श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : मानव जन्‍म लेकर हम दुनियादारी में ज्‍यादातर जीवन व्‍यर्थ कर देते हैं एवं मानव जीवन के मूल उद्देश्य से चुक जाते हैं । दुनियादारी का लाभ, भक्ति के लाभ के आगे गौण है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



प्रभु अलग अलग रूपों में होते हुये भी एक ही हैं । दुनिया के लोग अलग अलग हैं । इसलिए एक प्रभु से हम निभा सकते हैं क्‍योंकि प्रभु तो एक ही हैं । पर इतनी बड़ी दुनिया से हम कैसे निभा पायेगें ?


पहली बात, दुनिया दोष और कमियां देखती है इसलिए दुनिया से रिश्ते बनते बिगडते रहते हैं । प्रभु दोष और कमियां नहीं देखते इसलिए भक्‍त की भक्ति निरंतर कायम रहती है ।


उदाहरण स्‍वरूप दुनिया के रिश्ते स्थिर नहीं रहते । उनमें उतार चढाव आते रहते हैं । आज किसी को हम अच्‍छे लगते हैं तो जरूरी नहीं की कल भी लगेगें । आज का दोस्‍त कल दुश्‍मन भी बन जाता है । जिसकी आज बढाई हो रही है कल दुनिया उसकी बुराई करने में नहीं चुकेगी । दुनिया के रिश्ते को स्थिर रखना संभव नहीं । पता नहीं कौन हमारे किस व्‍यवहार से, किस बात से नाराज हो जाये । एक को खुश रखते हैं तो दूसरा नाखुश हो जाता है । सभी से सब समय तालमेल रखना असंभव है ।


एक बार मान भी ले की सभी से तालमेल रख भी लिया तो क्‍या होगा - सब तरफ से बढाई मिलेगी । उसका अहंकार आयेगा जो फिर हमारा पतन करवायेगा । सबसे तालमेल रखकर हम हमारे जीवन के अंत में 2000-3000 व्‍यक्तियों को शमशान यात्रा तक ला सकते हैं । मृत्यु के बाद 12 दिनों तक हमारी बढाई हो सकती है । फिर धीरे धीरे वह धुमिल होती जायेगी । पहले लोग सप्‍ताह में, फिर महिने में, फिर साल में 1-2 बार हमें याद करेगें । दो-तीन पीढी बाद कोई श्राद्ध पक्ष में याद कर ले तो भी गनीमत है । जरा सोंचे हमें अपने सर-दादाजी (यानी दादाजी के दादाजी) के बारे में कितना पता है ।


जितना समय हम दुनिया से व्‍यवहार रखने में खर्च करते हैं उसका आधा समय भी प्रभु को देवें तो हमारी भक्ति की प्रगति होगी । प्रभु कमियां और दोष नहीं देखते अपितु उन कमियां और दोष को मिटाते हैं । भक्ति के बल पर हमारे भीतर का शुद्धिकरण होता है और हम मन, कर्म, वाणी से निर्मल हो जाते हैं । पाप और विकार छुटते है और हम पवित्र हो जाते हैं । पवित्र आत्‍मा का ही प्रभु से मिलना होता है । भक्ति और भक्‍त सदैव के लिए अमर हो जाते हैं । जरा सोचें जितना हम अपने दादाजी के दादाजी के बारे में नहीं जानते उससे ज्‍यादा हमें भगवती मीराबाई के बारे में पता है जबकि भगवती मीराबाई से या उनके कुल से हमारा कोई रिश्ता नहीं है ।


