श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : अलग अलग धर्म, पंथ के विभाजन के कारण हमारे बीच का समभाव खत्‍म हो गया है । पर भक्ति हमें एक प्रभु का दर्शन हर जगह कराती है और मंदिर, मस्जिद, चर्च रूपी ईमारत में झुकनें की जगह वहाँ बिराजे एक ही परमपिता परमेश्‍वर के सामने झुकना सीखाती है । पूरा लेख नीचे पढ़े -



जैसे हम एक सरोवर के अलग अलग घाट पर जायेगे पर सरोवर का जल तो एक ही मिलेगा, वैसे ही अलग अलग धर्म, पंथ के मार्ग से भी आगे बढें तो एक परमपिता परमेश्‍वर ही मिलेंगें । सबकी पहुँच अगर एक परमपिता परमेश्‍वर तक ही है फिर क्‍या फर्क पडता है कि हम किसी भी घाट से सरोवर के जल तक पहुँचे या किसी भी धर्म, पंथ से परमपिता परमेश्‍वर तक पहुँचे ।


एक बहुत मार्मिक पंक्ति मुझे याद है जिसमें एक सवाली परमपिता परमेश्‍वर से कहता है - मैं तो तेरा दर देख झुक गया, यह तो तू ही जाने कि वहाँ तू ईश्‍वर रूप में है या अल्‍लाह रूप में या गॉड रूप में है


हम परमपिता परमेश्‍वर के दर पर झुकना सीख जायें तो धर्म, पंथों के भेद-भाव तत्‍काल मिट जाते हैं । पर हम परमपिता परमेश्‍वर की जगह ईश्‍वर विशेष के दर पर झुकते हैं - तभी तो दूसरे धर्म के प्रति संवेदना खत्‍म हो गई है । दूसरे धर्म की बात भी छोडें, एक धर्म में भी हमने कितना विभाजन कर दिया है, कितने पंथ बना लिये हैं ।


प्रभु के घर पर जब हम पहुँचेगें तो प्रभु जरूर पुछेगें कि पूरे मानव जीवन में तुम इतना नहीं समझ पाये कि मैं (प्रभु) एक ही हूँ । हर धर्मग्रंथ में यह बात लिखी है पर हम इस तथ्‍य को जीवन में उतार नहीं पाते । परमपिता परमेश्‍वर को कितना दुःख होता है अपने बच्‍चों को आपस में लडते देखकर । उदाहरण स्‍वरूप एक संसारी पिता के छ: पुत्र हैं । सभी आपस में लडते-झगडते हैं, किसी में भी भाईचारा नहीं है तो पिता को कितना दुःख होगा की एक ही पिता के पुत्र (यानी भाई-भाई) होते हुये भी कितनी कट्टरता है । यही दुःख परमपिता परमेश्‍वर को भी होता होगा कि मेरी संतानें मेरे नाम पर कितना लडते-झगडते हैं, समभाव क्‍यों नहीं रखते ।


यही सवाल सभी धर्म के लागों से अंत में परमपिता पुछेगें कि इतने दृष्टान्तों में श्रीग्रंथों में मैंने (प्रभु ने) स्‍पष्‍ट रूप से कहा है कि मैं (प्रभु) एक ही हूँ । मेरे इतने भक्‍तों ने, संतो ने, पीरों ने संसार को जगाते हुये उच्‍चे स्‍वर में हर युग में यह बात कही है कि प्रभु एक ही हैं - फिर क्‍यों मेरे नाम पर, मेरे धाम पर उलझते हो, झगडते हो ।


उदाहरण स्‍वरूप जैसे छ: पुत्रों में एक पुत्र अपने पिता की शर्ट-पेन्‍ट में तस्वीर लगाकर रखता है, दुसरा कोट-टाई में तस्वीर लगाकर रखता है, तीसरा धोती-चोला में तस्वीर लगाकर रखता है, पर पिता तो एक ही हैं । अब वे बच्‍चे आपस में झगडें की मेरे शर्ट-पेन्‍ट वाले पिता श्रेष्‍ठ हैं, दुसरा कहे कि मेरे कोट-टाई वाले पिता बड़े हैं, तीसरा कहे कि मेरे धोती-चोला वाले पिता उत्‍तम हैं । यह झगडा पिता देखेंगें तो उन्‍हें कितना हास्‍यप्रद लगेगा, अपने तीनों बेटों की मुर्खता देखकर ।


