श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : हम प्रभु से प्रार्थना कुछ मांगने के लिए या किसी डर से उबरने के लिए करते हैं । बल्कि सच्‍ची प्रार्थना प्रभु के प्रिय बनने के लिए होनी और प्रभु को अपना प्रिय बनाने के लिए होनी चाहिए । यही प्रार्थना का शिखर है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



हर धर्म में प्रभु से प्रार्थना का विशेष महत्‍व होता है । हम प्रार्थना अपनी इच्‍छा पूर्ति हेतु करते हैं या डर भगाने हेतु करते हैं, यह प्रार्थना के अलग-अलग स्‍वरूप हैं ।


पर प्रार्थना का सच्‍चा स्‍वरूप यह है कि हम प्रार्थना इसलिए करें की हम प्रभु को प्रिय हो और प्रभु हमें प्रिय लगें । यह प्रार्थना का शिखर है ।


गोस्‍वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरित मानस के पूरे लेखन के बाद एक ही निवेदन प्रभु से किया की आप (प्रभु) मुझे प्रिय लगें । कैसे प्रिय लगे, जैसे एक कामी को स्त्री प्रिय लगती है और एक लोभी को धन प्रिय लगता है । दूसरा निवेदन गोस्‍वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरित मानस में अनेकों जगह किया कि मैं (तुलसी) आपको (प्रभु को) प्रिय लगू । इस प्रियता के कारण बस प्रभु इतना कह देवें की "तुलसी मेरो" ।


प्रभु हमें प्रिय लगें यह भक्ति की जागृती से संभव होगा क्‍योंकि हमें प्रभु के सदगुण, ऐश्‍वर्य और श्रीलीला आकर्षित करेंगें । ऐसा होने पर प्रभु हमें प्रिय लगने लगेगें ।


पर हम प्रभु को प्रिय लगें यह प्रभु कृपा से ही संभव है । क्‍योंकि हमारे भीतर इतने अवगुण बैठे हैं कि हम प्रभु को प्रिय लगे, यह संभव नहीं । जैसे एक सात्विक व्‍यक्ति को दूसरा सात्विक व्‍यक्ति ही प्रिय लगता हे, वैसे ही प्रभु को, जो स्‍वयं सदगुणों के भंडार हैं, एक सदगुणी ही प्रिय लगता है ।


इसलिए प्रभु के श्रीचरणों को समर्पित एक प्रार्थना हमारे जीवन में नित्‍य रूप से आठों पहर होनी यह होनी चाहिए कि - प्रभु मेरे अंदर कोई भी ऐसी चीज (अवगुण) जो आपको पसंद नहीं है, उसका प्रवेश नहीं होने देवें । और जो चीज (सदगुण) आपको पसंद है उसका भरपूर प्रवेश हो, ऐसी अनुकम्‍पा करें ।


ऐसा निवेदन इसलिए करना चाहिए क्‍योंकि ऐसा होने पर ही हम प्रभु के प्रिय बन सकेगें जो की हमारे जीवन का लक्ष्‍य होना चाहिए । हमारे जीवन का भी लक्ष्‍य गोस्‍वामी तुलसीदासजी की तरह यही होना चाहिए कि हम प्रभु के प्रिय बन सकें ।


ऐसे निवेदन में हमारा कोई स्‍वार्थ छिपा नहीं होना चाहिए । प्रभु के प्रिय होने पर हमें स्‍वत: ही जगत से मान मिलता है इसलिए अप्रत्‍यक्ष रूप से भी हमारे मन में नाम, शोहरत, इज्‍जत, रूतबा की लालसा नहीं होनी चाहिए क्‍योंकि यह अहंकार का सूचक है । अहंकार रूपी अवगुण प्रभु को सबसे अप्रिय लगता है ।


एक स्‍पष्‍ट सिद्धांत है कि जो अपना अस्तित्‍व प्रभु के अनुरूप कर देता है, वही जगत में सच्‍चा मान पाता है । जैसे नदी में विभिन्‍न आकार के पत्‍थर जल से ठोकर खाते हैं और जल से निकलने पर भी लोगों की ठोकर खाते हैं पर जो पत्‍थर अपना अस्तित्‍व (आकार) हरि अनुरूप यानी लिंग रूप में गोलाकार कर देता है वह जल में भी ठोकर नहीं खाते (क्‍योंकि जल भी गोलाई के कारण उन्‍हें ठोकर नहीं मारता बल्कि उनके उपर से बह कर निकल जाता है) और जल से निकलने पर भी लिंग रूप में वे पुज्‍य हो जाते हैं और उनकी पूजा होती है । वैसे ही जो जीव अपना अस्तित्‍व प्रभु अनुरूप कर लेते हैं यानी प्रभु को प्रिय सदगुणों का संचार अपने भीतर कर लेते हैं और प्रभु को अप्रिय अवगुणों का अपने जीवन से त्‍याग कर देते हैं, वही संसार में सच्‍चा मान पाते हैं ।


