श्री गणेशाय नमः
Devotional Thoughts
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GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
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131 किसके बारे में श्रवण करना चाहिए ? (प्रभु के बारे में श्रवण करना चाहिए)
132 प्रभु के पास क्या है ? (प्रभु के पास केवल कृपा ही कृपा है)
133 नर्क से हमें कौन बचाता है ? (नर्क से हमें प्रभु बचाते हैं)
134 किससे प्रेम होना चाहिए ? (प्रभु से ही प्रेम होना चाहिए)
135 किससे रिश्ता रखें ? (प्रभु से रिश्ता रखें)
136 कौन प्रभु को सबसे प्रिय ? (सबका मंगल चाहने वाला प्रभु को सबसे प्रिय)
137 किसकी कृपा सबसे जरूरी ? (प्रभु की कृपा सबसे जरूरी)
138 ब्रह्मांड के संचालक कौन हैं ? (प्रभु ब्रह्मांड के संचालक हैं)
139 इस जन्म को अंतिम जन्म कैसे बनाए ? (भक्ति करके इस जन्म को अंतिम जन्म बनाए)
140 बुद्धिमान कौन ? (भक्ति करने वाला जीव बुद्धिमान)
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131 किसके बारे में श्रवण करना चाहिए ? (प्रभु के बारे में श्रवण करना चाहिए)

जैसे हम किसी सभा में बैठे हो और वहाँ किसी युवक के गुण और पराक्रम के बारे में हम सुनते हैं तो हमारे भीतर उससे मिलने की इच्छा प्रबल हो जाती है । वैसे ही जब हम प्रभु की कथा में प्रभु के सद्गुणों, स्वभाव, प्रभाव और ऐश्वर्य के बारे में सुनते हैं और प्रभु की कृपालुता और दयालुता के दर्शन हमें होते हैं तो हमारे हृदय में प्रभु मिलन की इच्छा जग जाती है । प्रभु के बारे में श्रवण का इतना बड़ा महत्व है कि वह प्रभु भक्ति और प्रभु प्रेम हमारे भीतर जागृत करके प्रभु का साक्षात्कार करवा देता है ।

इसलिए जीवन में जब भी प्रभु के बारे में श्रवण का मौका आए तो किसी भी परिस्थिति में उसे चूकना नहीं चाहिए और उसका लाभ लेना चाहिए ।

132 प्रभु के पास क्या है ? (प्रभु के पास केवल कृपा ही कृपा है)

जैसे हम किसी व्यक्ति की आलोचना या बुराई करते हैं तो मौका लगने पर वह हमें परेशान करने से नहीं चूकता और अपना बदला निकालने का अवसर तलाशता है । पर प्रभु की कोई नास्तिक आलोचना भी करता है या प्रभु को नहीं मानता तो भी प्रभु उस पर कृपा ही करते हैं । संत कहते हैं कि कृपा के अलावा प्रभु के पास अकृपा नाम की कोई चीज है ही नहीं । संत विनोद में कहते हैं कि प्रभु सदैव सबका मंगल ही करते हैं क्योंकि किसी का अमंगल करने का साधन ही प्रभु के पास नहीं है । एकमात्र प्रभु ही हैं जिनकी आलोचना करने वाले पर भी प्रभु कृपा करते हैं और उसका हित ही करते हैं ।

जीवन जीने के लिए सबसे बहुमूल्य हवा, पानी और प्रकाश प्रभु के द्वारा नास्तिकों को भी प्रदान किया गया है और प्रभु इसका कोई मूल्य नास्तिकों से नहीं लेते । यह नास्तिकों पर भी प्रभु की कितनी विलक्षण और अकारण कृपा है ।

133 नर्क से हमें कौन बचाता है ? (नर्क से हमें प्रभु बचाते हैं)

भक्त के भीतर किसी निंदित कार्य के लिए डर और लज्जा प्रभु पैदा करते हैं । निंदा युक्त कार्य भक्त नहीं करे उसके लिए डर और लज्जा का निर्माण करना प्रभु की उस भक्त पर कितनी बड़ी कृपा होती है । अगर ऐसा नहीं हो तो भक्त निंदित कार्य करके पाप का भागी बन सकता है और उस पाप को भोगने के लिए उसे नर्क की यातनाएं सहनी पड़ सकती है । पर प्रभु अपने भक्तों से प्रेम करते हैं इसलिए उन्हें नर्क की यातनाओं से बचाने के लिए प्रभु ऐसा करते हैं ।

