श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : निराशा के समय सबसे बड़ी आशा के रूप में प्रभु सदैव हमारे समक्ष उपस्थित रहते हैं । प्रभु के आते ही निराशा हमारे से दूर भागती है और आशा हमारा दामन थाम लेती है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



हमें अच्‍छाई, धर्म, प्रभु कृपा, प्रभु दया के प्रति निराशावादी कतई नहीं होना चाहिए क्‍योंकि इतिहास में ऐसे कई प्रसंग हैं जब बुराई ने अपनी जडे इतनी मजबुत कर ली, इतनी फैला ली की धर्म-कर्म, आस्‍था के सभी द्वार बंद कर दिये । उदाहरण स्‍वरूप हिरणाकश्यपु और रावण को ही लेवें । दोनों ने आसूरी राज्‍य स्‍थापित किया और अच्‍छाई का पतन हुआ, धर्म का पतन हुआ और अधर्म और बुराईयों ने अपने पैर पसारे । इन दोनों असुरों ने यहाँ तक की खुद को परमात्‍मा की तरह शक्तिशाली बता खुद की पूजा भी करवाना प्रारंभ कर दिया था और धर्म के सभी द्वार बंद कर दिये थे ।


ऐसी अवस्‍था में प्रभु ने अपने श्रीवचनों को निभाते हुये और श्रीमद गीताजी के अमर श्‍लोक " यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत " के उपदेशानुसार धर्म की रक्षा की और धर्म को पुनः स्‍थापित किया । ऐसे अनेको उदाहरण इतिहास में हैं कि धर्म की हानी और अधर्म का बोलबाला होने पर प्रभु ने अधर्म का पतन कर धर्म की जय करवाई ।


इसलिए निराशा के समय जब लगे की अब धर्म बचा ही कहां है, अधार्मिक प्रवृति का ही बोलबाला हो - तब प्रभु में, प्रभु कृपा में, प्रभु दया में अडिग विश्‍वास स्‍वाभाविक रूप से हमारे मन में होना चाहिए । ऐसा नहीं हुआ तो हम भी अधर्म के मार्ग पर बढ चलेगें क्‍योंकि मन में भाव आयेगा, परिस्थिति ऐसा आभास करवायेगी की हम अकेले अधर्मी की भीड में क्‍या कर लेगें । हम कुछ कर पाये या नहीं पर गलत चीज को स्‍वीकारना सबसे बड़ी गलती होती है ।


प्रभु की भक्ति होगी तभी प्रभु में विश्‍वास होगा कि प्रभु ने पूर्व में अधर्म का नाश कर धर्म की ध्‍वजा को सदैव फहराया है और प्रभु ने धर्म की स्‍थापना हेतु श्रीमद गीताजी में संकल्‍प लिया है - हर युग में धर्म की रक्षा का संकल्‍प ।


इसलिए सामाजिक जीवन में बुराई को देखते हुये, बुराई के बीच रहते हुये भी हमें निराशावादी नहीं होना चाहिए या बुराई में लिप्‍त नहीं होना चाहिए । यहाँ श्रीरामचरितमानस के एक पात्र श्री विभिषण जी का उदाहरण सटिक बैठता है । बुराईयों के बीच रहकर भी धर्म के पथ पर चलने के कारण वे प्रभु के प्रिय बने और अखण्‍ड लंका का राज्‍य प्राप्‍त किया । चाहते तो विभिषण जी भी कुम्‍भकरण की तरह बुराई (रावण) का साथ दे सकते थे । विभिषण जी की अग्नि परीक्षा तब थी जब सब कुछ जानने वाले प्रभु ने लीला में उनसे रावण को मारने का भेद पुछा और बिना संकोच विभिषण जी ने रावण के नाभी में अमृत होने का रहस्‍य बताया । विभिषण जी जानते थे कि यह रहस्‍य बताने के बाद रावण की मृत्यु निश्‍चित है । पर उन्‍होंने बताया और वह भी बेहिचक । प्रभु ने सब कुछ जानते हुये भी परीक्षा लेने हेतु पुछा था । अधर्म का साथ न देकर धर्म का साथ देने की यह सबसे बड़ी परीक्षा थी और विभिषण जी उर्त्‍तीण हुये । यही कारण था की वे सदैव प्रभु के प्रिय बने रहे । बुराई का, अधर्म का साथ देते तो विभिषण जी की गति भी कुम्‍भकरण, मेघनाथ की तरह होती । अच्‍छाई का, धर्म का साथ दिया तो लंकापति बन गये ।