इसलिए हमारे भीतर अवगुणों के नाश का एवं सदगुणों के विकास के लिए प्रभु से नित्‍य प्रार्थना होनी चाहिए । ऐसा निवेदन इसलिए करना चाहिए ताकि हम प्रभु के प्रिय बन सके और बने रहें क्‍योंकि यही हमारे जीवन का लक्ष्‍य है । इसके अलावा इस निवेदन में हमारा कोई स्‍वार्थ नहीं होना चाहिए और अगर अप्रत्‍यक्ष रूप से हो तो उसे भी प्रभु खत्‍म कर देवें क्‍योंकि वह अहंकार का सूचक होगा और अहंकाररूपी अवगुण प्रभु को सवाधिक अप्रिय लगता है ।


ऐसी प्रार्थना नित्‍य हो और प्रभु की भक्ति की जागृती जीवन में हो तो हमारे अवगुण धीरे-धीरे मिटने लगते हैं और सदगुणों का विकास जीवन में होने लगता है । अवगुण हटे और सदगुण जीवन में आये तो हम प्रभु को प्रिय लगने लगते हैं और प्रभु हमें प्रिय लगने लगते हैं ।


जैसे एक सात्विक व्‍यक्ति को दूसरा सात्विक व्‍यक्ति प्रिय लगता है और दूसरे सात्विक व्‍यक्ति को पहला सात्विक व्‍यक्ति प्रिय लगता है, वैसे ही प्रभु को सदगुणी व्‍यक्ति और सदगुणी व्‍यक्ति को प्रभु प्रिय लगने लगते हैं । प्रभु सदगुणों की खान हैं इसलिए प्रभु को एक सदगुणी व्‍यक्ति ही प्रिय लगेगा और उस सदगुणी व्‍यक्ति को सदगुणों के भंडार (प्रभु) ही प्रिय लगेंगे ।


जीवन में हमें प्रभु प्रिय लगे और प्रभु को हम प्रिय लगे - ऐसा हो जायेगा तो यह हमारे मानव जीवन की पराकाष्‍ठा है । इसी पराकाष्‍ठा को संत प्राप्‍त करते हैं । ऐसी अवस्‍था में पहुँचने के बाद हमें संसार प्रिय लगना बंद हो जाता है ।


पर आज हमें संसार प्रिय लगता है, संसार की वस्‍तुयें प्रिय लगती है, संसार के रिश्ते प्रिय लगते हैं । एक स्‍पष्‍ट सिद्धांत है कि संसार और प्रभु एक साथ, एक समय हमें कभी प्रिय नहीं हो सकते । जैसे श्रीसूर्यदेव और अंधकार कभी साथ नहीं रह सकते । श्रीसुर्यदेव हैं तो अंधकार नहीं रह सकता और अंधकार है तो श्रीसूर्यदेव वहाँ नहीं मिलेगें वैसे ही संसार अगर प्रिय है तो प्रभु प्रिय नहीं लगेगें और प्रभु अगर प्रिय हैं तो संसार प्रिय नहीं लगेगा । (एक बहुत ऊँची अवस्‍था में प्रभु और संसार एक साथ प्रिय लगते हैं । वह अवस्‍था तब आती है जब संसार हमें प्रभुमय दिखने लगे । संसार के हर कण में प्रभु दिखने लगे । यहाँ तक बिरले ही पहुँच पाते हैं जैसे भक्‍त प्रह्लाद जी पहुँचे ।)


इसलिए हमें भक्ति की जागृती करनी चाहिए कि प्रभु हमें प्रिय लगे और प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए की हम प्रभु को प्रिय लगें । प्रभु हमें प्रिय लगे - यह भक्ति की जागृती से ही संभव है क्‍योंकि भक्ति हमें प्रभु के सदगुण, ऐश्‍वर्य और श्रीलीला का दर्शन करवा ऐसा करवा देती है । हम प्रभु को प्रिय लगें - यह प्रभु कृपा से ही संभव है इसलिए ऐसी प्रार्थना नित्‍य होनी चाहिए की ऐसी प्रभु कृपा हमारे जीवन में भी हो जाये ।


धन्यवाद ज्ञापन

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