श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु कृपा का इतना बड़ा सामर्थ्‍य होता है की वह प्रतिकुलता में भी अनुकूलता का सुख प्रदान करती है । इसलिए प्रभु कृपा जीवन में अर्जित नहीं कर पाने के दुर्भाग्य से बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं । पूरा लेख नीचे पढ़े -



प्रभु की कृपा होती है तो आप कांटो पर भी सोयें तो भी कांटे नहीं चुभेगें । यानि हमारी नियति / भाग्‍य से उत्‍पन्‍न परिस्थिति अगर हमें कांटो पर भी सुलाये तो भी कांटे नहीं चुभेगें । इससे ठीक विपरित अगर हम प्रभु कृपा जीवन में अर्जित नहीं कर पाये या प्रयास की कमी के कारण प्रभु कृपा से वंचित रह गये तो हम फूल पर भी सोयें तो फूल भी हमें चुभन देगी ।


इसका जीवन्‍त उदाहरण भगवती मीरा बाई हैं । भक्ति में डुबी और प्रभु कृपा की चादर ओढे भगवती मीरा बाई को राणा ने ना जाने कितने दुःख दिये, उन्‍हें मारने का कितना प्रयास किया पर फिर भी भगवती मीरा बाई का सकुन तक नहीं छीन पाया । राणा ने विष भेजा, भगवती मीरा बाई गटागट प्रभु नाम स्‍मरण कर पी गई और जहर अमृत बन गया । इसका ही प्रभाव था कि अंत समय भगवती मीरा बाई को कलेवर सहित प्रभु अपने धाम ले गये क्‍योंकि वे अमृत पीकर अमर हो गई थी । भगवती मीरा बाई को विषैला सर्प भेजा गया तो वे प्रभु का रूप (श्री शालिग्रामजी) बन गये । भगवती मीरा बाई को विषैले कांटो की शैय्या पर सुलाया गया पर वे फूल बन गये । राणा कष्‍ट दे देकर थक गया, उसकी खुमारी उतर गई । राणा का मान जाता रहा पर भगवती मीरा बाई का बाल भी बांका नहीं हुआ ।


प्रभु कृपा का प्रभाव इन भजन की पंक्तियों में स्‍पष्‍ट देखने को मिलता है - "जानकीनाथ सहाय करें जब, कौन बिगाड करें नर तेरो" । जब प्रभु कृपा करते हैं तो जग में किसकी ताकत है कि कोई आपका कुछ बिगाड कर सके । सभी ग्रह, नक्षत्र अनुकूल हो जाते हैं, विपरित फल देने वाले ग्रह नक्षत्र भी हमारा मंगल करने पर आतुर हो जाते हैं । पूरा विश्‍व शत्रु हो जाये, इतने अनगिनत शत्रु जिसकी तारों की तरह गणना भी संभव नहीं, तो भी वे हमारा बाल बांका नहीं कर सकते । इतनी बड़ी सामर्थ्‍य है प्रभु कृपा की जिसके प्रत्यक्ष दर्शन हमें श्री प्रह्लाद जी के चरित्र में भी होते हैं ।


श्री प्रह्लाद जी राक्षस कुल में जन्‍में थे पर प्रभु के बड़े भक्‍त थे और बचपन में ही प्रभु कृपा अर्जित कर ली थी । उनके पिता द्वारा दुःख देने और मृत्यु देने के इतने प्रयास के बाद भी श्री प्रह्लाद जी का बाल भी बांका नहीं हुआ । उन्‍हें सर्पो के बीच छोडा गया या हाथी से कुचलाया गया पर सभी प्रयास व्‍यर्थ गये । पहाड़ से फेंका गया तो प्रभु बचाने को नीचे तैयार खडे थे और गिरते हुये प्रह्लाद जी को प्रभु ने अपने बाहों में भर लिया । सबसे बड़ा उदाहरण होलिका द्वारा अग्नि में जलाने के प्रयास का है जिसके कारण बुराई पर अच्‍छाई के विजय के सूचक होली का त्‍योहार मनता है । इस प्रसंग की संतों ने बड़ी सुन्‍दर व्‍याख्‍या की है कि जब होलिका ने वरदान में मिली अपनी चादर ओढ कर (जिससे वह अग्नि में नहीं जल सके) श्री प्रह्लाद जी को अपनी गोदी में जकडकर बैठी तो उन्‍नचास तरफ से वायु चली । चादर को जोर से पकडने के बावजुद चादर उड गई और वायु के वेग के कारण प्रचंड हुई अग्नि में होलिका क्षणभर में जल गई । श्री प्रह्लाद जी बच गये और जब उन्‍हें उनके मित्रों ने अग्नि के ताप के बारे में पुछा तो श्री प्रह्लाद जी ने कहा कि अग्नि मुझे शीतलता / ठंडक दे रही थी । यहाँ प्रभु कृपा का प्रभाव स्‍पष्‍ट दिखता है कि दुःख देने वाली चीजें सुख देने लगती है । कांटे चुभन नहीं देते, सर्प का विष मौत नहीं देता - प्रकृति को विपरीत हाने पर मजबुर सिर्फ प्रभु कृपा ही कर सकती है ।