विभिषण जी जब रावण के आधीन लंका में रहते थे तो भी उनको आसरा और विश्‍वास मेरे प्रभु श्री रामजी का था । उनके निराशावादी समय में भी उनकी सबसे बड़ी आशा प्रभु श्री रामजी थे । उन्‍हें विश्‍वास था प्रभु की दया, प्रभु की कृपा पर ।


हमें भी व्‍यक्तिगत जीवन में सबसे निराशावादी समय में भी सबसे बड़ी आशा प्रभु की कृपा और प्रभु की दया की होनी चाहिए । "प्रभु हैं मेरे साथ" - बस यह अहसास दृढ हो जाये (यह दृढता भक्ति से ही आ सकती है) तो निराशा को आशा में परिवर्तित होते उतना समय भी नहीं लगेगा जितना बर्फ को धूप में रखने पर पानी बनने में लगता है । यह बात सिर्फ अनुभव की जा सकती है । दुनिया में बहुत महापुरूष ऐसे हुये हैं जिन्‍हें घोर निराशा से निकाल कर प्रभु ने उनके अंदर आशा की किरणों का संचार किया है ।


सूत्र क्‍या है जीवन की निराशा को आशा में बदलने का । मार्ग क्‍या है निराशा से आशा की तरफ जाने का । सूत्र एक ही है, मार्ग एक ही है - प्रभु मार्ग । भक्ति के द्वारा प्रभु की तरफ बढने का मार्ग, भक्ति के द्वारा प्रभु के बन जाने का सूत्र । फिर निराशा वैसे भागेगी जैसे दिन होते ही अंधेरा भागता है । सुर्योदय होते ही अंधेरे से कहना नहीं पडता की तुम जाओ । सुर्योदय का मतलब ही है की अंधेरा का हटना । वैसे ही प्रभु के हमारे जीवन में आने का मतलब ही है की निराशा और निराशावादी विचारों का हटना ।


प्रभु के जीवन में आते ही आशा वैसे हमारे साथ रहती है जैसे परछाई सदैव हमारे साथ रहती है । हमें परछाई को कहना नहीं पडता साथ रहने हेतु । उसका स्‍वभाव है की वह हमारे साथ-साथ चलेगी । वैसे ही प्रभु के जीवन में आते ही आशा हमारे साथ-साथ चलती है ।


निराशा भाग जाये जैसे अंधेरा भागता है दिन होने पर और आशा साथ रहे जैसे परछाई साथ रहती है - यह स्थिति सिर्फ और सिर्फ भक्ति ही उत्‍पन्‍न कराती है । प्रभु की भक्ति में ही इतना बड़ा सामर्थ्‍य है । ऐसा सामर्थ्‍य अन्‍य कही मिल ही नहीं सकता जो निराशा और आशा में उपरोक्‍त परिणाम दे सके ।


इतिहास गवाह है कि विपदाओं में, निराशा में भक्ति द्वारा प्रभु की अंगुली पकडने से कितना बड़ा बदलाव जीवन में आया है । जीवन्‍त उदाहरण पाण्‍डवों का है जब युदिष्ठिर जी ने राजस्‍यु यज्ञ की इच्‍छा की तो प्रभु ने हंस कर पुछा की क्‍या राजस्‍यु यज्ञ कर यह दिखाना चाहते हो कि तुम कितने बड़े हो गये हो । श्रीकमलचरणों को पकड अर्जुन जी ने कहा कि प्रभु हम यह दिखाना चाहते हैं दुनिया को की हमारे पास सूई जितनी भूमि भी नहीं थी, दर-दर भटक रहे थे, हमारे प्राणों पर कितने संकट आये पर सिर्फ एक प्रभु ने हमारे निराशा को आशा में बदल दिया । इन श्रीकमलचरणों की महिमा जग को बताना चाहते हैं जिनको पकडने के कारण, दर-दर भटकने वाले पाण्‍डव पूरे विश्‍व के अधिपति बन गये और राजस्‍यु यज्ञ करने जितना सामर्थ्‍यवान बन गये ।


घोर निराशा के समय आशा की एकमात्र किरण का नाम ही "प्रभु" हैं । प्रभु को पाने के माध्‍यम का नाम ही "भक्ति" है ।


धन्यवाद ज्ञापन

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