श्री गणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : संसार के आकर्षण एवं प्रभु के आकर्षण के बीच किसका चुनाव करना चाहिए उसकी तुलना करने वाला लेख है । संसार का आकर्षण फंसाने वाला है । प्रभु का आकर्षण तारने वाला है । पूरा लेख नीचे पढ़ें -



संसार भोग विलास की सामग्री से भरा पड़ा है । माया द्वारा इतने दृश्य हमें दिखाए जा रहे हैं जिनकी गिनती नहीं ।


पर भोग विलास इत्यादि को जीव और "शिव" के बीच बाधा उत्‍पन्‍न करने वाले तत्‍व के रूप में देखना और समझना चाहिए । भोग विलास जीव और "शिव" के बीच दूरियां बढ़ाने का साधन मात्र है ।


हम प्रभु के अंश हैं पर फिर भी प्रभु से दूर हैं । क्‍यों ? क्‍योंकि भोग विलास की दुनिया में फंसा कर माया ने हमें प्रभु से दूर कर रखा है । माया का काम ही हमें प्रभु से दूर करने का है और माया अपने काम में अक्सर सफल रहती है । कुछ बिरले ही इस माया के चक्‍कर से बच पाते हैं अन्‍यथा सभी को इस माया ने जकड़ रखा है ।


माया ने भोग विलास का ऐसा विशाल समुद्र खड़ा किया हुआ है जिसकी लहरों में हम उलझ जाते हैं । जैसे लहरों के थपेड़ों से पत्‍थर घायल हो जाते हैं वैसे ही माया के थपेड़े से जीव घायल हो जाता है ।


पर सच्‍चा भक्ति करने वाला माया या माया द्वारा रचित भोग विलास की लिप्‍तता में नहीं फंसता । उलटे भोग विलास की निरर्थकता उसके मन में उतर जाती है । सच्‍चा भक्‍त समझ जाता है कि भोग विलास के सभी साधन उन महान मायापति की माया मात्र है । उन महान रचनाकार की रचना मात्र है ।


भक्‍त के हृदय में दो सिद्धांत दृढ़ता से बैठ जाते हैं । यह दोनों अदभुत और विलक्षण सिद्धांत हैं । पहला सिद्धांत जो भक्‍त अपने जीवन में दृढ़ता से समझता और उतारता है वह यह कि "कोई भी रचना, कभी भी, रचनाकार (प्रभु) से बड़ी नहीं हो सकती" । दूसरा सिद्धांत जो दृढ़ता से वह अपने जीवन में उतारता है वह यह कि "रचना कभी भी रचनाकार (प्रभु) से आकर्षक नहीं हो सकती" ।


यह दोनों सिद्धांत जीवन में उतर जाए तो माया के चक्‍कर से बचा जा सकता है । पर यह सिद्धांत सिर्फ भक्ति के माध्‍यम से ही प्रतिपादित होते हैं । भक्ति का ही सामर्थ्‍य है कि इन दोनों सिद्धांतों का मर्म हमारे भीतर उतार देती है ।


एक-एक करके दोनों सिद्धांतों को देखेंगे तो हम अनुभव करेंगे कि ये कितने विलक्षण हैं, कितने अद्वितीय हैं । इनके आने पर हमारा जीवन सार्थक हो जाता है ।


पहला सिद्धांत कि "कोई भी रचना, कभी भी, रचनाकार (प्रभु) से बड़ी नहीं हो सकती" । यह एक स्‍पष्‍ट सिद्धांत है कि कोई भी सांसारिक रचना, रचनाकार (प्रभु) से बड़ी नहीं हो सकती । जैसे एक सुन्‍दर काव्‍य कभी भी लेखक से बड़ा नहीं होता, कोई भी विज्ञान का आविष्‍कार उस वैज्ञानिक से बड़ा नहीं होता, वैसे ही कोई भी रचना, कभी भी, रचनाकार (प्रभु) से बड़ी नहीं हो सकती । यह तथ्‍य समझने पर हम रचना से नहीं, रचनाकार (प्रभु) से प्रेम करने लगेंगे । हम रचना में नहीं उलझेंगे अपितु रचनाकार (प्रभु) की तरफ आकर्षित होंगे । जैसे एक चित्रकार ने चित्र बनाया और हम उस चित्र के मुरीद हो गए, पास खड़े चित्रकार को हम भूल गए तो यह हास्यास्पद लगेगा । क्‍योंकि चित्रकार वैसे कई चित्र बना सकता है, उससे भी आकर्षक चित्र बना सकता है पर हम चित्र में ही उलझ कर रह गए और चित्रकार को भूल गए । अगर थोड़ी बुद्धि से काम लेंगे तो चित्र को चित्रकार की मात्र एक कृति के रूप में देखेंगे और सम्‍मान और प्रेम उस चित्र से ज्‍यादा चित्रकार के लिए होगा । वैसे ही भक्ति द्वारा सात्विक बुद्धि आने पर हम हर रचना में उलझे बिना उसके पीछे के रचनाकार (प्रभु) को देख पाएंगे और हमारा सम्‍मान और प्रेम प्रभु के लिए होगा, न की उस रचना के लिए जो रचनाकार (प्रभु) की मात्र एक कृति है ।


