श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु मार्ग पर चलना मानव जीवन का लक्ष्‍य होना चाहिए । जीवन में जितना जल्‍दी इसका आरंभ हो उतना ही जीव के लिए अच्‍छा होता है । हम प्रभु की तरफ बढते हैं तो प्रभु भी हमारी तरफ बढते हैं और प्रभु और जीव का मिलन होता है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



प्रभु और जीव के बीच असंख्‍य और अनगिनत कदमों का फासला है । यह फासला मिटते ही प्रभु और जीव का मिलन होता है, आत्‍मा परमात्‍मा से मिलती है, जीव और "शिव" का एकाकार होता है ।


यह फासला मिटाने हेतु ही मानव जीवन हमें मिला है । मानव जीवन की सार्थकता इसी बात में है कि जीव का "शिव" से मिलन हो जाये ।


हम रोजाना एक कदम भी प्रभु की तरफ बढ़ाते हैं तो दस कदम प्रभु हमारी तरफ बढ़ाते हैं । यह निश्‍चित सिद्धांत है और इस पर हमें पूर्ण विश्‍वास होना चाहिए ।


हमारे जीवन के 80 वर्ष की आयु में रोजाना एक कदम, यानि वर्ष भर में 365 कदम प्रभु की तरफ बढ़ाने पर 3650 कदम प्रभु चलकर हमारे समीप आते हैं । इसलिए बचपन से ही बच्‍चों को प्रभु के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देनी चाहिए । माता-पिता का दायित्‍व होता है कि अपने बच्‍चे को ऐसी प्रेरणा दे की वह नित्‍य प्रभु की तरफ बढे । ऐसा करने पर ही हमारा मातृ और पितृ ऋण बच्‍चे पर बनता है । अगर बच्‍चे को हमने मात्र शिक्षा दे दी या दुनियादारी अथवा व्‍यापार करना सिखा दिया तो हमारा मातृ और पितृ ऋण नहीं बनता । क्‍योंकि उस बच्‍चे के उद्धार का मार्ग हमने उसे नहीं बताया, उसके उद्धार के लिए उसे क्‍या करना है यह हमने उसे नहीं सिखाया । पर बचपन में ही प्रभु की तरफ रोजाना एक कदम बढ़ाना अगर हमने उसे सिखा दिया तो हमने उसे प्रभु मार्ग में अग्रसर होने हेतु प्रशस्त्र कर दिया ।


अगर हमारे अंदर प्रभु की तरफ बढने की प्रेरणा 30 वर्ष की आयु में आई तो हमें राजाना दो कदम प्रभु की तरफ बढ़ाने चाहिए । ऐसा इसलिए क्‍योंकि हमने पहले अपने कदम प्रभु मार्ग पर नहीं बढ़ाये । इसलिए एक की जगह दो कदम प्रभु मार्ग पर बढ़ाना होगा । इसका मतलब है की भक्ति में तीव्रता लानी होगी । ऐसा करने पर प्रभु भी 20 कदम रोजाना हमारी तरफ बढेगें । यानी प्रभु भी तीव्रता से हमारी तरफ बढेगें ।


अगर हमने अपने जीवन के 50 वर्ष बेकार कर दिये फिर हमें यह तथ्‍य समझ में आया तो हमें 3 कदम रोजाना प्रभु की तरफ बढ़ाने पडेगें । यानी और ज्‍यादा तीव्रता भक्ति में लानी होगी । तब प्रभु 30 कदम हमारी तरफ बढेगें यानी प्रभु भी ओर वेग से हमारी तरफ बढेगें ।


तीनों में से हमारे जीवन की जो भी अवस्‍था हो उस उनुरूप उस गति से प्रभु की तरफ बढना चाहिए । युवावस्‍था हो तो एक कदम, मध्यावस्‍था हो तो दो कदम और वृद्धावस्‍था हो तो तीन कदम । इसका सीधा मतलब यह है कि युवावस्‍था से मध्यावस्‍था की भक्ति में अधिक तीव्रता हो और मध्यावस्‍था से वृद्धावस्‍था की भक्ति में ओर अधिक तीव्रता हो ।


सिद्धांत यह है कि जितना जितना जीवन में समय कम होता जायेगा उतनी उतनी भक्ति में तीव्रता बढनी चाहिए । इसे एक सिद्धांत के रूप में जीवन मे उतारना चाहिए ।