दूसरी बात, प्रभु हमसे कभी रिश्ता नहीं तोडते चाहे भक्‍त भक्ति छोड भी देवें । दुनिया छोटे से कारण पर हमारा साथ छोड देती है । दोनों के लिए एक उदाहरण देखें । श्रीमद भागवत महापुराणजी में संत अजामिल का चरित्र है । अजामिल बड़े धर्मपरायण व्‍यक्ति थे । समाज में उनकी साख थी । लोग उनकी बढाई करते थे । फिर उनका पतन हुआ । वे वैश्‍यागमनी हो गये, चोरी करने लगे, मदिरा के नशे में रहने लगे तो गावं वालो ने उन्‍हें जाति से बहिष्कृत करके गाँव से भी दूर कर दिया । वे वैश्‍याओं के साथ गाँव के बाहर रहते थे । उनके पतन पर सभी ने उनका साथ छोड दिया । कल तक जो उनकी इज्‍जत करते थे आज वे उन्‍हें पत्‍थर मारने को तैयार थे । समाज हमारी बुराई से नहीं अपितु हमसे नफरत करने लगता है । [ प्रभु ने तो रावण से भी नफरत नहीं की । उसकी बुराई के लिए उसे दंड दिया पर रावण से कभी द्वेष नहीं किया । अंत समय में तो प्रभु ने रावण को मोक्ष तक दे दिया (क्‍योंकि प्रभु के हाथों जिसका उद्धार होता है उसे मोक्ष ही मिलता है क्‍योंकि प्रभु के पास मोक्ष से कम कुछ है ही नहीं ।) अंत समय रावण को गुरूतुल्‍य मान प्रभु ने श्री लक्ष्‍मणजी को ज्ञान लेने रावण के पास भेजा । इतना बड़ा सम्‍मान दिया प्रभु ने । ] प्रभु ने अजामिल की बुराईयो के बावजुद अंत समय में सिफ एक नाम के कारण उनको यमपास से मुक्‍त करा दिया और अंत में दोबारा भक्ति के बल पर उन्‍हें अपने धाम बुलाया । अजामिल ने प्रभु को छोड दिया था, भक्ति छोड दी थी, पतनमुख हो गया था पर प्रभु ने उसे नहीं छोडा । उसकी भक्ति उसको वापस प्रदान की और उसका उत्‍थान करके उसको वह गति दी जो उसकी निंदा करने वालो को भी नहीं मिली । इस प्रसंग में दुनियादारी और भक्ति के गुण-दोष स्‍पष्‍ट दिखते हैं । दुनियादारी के दोष और भक्ति के गुण का एक बड़ा उदाहरण है संत अजामिल की कथा ।


तीसरी बात, प्रभु सदैव जीव को निभाते हैं, दुनिया कदापि ही निभाती है वह भी जितना प्रभु निभाते हैं उसका लेशमात्र भी नहीं निभा सकती । उपर वर्णित संत अजामिल की कथा में यह भी स्‍पष्‍ट होता है । दुनिया के निभाने पर भी हमारा परलोक नहीं सुधर सकता । प्रभु हमारा ईहलोक, परलोक दोनों सुधार देते हैं (सुदामा जी), हमारे आवागमन को समाप्‍त कर देते हैं (भगवती मीरा बाई), हमारी पीढीयां को तार देते है (केवट जी) । दुनिया हमें थोडी सी बढाई के शब्‍द से ज्‍यादा कुछ नहीं दे सकती । वह बढाई भी हमारे लिए आत्‍मघातक हो सकती है क्‍योंकि वह अहंकार को जन्‍म दे हमारा पतन करवा देती है ।


साराशं यह है कि जरूरत जितनी दुनियादारी रखें और सम्‍पूर्ण ध्‍यान प्रभु पर केंद्रित करें । हम दुनियादारी में इतना समय व्‍यर्थ गवा देते हैं कि प्रभु के लिए हमारे पास समय बचता ही नहीं । दुनियादारी पर खर्च किया समय हमें जीवन काल में एवं जीवन के बाद कुछ बढाई के शब्‍द दे देगा । इसके अलावा उसकी कोई क्षमता नहीं की वह हमारा कुछ भला कर सके । पर प्रभु की भक्ति हमें तार देती है । जीव का सर्वाधिक भला प्रभु की भक्ति ही करती है ।


इसलिए जीवन का अधिक से अधिक समय प्रभु को देना चाहिए । दुनियादारी साधारण रखनी चाहिए । किसी से द्वेष नहीं, सबका मंगल हो, सबका मंगल करने की इच्‍छा हो - तो यह श्रेष्‍ठ दुनियादारी होती है । इससे ज्‍यादा की जरूरत नहीं । इससे ज्‍यादा हम करते हैं तो वह व्‍यर्थ ही है ठीक वैसे जेसे एक बच्‍चा अपने पढाई का समय खेलकर गवा देता है और फिर परीक्षा में फेल हो जाता है । हम भी मानव जीवन दुनियादारी में गंवा देगें तो जीवन की परीक्षा में उर्त्‍तीर्ण नहीं हो पायेगें ।


मानव जीवन को सफल बनाना है तो ज्‍यादा समय, ज्‍यादा उर्जा, ज्‍यादा बल प्रभु भक्ति में लगाना ही होगा । इसके अलावा कोई विकल्‍प नहीं है । स्‍वधर्म निभाते हुये प्रभु भक्ति करना, यही सबसे उचित मार्ग है, यही श्रीमद गीता माता का सार भी है ।


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