दूसरा सिद्धांत कि "रचना कभी भी रचनाकार (प्रभु) से आकर्षक नहीं हो सकती" । यह भी एक स्‍पष्‍ट सिद्धांत है जो भक्ति द्वारा ही प्रतिपादित होता है कि रचनाकार (प्रभु) ही आकर्षण की पराकाष्‍ठा हैं । मधुराष्टकम् श्‍लोक में प्रभु के माधुर्य और आकर्षण का वर्णन मिलता है कि प्रभु के हर श्रीअंग, हर व्‍यवहार, हर श्रीलीला कितने मधुर और आकर्षक हैं । हम संसार के आकर्षण में खो जाते हैं । भोग विलास के आकर्षण, प्रकृति की सुन्‍दरता के आकर्षण में खो जाते हैं । पर भक्‍त कभी भी प्रभु के आकर्षण के ऊपर किसी भी आकर्षण को नहीं देखता । जिन नेत्रों ने प्रभु को देख लिया उसे संसार की कोई वस्‍तु कभी आकर्षित कर ही नहीं सकती । ऐसा एक के साथ नहीं, अनेकों भक्‍तों के साथ हुआ है । श्रीगोपीजन ने तो आँखों की पलकें बनाने वाले को ही दोष दे दिया कि यह पलकें क्‍यों बनाई । इनके कारण प्रभु के आकर्षक रूप का क्षणभर के लिए अदर्शन हो जाता है ।


रचना सिर्फ मूढों को आकर्षित करती है और वे उस रचना में फंसकर, उसमें उलझ कर अपने सुनहरे मानव जीवन के लाभ को खो देते हैं । पर भक्‍त रचना में नहीं फंसकर रचनाकार (प्रभु) में ही अपने को उलझाए रखता है । प्रभु में अपने को उलझाए रखने का प्रभाव है कि हम अपनी उस योनि की उलझन, पूर्व योनियों की संचित उलझन और आने वाली योनियों की समस्‍त उलझनों को स्वतः ही सुलझा लेते हैं ।


इसलिए इन दोनों सिद्धांतों को जीवन में प्रबलता से धारण करना चाहिए कि कोई भी रचना मेरे प्रभु से बड़ी नहीं और कोई भी रचना मेरे प्रभु से आकर्षक नहीं । प्रभु को सबसे बड़ा और सबसे आकर्षक मानने का लाभ यह होता है कि हमारा मन प्रभु की प्रेमाभक्ति करने लगता है । उसे अन्‍य कोई आकर्षण नहीं रहता ।


संसार का आकर्षण फंसाने वाला है । प्रभु का आकर्षण तारने वाला है । संसार का आकर्षण गिराने वाला है, प्रभु का आकर्षण उठाने वाला है । संसार का आकर्षण माया तक पहुँचाएगा, प्रभु का आकर्षण मोक्ष तक पहुँचाएगा । संसार के आकर्षण में उलझ कर हमारा जीवन असफल हो जाएगा, प्रभु के आकर्षण में उलझने पर ही हमारा जीवन सफल हो पाएगा ।


दोनों में चुनाव हमें करना है । प्रभु ने हमें स्वतंत्रता दे रखी है, हम चाहे जिसे चुन सकते हैं ।


भक्ति के कारण उपरोक्‍त दोनों सिद्धांत हमारे जीवन में आ जाए तो हमारा चुनाव सदैव सही होगा और हमारे लिए लाभप्रद होगा ।