श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु एक ही हैं और प्रभु के दर पर सभी जीव बराबर हैं । प्रभु की सबपर एक बराबर दृष्टी और कृपा है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



Son of Lesser GOD (यानी छोटे भगवान के बच्‍चे) और Lesser Son of GOD (यानी भगवान के कम महत्‍व वाले बच्‍चे) - यह दोनों वाक्‍य निरर्थक हैं । दोनों वाक्यों की एक एक करके चर्चा करेगें तो पायेगें की सत्‍य इनसे भिन्‍न है ।


पहला वाक्‍य Son of Lesser GOD (यानी छोटे भगवान के बच्‍चे) इसलिए निरर्थक है क्योंकि प्रभु हर रूप में एक ही हैं । वे तो एक शक्ति, एक परब्रह्म हैं जो अलग अलग नामों से जाने और पुकारे जाते हैं । प्रभु दो हैं ही नहीं तो फिर बड़े भगवान और छोटे भगवान की बात हो ही नहीं सकती । हर धर्म में एक ही परमात्‍मा को भिन्‍न भिन्‍न रूपों में देखा जाता है । भिन्‍न भिन्‍न प्रार्थना की परम्परा है, तरीके हैं । पर हर प्रार्थना उस एक परमात्‍मा तक ही पहुँचती है । किसी भी धर्म के भगवान दूसरे धर्म के भगवान से छोटे या बड़े नहीं हो सकते क्योंकि वे मूलत: एक ही हैं । एक के ही अनेक नाम, अनेक रूप । तो फिर रूप और नाम के कारण कोई एक दूसरे से छोटा या बड़ा नहीं हो सकता ।


दूसरा वाक्‍य Lesser Son of GOD (यानी भगवान के कम महत्‍व वाले बच्‍चे) भी निरर्थक है । प्रभु के यहाँ किसी जीव को ज्‍यादा अहमीयत या कम अहमीयत का दर्जा नहीं दिया जाता । मानव अपने हर रंग, हर रूप, हर जाति और हर वर्ग का प्रभु के दर पर एक जैसा दर्जा पाता है । मनुष्‍य ही नहीं बल्कि जलचर, थलचर और नभचर सभी प्रभु की एक जैसी संतान हैं और परमपिता के रूप में प्रभु की सबपर एक बराबर दृष्टी और कृपा है । एक कीड़ा और विश्‍व का सबसे धनी मनुष्‍य प्रभु के यहाँ समान दर्जा रखते हैं क्‍योंकि दोनो ही प्रभु की संताने हैं ।


एक तथ्‍य समझना जरूरी है की कीड़ा और विश्‍व के सबसे धनी मनुष्‍य में फर्क क्‍या है - कर्मफल का । एक पूर्व कर्मो के कारण कीड़ा बना और दूसरा पूर्व कर्म के फल के कारण विश्‍व का सबसे अमीर मनुष्‍य बना । कर्मफल के कारण ही सभी जीव में भिन्‍नता है वरना सभी प्रभु की एक जैसी संताने हैं ।


पहला सिद्धांत की प्रभु एक हैं । हर धर्म में यह बात दृढता से प्रमाणित है और कही गई है कि प्रभु एक हैं, अनेक नहीं । एक के अनेक नाम । फिर कोई फर्क नहीं पडता की हम धर्म के किसी भी मार्ग से प्रभु तक पहुँचे । जब प्रभु एक है तो एक धर्म के प्रभु को दूसरे धर्म के प्रभु से बड़ा या छोटा मानना बड़ा हास्‍यप्रद है । पर हम ऐसी चूक कर बैठते हैं और अपने धर्म, अपने प्रभु को दूसरे के धर्म और दूसरे के प्रभु से बड़ा मानने की भूल करते हैं । इससे दूसरे धर्म एवं दूसरे के प्रभु का सम्‍मान हमारी दृष्टी में कम हो जाता है । यह एकदम गलत है क्योंकि वे दूसरे के प्रभु नहीं, वे तो हमारे ही प्रभु हैं । प्रभु एक है यह हर धर्म में माना गया है फिर भी हम इसे समझते या मानते नहीं । दूसरे धर्म के प्रभु को छोटा माना मूलत: अपने प्रभु को ही छोटा मानने जैसा अपराध है । पर हम यह अपराध कर बैढते हैं तभी तो एक धर्म का व्‍यक्ति दूसरे धर्म के इबादत की इमारत में माथा टेकने से परहेज करता है । क्योंकि वह व्‍यक्ति उस इबादत की इमारत में बिराजे प्रभु को अलग देखता है इसलिए उनकी वन्‍दना करने से चूक जाता है । अगर हम प्रभु को एक रूप में देखना सिख जायेगें तो प्रभु के हर मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और चर्च में माथा टेकने में हमें परहेज नहीं होगा । हर इबादत की इमारत के सामने से गुजरेगें तो हमारा सिर इबादत के लिए स्‍वत: ही झुक जायेगा ।


