चाहिए ताकि मानव जीवन का सही उपयोग किया जा सके ।


धन्यवाद ज्ञापन

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