ऐसा करते करते हम पायेगें कि जीवन के अन्‍त समय के पहले हम प्रभु के बहुत समीप आ चुके होगें और निश्‍चित माने की कुछ ही कदम की दूरी अभी शेष बची होगी । अगर बुढापे के कारण हमारा शरीरबल क्षीण हो चुका होगा तो भी प्रभु अंतिम घडी में लपक कर यानी प्रभु अपनी तरफ से बचे हुये फासले को पूरा करते हुये जीव को उठा लेगें और अंतिम घडी में जीव और "शिव" का मिलना हो जायेगा ।


एक सिद्धांत है कि भक्ति कभी व्‍यर्थ नहीं जा सकती । प्रभु को समर्पित तन-मन-धन कभी व्‍यर्थ नहीं जा सकते । यह सनातन सिद्धांत है क्‍योंकि प्रभु इतने कृपालु और दयालु हैं कि एक तरफ से ही फासला पूरा करके जीव का कल्‍याण कर देते हैं । जीवन के अंतिम अवस्‍था में भी की गई भक्ति कभी व्‍यर्थ नहीं जाती तो जीवन के मध्‍यकाल से की गई भक्ति या फिर युवाकाल से की गई भक्ति के व्‍यर्थ जाने का तो प्रश्‍न ही नहीं उठता ।


हमने सच्‍चे मन से भक्ति की और फिर भी भक्ति में कोई अपूर्णता रह गई तो उसे दयालु और कृपालु प्रभु अपनी तरफ से पुर्ण कर देते हैं । अगर भक्ति मार्ग में भक्‍त और भगवान के बीच कुछ फासला बच गया तो भी प्रभु उसे तत्‍काल पूर्ण कर देते हैं ।


वैसे भी अंतिम फासला तो प्रभु ही पूर्ण करते हैं । भक्‍त की भक्ति कितनी भी तीव्र हो फिर भी भक्‍त में सामर्थ नहीं की वह अंतिम दो अंगुल फासला पूरा कर पाये । वह दो अंगुल यानी एक प्रभु कृपा का और एक प्रभु दया का को प्रभु ही पूर्ण करते हैं । इसका जीवन्‍त उदाहरण प्रभु के श्रीकृष्णावतार में बालरूप में माता यशोदा के ओखल से बाधने वाली श्रीलीला है । जब माता यशोदा ने प्रभु को ओखल से बांधना चाहा तो प्रभु ने ऐसी लीला करी की घर के सभी रस्‍सीयां कम पड गई । माता ने रस्‍सीयों को जोडकर बांधना चाहा फिर भी वह दो अंगुल छोटी पड गई । संतों ने बहुत सुन्‍दर व्‍याख्‍या करते हुये कहा है कि यह दो अंगुल प्रभु की इच्‍छा से ही पूर्ण हो सकती है । यानी भक्‍त कितना भी चाहे वह प्रभु से दो अंगुल दूरी पर ही रहेगा । अंत में प्रभु चाहेगे तभी वह दो अंगुली की दूरी पूर्ण होगी । जब माता हार गई तो प्रभु ने स्‍वयं की इच्‍छा पर वह दो अंगुल की दूरी पूर्ण की और प्रभु प्रेम बंधन में बंध गये ।


इस श्रीलीला का सारांश यह है कि अंतिम फासला प्रभु ही पूर्ण करते हैं तभी जीव और "शिव" का मिलना संभव होता है । इससे यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि जीव की शक्ति नहीं, जीव का सामर्थ्‍य नहीं की वह अपने बल पर प्रभु को पा सके - यह तो प्रभु की कृपा और दया के कारण ही भक्‍त भगवान को पा सकता है ।


पर इसकी शुरूआत तो भक्‍त को ही करनी पडती है । उसे प्रभु के मार्ग में बढने का संकल्‍प लेकर इस मार्ग में अग्रसर होना पडता है । युवावस्‍था में भक्ति के बाद, मध्‍यावस्‍था में भक्ति में तीव्रता लानी पडती है और वृद्धावस्‍था में अधिक तीव्रता लानी पडती है तो अंत में वह प्रभु के एकदम समीप पहुँच जाता है । फिर भी अंत में जो बची हुई दूरी है उसे प्रभु ही पूरा करते हैं । वैसे भी प्रभु आरम्‍भ से ही दूरी को पूरा करने में भक्‍त का सहयोग करते हैं । एक कदम के बदले दस कदम प्रभु अपनी तरफ से बढाते हैं ।


इसलिए जीवन में प्रभु के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए और यह जीवन में जितना जल्‍दी आरंभ हो उतना ही अच्‍छा होता है ।


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