दो पौराणिक उदाहरण के बाद अब देखें की अगर हम जीवन में प्रभु कृपा के अलावा सब कुछ (वैभव, धन, संपति‍) अर्जित कर भी लेते हैं तो क्‍या होता है । एक वर्तमान का उदाहरण देखें की एक अमीर उद्योगपति के छ: पुत्र हैं । उद्योगपति ने खुब धन, संपति की जीवन भर कमाई की है । सभी उल्‍टे सीधे काम किये हैं । गलत आदतों के कारण बिमार रहने लगा और अंतिम वर्षो में वह बिस्‍तर में लेटा हुआ देखता है की दवाईया काम नहीं कर रही, रीऐक्‍शन कर रही हैं । बेटे उसके मौत का इंतजार कर रहें हैं कि बुढा कब मरे और संपत्ति का विभाजन हो सके । संपत्ति के लिए लडाईयां, मन-मुटाव बच्‍चों में अभी से शुरू हो चुका है । यह सब देखकर और अपनी बिमारी के चलते, मखमल के बिस्‍तर पर, आलीशान बंगले में भी ईलाज-दवाईयों की पूरी क्षमता लगाने पर भी उसे बेहद बैचेनी है, शारीरिक कष्‍ट है, मानसिक संताप है और रात-रात भर नींद नहीं आती है । यह उदाहरण है कि अगर हम जीवन में प्रभु कृपा अर्जित नहीं कर पायें (सिर्फ धन संपत्ति ही अर्जित की) तो हम फूल पर भी सोयें (मखमल के बिस्‍तर पर) तो फूल भी हमें चुभन देगें, तडपायेगें, सोने नहीं देगें ।


सार यह है कि कांटो का नहीं चुभना - प्रभु कृपा के अर्जन के कारण संभव होता है । सार यह है कि फूलों का चुभना - प्रभु कृपा जीवन में अर्जित नहीं कर पाने के कारण ही होता है । दोनों परिस्थिति में प्रभु कृपा ही एकमात्र कारण है जो की हमें उपरोक्‍त उदाहरणों से स्‍पष्‍ट दिखता है । भगवती मीरा बाई और भक्‍तराज श्री प्रह्लाद जी को कांटे नहीं चुभे तो यह मात्र और मात्र प्रभु कृपा अर्जित कर पाने के कारण । और उद्योगपति को फूल भी चुभने लगे तो इसका कारण मात्र और मात्र प्रभु कृपा से वंचित रहने के कारण क्‍योंकि जीवन में वह धन, संपत्ति अर्जित करने में ही रह गया - प्रभु कृपा अर्जित करना भुल गया ।


इसलिए प्रभु कृपा अर्जन हेतु सदा प्रयासरत रहना चाहिए क्‍योंकि प्रभु कृपा से वंचित रहना जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है । और जीवन में प्रभु कृपा अर्जित कर पाना ही जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है । इसलिए हमारा प्रयास सौभाग्‍यशाली होने के लिए होना चाहिए जिसके लिए प्रभु कृपा अर्जित करने की अनिवार्यता है ।


धन्यवाद ज्ञापन

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