श्रीगणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु हमें भवसागर से बचाने के लिए सदैव तैयार हैं । हमें जीवन में प्रभु भक्ति अर्जित कर भवसागर से बचने का साधन समय रहते तैयार करना चाहिए । पूरा लेख नीचे पढ़े -



प्रभु के तारने से हम भवसागर से तर जाते हैं और प्रभु के छोडते ही हम भवसागर में डुब जाते हैं ।


यह दृष्टान्त श्रीरामचरितमानस में स्‍पष्‍ट देखने को मिलता है । जब समुद्रदेव को पार करने हेतु पत्‍थर डाले गये तो पत्‍थर डुब गये । फिर भक्‍त शिरोमणी श्री हनुमानजी ने उन पत्‍थरों पर राम नाम लिखा । फिर उन्‍हें समुद्र में छोडा गया तो वे तैरने लगे । यह कथा क्‍या बताती है ? प्रभु नाम नहीं था तो पत्‍थर डुब गये और प्रभु नाम था तो वे स्‍वभाव के विपरित तैरने लगे, डुबे नहीं ।


यही बात मानव के साथ भी लागु होती है । अगर प्रभु नाम की पूंजी नहीं होगी तो हमारा भवसागर में डुबना पक्‍का है और अगर प्रभु नाम की पूंजी साथ है तो भवसागर से तिरना पक्‍का है (डुबने से बच जायेगें) ।


पत्‍थर बड़े कठोर होते हैं और भारी भी होते हैं । हम मनुष्‍य भी काम, क्रोध, मद, लोभ की कठोरता से जकडे हुये होते हैं एवं पापों के भयंकर भार से भारी होते हैं । हमारा भवसागर में डुबना एकदम पक्‍का है । बचने का एकमात्र वही उपाय हे जो मेरे श्री हनुमानजी प्रभु ने करके दिखाया । राम नाम लिख दिया कठोर और भारी पत्‍थरों पर । हम भी प्रभु का नाम अपने भीतर लिख लेवें तो भवसागर में वैसे तैरेगें जैसे सेतु निमार्ण के समय पत्‍थर तैरे थे ।


काम, क्रोध, मद, लोभ की कठोरता पूरी तरह से कम कर पाना संभव नहीं । पापमुक्‍त होकर भारमुक्‍त होना भी पूरी तरह संभव नहीं । कलियुग में तो बिलकुल भी संभव नहीं । हम कितना भी सात्विक जीवन जी लेवें फिर भी काम, क्रोध, मद, लोभ के छीटे हमारे दामन में पडेगें ही । उदाहरण स्‍वरूप हमने सात्विक जीवन जीया (जो बिरले ही जी पाते हैं) तो इसी बात का मद (अहंकार) हो जायेगा । ऐसे ही पाप भी कुछ मात्रा में हुये बिना नहीं रहेगें ।


मानवरूपी पत्‍थर को भव पार करना है तो दो ही उपाय हैं । पहला उपाय - काम, क्रोध, मद, लोभ एवं अन्‍य विकारों की कठोरता से बचें एवं पाप के भार से बचें । हम पत्‍थर की तरह कठोर और भारी न होकर फुल की तरह कोमल और हल्‍के हो जायेगें तो भवसागर तर जायेगें । ऐसा करने के लिए भक्ति का सहारा लेना पडेगा क्‍योंकि विकारों को मिटाने के लिए और पाप आचरण से बचने के लिए यही एकमात्र साधन है । जैसे ही प्रभु में प्रेमाभक्ति बढती है विकार एक-एक करके भागते हैं । बुराईयों की जगह अच्‍छाईयां लेती है । अवगुणों की जगह गुण विद्यमान होते हैं । भक्ति के आते ही पूण्‍य की संख्‍या बढने लगती है और पाप क्षीण होने लगते हैं । भक्ति के बिना अन्‍य कोई भी तरिके से ऐसा होना कतई संभव नहीं । शुद्धिकरण का सबसे बड़ा स्त्रोत्र भक्ति है जिससे विकार मिटते हैं और जीव पाप करने से बचता है ।


