श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर दो छोटे आलेख ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक रविवार
Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक बुधवार
Quotes on GOD (in Hindi & English), every Wednesday
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
Our Objectives & Pledges - Also answers FAQ (Frequently Asked Questions)
Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
Words of Prayer प्रभु के लिए प्रार्थना, कविता
GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : जीवन में प्रतिकुलता हमें प्रभु के समीप पहुँचाने का एक अति उत्‍तम साधन है । अगर जीवन में प्रतिकुलता है तो उसे प्रभु की कृपा प्रसादी मानकर जीवन प्रभुमय बनाना चाहिए । पूरा लेख नीचे पढ़े -



जीवन में वह घडी धन्‍य होती है जब प्रतिकुलता के पल हमें यह महसूस करवा देती है कि हमारा बल, हमारी बुद्धि और हमारी शक्ति कितनी थोडी और कितनी अपूर्ण एवं अपर्याप्त होती है ।


एक गरीब को उसकी प्रतिकुलता यह बता देती है कि साधारण जीवन यापन भी वह अपनी शक्ति और सामर्थ्‍य से नहीं कर सकता । एक अमीर को उसकी स्‍वास्‍थ की प्रतिकुलता बता देती है कि वह एक श्‍वास भी अपने पूरे जीवन काल में अर्जित किये धन को देकर नहीं खरीद सकता ।


अस्‍पताल के आई सी यू के सामने अच्‍छे-अच्‍छे नास्तिक भी प्रभु को नतमस्‍तक हो जाते हैं क्‍योंकि उनकी खुमारी उतर चुकी होती है - उनके धनबल, बुद्धिबल, शक्तिबल की खुमारी अपने आप शान्‍त हो चुकी होती है । अब प्रभु को पुकारने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं बचा होता है ।


अपने धन, अपनी बुद्धि और अपनी शक्ति से विश्‍वास उठा तो तत्‍काल प्रभु के बल और शक्ति पर अथाह विश्‍वास जम जाता है । उदाहरण स्‍वरूप हमारे प्रयासों के बावजुद जीवन की बाजी हार चुका एक बच्‍चे को जब हम प्रभु से सच्‍चे मन से अरदास के कारण जीवित बचता पाते हैं तो हमें प्रभु कृपा पर अथाह विश्‍वास हो जाता है । चमत्‍कार को नमस्‍कार है - ऐसी कहावत है ।


पौराणिक पात्रों में भगवती कुन्‍ती जी (पाण्‍डवों की माता) ऐसी थी जिन्‍होनें प्रतिकुलता के पल को धन्‍य माना । पाण्‍डव अपने धर्मबल (युदिष्ठिर जी), अपने बाहुबल (भीम जी) और अपने शस्त्रबल (अर्जुन जी) के बावजुद दर दर भटक रहे थे । प्रतिकुलता में भगवती कुन्‍ती जी ने महसुस किया कि धर्मराज की उपाधि से विभूषित युदिष्ठिर जी, 1000 हाथीयों का बल धरण करे भीम जी और अपने समय के श्रेष्‍ठ योद्धा अर्जुन जी के साथ होने पर भी उनकी क्षमता और औकात क्‍या है । धर्म (युदिष्ठिर जी) जुऐ में हार गये, बलधारी (भीम जी) और शस्त्रधारी (अर्जुन जी) भगवती दौपद्री के चीरहरण के समय शीश झुका कर बैढे थे । प्रतिकुलता की इस बेला पर भगवती कुन्‍ती एवं भगवती दौपद्री का विश्‍वास अब सिर्फ और सिर्फ प्रभु पर था ।


भगवती दौपद्री ने चीरहरण के समय सबसे गुहार की - ससूरतुल्‍य धृतराष्‍ट, पितामह भीष्‍म, गुरूवर द्रोण, काका विदुर एवं राज्‍यसभा के सभी गणमान्‍य सदस्‍यों से एवं अपने पांचों पतियो से । पांच पति जिसमें से एक धर्मराज (युदिष्ठिर जी), दूसरा बलराज (भीम जी), तिसरा शस्त्रराज (अर्जुन जी) के होते हुये भी अबला हुई भगवती दौपद्री को अंत में अपने बल पर भी भरोसा था । उन्‍होंने अपनी साडी दोनों हाथों से पकड रखी थी । संतों ने बड़ी सुन्‍दर व्‍याख्‍या की है कि प्रभु को माता ने कहा की एक अबला की लाज पर बन आई है और आप उसकी मदद को नहीं जा रहे - ऐसा क्‍यों ? प्रभु ने कहा की अभी उसे अपने बल पर भरोसा है । जब भगवती दौपद्री जी ने अपने बल को परख लिया और उन्‍हें लगा की अपने बल से वे अब ज्‍यादा समय साडी नहीं पकड पायेंगी तब उन्होंने स्‍वत: दोनों हाथ उठा कर साडी को छोड दिया और मेरे प्रभु को पुकारा । फिर क्‍या था प्रभु ने वस्त्र अवतार लिया और लिपट गये अपने भक्‍त से, उसकी लाज बनकर । फिर "साडी में नारी है की नारी में साडी है" का वाक्‍य चरितार्थ हो उठा ।