ऐसा ही परमपिता परमेश्‍वर को लगता होगा जब धर्म के नाम पर उनके बच्‍चे आपस में झगडते हैं । वह भी तब जब यह बात विश्‍व विदित है कि प्रभु तो एक ही हैं । वह परम शक्ति , वह आदी शक्ति तो एक ही है जो हम सबका संचालन करती है । "सबका मालिक एक" - यह तीन शब्‍द हम पढते, सुनते जरूर हैं पर उसका सार समझ जायें और उसका सार जीवन में उतार लें तो सभी भेद-भाव मिट जायेगें । फिर हम मंदिर, मस्जिद, चर्च रूपी ईमारत में झुकनें की जगह वहाँ बिराजे एक ही परमपिता परमेश्‍वर के सामने झुकना सीख लेगें । तभी वह स्थिति आयेगी जब हम यह कह सकेगें कि - आपका दर देख मैं तो झुक गया, अब यह आपको ही पता है की आप यहाँ किस रूप में विद्यमान हैं ।


प्रभु किसी भी रूप में विद्यमान हो पर हैं तो वे एक ही । हम जिस रूप में प्रभु को देखते हैं प्रभु उसी रूप में वहाँ मिलते हैं - यह स्‍पष्‍ट सिद्धांत है ।


सिर्फ भक्ति के बल पर ही यह धर्म का, पंथ का पर्दा हट जाता है और सर्वदा और सर्वदा परमपिता परमेश्‍वर ही हर जगह दिखते हैं । फिर तत्‍काल ही सर्वधर्म सिद्धांत मान्‍य हो जाता है । फिर हर धर्म, हर पंथ की जय बोलने में हमें कोई संकोच नहीं होता क्‍योंकि यह तथ्‍य हम समझ चुके होते हैं कि किसी भी घाट से पहुँचें पर सरोवर / जल तो एक ही है ।


सर्वधर्म सिद्धांत दृढ होते ही भाईचारा बढने लगता है । जब पिता एक हैं और हम सब उनकी संतानें हैं तो भाई-भाई में प्रेम पनपेगा । जैसे एक संसारी पिता को अपने छ: पुत्रों में प्रेम देखकर प्रसन्‍नता होती है, वैसे ही परमपिता परमेश्‍वर को भी अपने बच्‍चों में प्रेम-भाईचारा देखकर अति प्रसन्‍नता होती है । इसके ठीक विपरीत अपने बच्‍चों में बैर-वैमनस्यता देखकर जैसे एक संसारी पिता दुःखी होता है वैसे ही धर्म, पंथ के नाम पर हमें झगडते देख परमपिता परमेश्‍वर को बेहद अफसोस होता है ।


"प्रभु एक ही हैं" - यह चार शब्‍द, "सबका मालिक एक" - यह तीन शब्‍द, "मालिक एक" - यह दो शब्‍द समझने के लिए हमें डिग्रीधारी, विद्वान या पढा-लिखा होने की भी आवश्‍यकता नहीं । पर अफसोस तो यह है कि विद्वान और पढे-लिखे लोग ही इसे न तो समझते हैं और न ही इसे स्‍वीकार कर जीवन में उतारते हैं ।


भक्ति ही वह माघ्‍यम है जो इन चार, तीन और दो शब्‍दों को हमें समझा सकती है । भक्ति की प्रबलता जीवन में आने पर आपको हर जगह - मंदिर, मस्जिद और चर्च में ईश्‍वर, अल्‍लाह और गॉड नहीं बल्कि एक ही परमपिता परमेश्‍वर दिखेगें । फिर पूजा, सजदा और प्रार्थना में कौन बड़ा, कौन छोटा यह फर्क ही मिट जायेगा - क्‍योंकि तीनो बंदगी ही तो है । हर पंथ, हर धर्म के लिए हमारे मन में सम्‍मान जग जायेगा क्‍योंकि अन्‍तोगतवा हासिल तो उन्‍हें एक ही परम तत्‍व को करना है । मार्ग चाहे अलग हो सकते हैं, मंजिल तो एक ही है । किसी भी मार्ग से किसी को भी जाने की छुट है बशर्ते वह ठीक मंजिल तक पहुँच जाये ।


आज एक दुसरे धर्म के लिए कितना विरोध है । कोई भी son of lesser GOD नहीं है क्‍योंकि there is no lesser GOD । परमपिता परमेश्‍वर तो एक ही हैं और हम सभी एक ही परमपिता परमेश्‍वर की ही संतानें हैं । इसलिए अपने धर्म पर सभी को जितना फक्र होना चाहिए उतना ही दुसरे के धर्म के प्रति सम्‍मान होना चाहिए ।


धन्यवाद ज्ञापन

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