मानवरूपी पत्‍थर को भव से पार करने का दूसरा उपाय है कि - काम, काम, क्रोध, मद, लोभ इत्‍यादि विकारों की कठोरता लिये एवं पाप का भार लिये हुये भी प्रभु का नाम अपने भीतर लिख देवें तो फिर हम डुबने से बच जायेगें । प्रभु के नाम में इतनी अदभूत शक्ति होती है कि वह बड़े से बड़े विकारों को, बड़े से बड़े पापों को नष्‍ट कर डालती है । हम इतने विकार या इतने पाप जन्‍म-जन्‍मातर में भी इकट्ठे नहीं कर सकते जितना प्रभु नाम में उसे भस्म करने की क्षमता होती है । प्रभु का नाम पूर्व संचित विकारों एवं पापों की शुद्धि करता है एवं नये विकार और पापों को पनपने नहीं देता । इस तरह हमारा दोहरा शुद्धिकरण होता है - पुराना साफ होता है ओर नया बनता नहीं ।


श्री रामचरितमानस में एक प्रसंग वर्णित नहीं है पर अन्यत्र यह प्रसंग वर्णित है । संतो ने व्‍याख्‍या की है कि एक बार सेतु निमार्ण के दौरान जब प्रभु ने देखा कि मेरे नाम से पत्‍थर तिर रहे हैं तो दूर जाकर प्रभु ने भी स्‍वयं अपने हाथ से एक पत्‍थर समुद्र में छोडा । उस पर प्रभु ने अपना नाम नहीं लिखा था पर उस अपने हाथों से छोडा था - वह डुब गया । प्रभु ने श्री हनुमानजी से इसका कारण पुछा । भक्‍त शिरोमणी श्री हनुमानजी ने इस प्रसंग की बड़ी अदभूत व्‍याख्‍या की और कहा - कि प्रभु जिसे आपने छोड दिया वह तो डुबेगा ही ।


प्रभु किसी को भी नहीं छोडते । दुर्भाग्य का पुतला मनुष्‍य ही प्रभु का साथ छोड देता है, प्रभु को भुल जाता है । कितनी सही व्‍याख्‍या है कि जिसने प्रभु को बिसरा दिया, प्रभु को भुला दिया, वह तो डुबेगा ही ।


व्‍याख्‍या बड़ी स्‍पष्‍ट है कि प्रभु के हाथों से छोडने पर पत्‍थर डुब गया और प्रभु नाम से पत्‍थर तिर गया ।


श्री हनुमानजी भक्‍तों के शिरोमणी हैं और भक्तिभाव से उन्‍होंने पत्‍थरो पर राम नाम लिखा । इस लीला का तात्‍पर्य क्‍या है ? तात्‍पर्य यह है, लीला यह बताती है कि मेरे श्री हनुमानजी हमें भक्ति से अपने हृदय में प्रभु नाम लिखने को कहते हैं । इससे हम जीवन में निश्‍चिंत हो जायेगें और निश्‍चित भवसागर में तर जायेगें ।


पर मानव का दुर्भाग्य देखें की अपने हृदय में इतनी चीजों को हमने भर रखा है, इतना मैला कर रखा है, इतना कठोर कर रखा है की प्रभु के बिराजने के लिए वह अनुकूल ही नहीं है । इसे साफ करने का, शुद्ध करने का भक्ति ही एकमात्र आधार है । भक्ति से अन्‍त:करण की शुद्धिकरण होते ही वहाँ प्रभु का आगमन होता है ।


मानव जीवन पाकर विकारों की कठोरता से जकडे हुये और पाप के भार से लदे हुये हमें धिक्‍कार है । हमने भवसागर में डुबने हेतु पुरे साधन तैयार कर रखें हैं, स्‍वयं को डुबाने के लिए तैयार कर रखा है । इतने पर भी हमारा ध्‍यान इस बात की तरफ नहीं जाता और हम मौज से अपना जीवन यापन करने में लगें हैं । यह मौज वैसी ही है जैसे मदिरा पीने पर होती है । मदिरा हमारे शरीर का कितना नुकसान करती है यह हमें पता नहीं होता और हम उसकी मौज में खोये रहते हैं । वैसे ही विकार और पाप हमारा कितना नुकसान करते हैं यह हमें पता नहीं होता फिर भी इनके मौज में हम खोये रहते हैं ।


हमें जरूरत है अविलम्‍ब भक्ति से इन विकारों को धोकर, पाप से मुक्‍त होकर, हृदय में प्रभु नाम अंकित करके भवसागर को निश्चित होकर पार करने का साधन इस मानव जीवन में तैयार कर लेना जिससे अंत समय पछताना न पडें ।


धन्यवाद ज्ञापन

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