भगवती कुन्‍ती जी यह जानती थी कि प्रतिकुलता की वह घडी धन्‍य होती है तभी तो उन्‍होंने प्रभु से प्रतिकुलता मांगी जब प्रभु ने उन्‍हें वर मागनें को कहा । क्‍योंकि जब जब प्रतिकुलता होती है हम प्रभु को तनमयता से पुकारते हैं और प्रभु तुरंत भक्‍त का उद्धार करने आते हैं ।


पौराणिक उदाहरण की जगह वर्तमान का उदाहरण देखे जब अस्‍पताल में हमारा लाडला 5 वर्षिय पुत्र, परिवार का एकमात्र चिराग बुझने वाला होता है । डाक्‍टर जवाब दे देते हैं । बड़े से बड़े अस्‍पताल, महंगा से महंगा ईलाज नाकाम होता जाता है । विदेश ले जाते हैं, वहाँ भी ईलाज सफल नहीं हो पाता है । सम्‍पन्‍न परिवार रूपया पानी की तरह बहाता है पर धन की, बल की, शक्ति की खुमारी उतरने लगती है तब कोई भक्‍त उनसे प्रभु की अरदास की बात कहता है । प्रतिकुलता हावी हो चुकी होती है तब दादा-दादी, माता-पिता सभी प्रभु की शरण में जाते हैं । फिर मैं और मेरी शक्ति मिटकर प्रभु आप और आपकी कृपा का भाव हमारे अन्‍तकरण में दृढता से बैठ जाता है । जीवन की वह घडी धन्‍य हो जाती है जब प्रतिकुलता हमारी औकात हमें महसूस करवा देती है । हमें हमारी पहुँच, विज्ञान की पहुँच सब पता चल चुका होता है । और फिर एकाएक तनमयता से की पुकार प्रभु सुनते हैं और बच्‍चा नया जीवन पाता है । डाक्‍टर इसे "चमत्‍कार" कहते हैं ।


ऐसा चमत्‍कार जब हम देखते हैं तो हमारे जीवन में ऐसा परिवर्तन आता है की हमारा हर कार्य प्रभु के लिए, प्रभु को समर्पित होकर होने लगता है । क्‍योंकि हम प्रभु की शक्ति में दृढता से विश्‍वास करने लगते हैं । हम हर कार्य प्रभु की इच्‍छा के लिए करने लगते हैं । जीवन प्रभुमय हो उठता है । फिर आनंद हमारे घर उत्‍सव मनाता रहता है ।


पाण्‍डवों का जीवन प्रभुमयता का जीवन्‍त उदाहरण है । महाभरत का युद्ध  जीतने के बाद भी पाण्‍डवों ने सदैव प्रभु का सानिध्य पाते रहने का प्रयत्‍न किया और सफल भी हुये ।


जीवन को प्रभुमय बनाना है तो जीवन में प्रतिकुलता से घबराना नहीं चाहिए । यह तो वह साधन है जो हमें धन्‍य कर देती है जब यह हमारे मन, बुद्धि, विवेक में सभी जगह प्रभु को विद्यमान कर देती है ।


अगर भक्ति प्रबल नहीं हो तो अनुकूलता प्रभु को हमसे दूर कर देती है जबकी प्रतिकुलता सदैव हमें प्रभु के समीप लाती है एवं भक्ति को जगाती है ।


भक्ति में जीवन जीने वाले कितने ही अमर पात्रों को प्रतिकुलता ने ही भक्‍त बनाया । इसलिए जीवन में जब प्रतिकुलता हो तो इसे भगवत प्रसादी मानकर प्रभु के समीप पहुँचने का साधन जान प्रभु भक्ति अन्‍तकरण में जाग्रत करनी चाहिए । ऐसा होते ही हमारा मानव जीवन चमक उठता है ।


धन्यवाद ज्ञापन

इस वेबसाइट की कोशिश है कि प्रभु के करीब चले | इस कोशिश में जहाँ जहाँ से हमें सहयोग मिला है उसे अभिस्वीकार करते हुए यहाँ दर्ज “विचारों को फैलाने” में जिन्होंने हमें सहयोग दिया है उनका हम सादर आभार प्रकट करते हैं |

प्रकाशन हेतु :
इन्होने प्रभु के बारे में हमारे लेखन का समालोचन करने के बाद प्रकाशन किया | इनके प्रति हमारा हार्दिक आभार | वर्णक्रमानुसार :
SWARGVIBHA.
ब्लॉग हेतु:
लेख ब्लॉग के रूप में यहाँ उपलब्ध हैं | इन सभी ब्लॉग मंच का धन्यवाद | सभी का आभार | वर्णक्रमानुसार :
HINDIBLOGS, HINDIBLOGSPOT, JAGRANJUNCTION.