दूसरा सिद्धांत की कोई भी प्रभु के यहाँ कम महत्‍व वाला संतान नहीं है । प्रभु की सभी संताने प्रभु की दृष्टी में एक जैसी है । फिर चाहे वह जलचर हो, नभचर हो, थलचर हो या वनस्‍पति हो । सभी की पूकार प्रभु सुनते हैं, विपदा में सभी को मदद पहुँचाते हैं । सभी को पेट भरने का साधन उपलब्‍ध करवाते हैं । प्रभु के लिए सभी संताने बराबर हैं फिर चाहे वह अपने कर्मफल के कारण किसी भी योनि, किसी भी जाति में क्‍यों न जन्‍मा हो । सभी संताने बराबर होने पर भी अपने कर्मो के कारण उनमें भिन्‍नता रहती है । पर उनका महत्‍व कम नहीं होता और वे कम महत्‍व वाली संतान या ज्‍यादा महत्‍व वाली संतान नहीं बनते - उनका महत्‍व एक जैसा रहता है ।


दोनों सिद्धांत को देखने के बाद एक ऐसे कर्म की चर्चा करते हैं जो हमें प्रभु का प्रिय बना देता है । वह कौन सा कर्म है जो हमें प्रभु का प्रिय बना देता है - अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुये एकमात्र प्रभु से निच्‍छल प्रेम और प्रभु में तन-मन-धन अर्पण कर एकनिष्‍ठ भक्ति हमें प्रभु का प्रिय बना देती है ।


प्रभु के यहाँ सबका महत्‍व बराबर है पर भक्ति के द्वारा हम प्रभु के प्रिय बन जाते हैं । जैसे एक पिता के चार संताने हैं, सबका महत्‍व पिता के लिए बराबर है पर एक पुत्र अपने आचरण के कारण पिता को अधिक प्रिय होता है वैसे ही सब संताने बराबर होने पर भी भक्तियुक्‍त संतान प्रभु को अधिक प्रिय होता है ।


भक्ति हमारे दृष्टीकोण में एक परिवर्तन कराती है कि हमें हर रूप में प्रभु एक ही दिखते हैं और हर रूप की वन्‍दना में हमारा सिर झुक जाता है । प्रभु एक ही दिखते हैं और साथ ही प्रभु की संताने भी एक जैसी दिखती हैं । फिर एक ऐसा भाईचारा हमारे भीतर से पनपता है कि हमें हर योनि, हर वर्ण, हर जाति के जीव प्रिय लगने लग जाते हैं ।


भक्ति दोनों सिद्धांतों को हमारे भीतर स्थित कर देती है । पहला, हमें कोई छोटे या बड़े भगवान नहीं दिखते - हमें सिर्फ एक ही भगवान भिन्‍न भिन्‍न रूपों में दिखने लगते हैं । दूसरा, हमें कोई प्राणी छोटा या बड़ा नहीं दिखता - सभी एक बराबर दिखते हैं क्‍योंकि भक्ति के कारण हम सभी के भीतर एक ही परमात्‍व तत्‍व के दर्शन करते हैं ।


यह दोनों सिद्धांत जीवन में आ जाये तो जीवन जीने का दृष्टीकोण ही बदल जाता है । जीवन सुखमय हो जाता है । जीवन से संघर्ष खत्‍म हो जाता है । ऐसा होना तभी संभव होगा जब जीवन में भक्ति के बीज अंकूरित होगें ।

धन्यवाद ज्ञापन

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