इसलिए जिन भक्तों के हृदय में निंदित कार्य करने के प्रति डर और लज्जा का भाव हो उन्हें ऐसा होने पर उसे प्रभु की कृपा प्रसादी माननी चाहिए ।

134 किससे प्रेम होना चाहिए ? (प्रभु से ही प्रेम होना चाहिए)

संसार से प्रेम करके हमें अपने प्रेम को बांटना नहीं चाहिए क्योंकि हमारे पूरे-के-पूरे प्रेम के हकदार केवल और केवल प्रभु ही हैं । जीव प्रभु की रचना है और प्रभु का अंश है इसलिए उसका सनातन संबंध केवल प्रभु के साथ ही है । संसार के साथ संबंध उसका माना हुआ संबंध है जबकि प्रभु से ही उसका असली संबंध है । दूसरा पहलू भी यह है कि ब्रह्मांड में प्रेम करने योग्य एकमात्र प्रभु ही है क्योंकि प्रभु का हमसे प्रेम निष्काम और निस्वार्थ होता है । संसार का प्रेम स्वार्थ वाला होता है और कामना पूर्ति की चाह वाला होता है ।

इसलिए जीवन में पूर्ण प्रेम केवल और केवल प्रभु से ही करना चाहिए ।

135 किससे रिश्ता रखें ? (प्रभु से रिश्ता रखें)

अपनी सभी परेशानियों से मुक्त होने का सबसे सरल उपाय यह है कि अपनी पूरी जिम्मेदारी प्रभु को सौंप देना । पर यह तभी संभव होता है जब हम भक्ति के द्वारा एक रिश्ता प्रभु से बनाते हैं । जैसे ही हम एक रिश्ता प्रभु से कायम कर लेते हैं प्रभु हमारी पूरी जिम्मेदारी उठा लेते हैं । फिर प्रभु की छत्रछाया में हम निश्चिंत होकर जीवन जी सकते हैं । अगर हम प्रभु के पुत्र बन गए और प्रभु को पिता के रूप में मानकर रिश्ता बना लिया तो जैसे एक सांसारिक पिता अपने पुत्र की सारी जिम्मेदारी का निर्वाह करता है वैसे ही परमपिता प्रभु भी हमारा पूरा दायित्व उठा लेंगे ।

अकेला जीव अपना दायित्व उठाते-उठाते जीवन में थक जाता है । इसलिए समझदारी इसी में है कि भक्ति से प्रभु के साथ एक पक्का रिश्ता जोड़ लिया जाए । फिर उस भक्त के दायित्व का भार प्रभु ले लेते हैं और वह भक्त अपने दायित्व के बोझ तले दबने से बच जाता है ।

136 कौन प्रभु को सबसे प्रिय ? (सबका मंगल चाहने वाला प्रभु को सबसे प्रिय)

मन से सबका भला और सबका मंगल चाहे बिना हम प्रभु को प्रिय नहीं हो सकते । प्रभु को प्रिय होने के लिए हमें सभी में प्रभु का दर्शन करना पड़ेगा और सबकी कुशलता चाहनी पड़ेगी । जीव अपनी तो कुशलता और मंगल चाहता है पर संसार का नहीं चाहता । इसका सीधा अर्थ यह है कि वह संसार को प्रभुमय नहीं देखता । जब संसार हमें प्रभुमय दिखने लग जाएगा तो हम स्वतः ही सबकी कुशलता और मंगल चाहेंगे । जो ऐसा कर पाता है वह प्रभु को प्रिय हो जाता है । इसलिए प्रभु को प्रिय होना हो तो सबकी कुशलता चाहनी होगी ।

ऐसा करने से एक और बात स्वतः ही होगी । सबकी कुशलता में अपने स्वयं की कुशलता स्वतः ही हो जाएगी और उसके लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ेगा ।

137 किसकी कृपा सबसे जरूरी ? (प्रभु की कृपा सबसे जरूरी)

इंसान प्रभु की कृपा के बिना कुछ भी नहीं कर सकता । इंसान केवल अपने बलबूते पर कुछ भी नहीं कर सकता । वह जो भी करता है वह प्रभु द्वारा प्रदान बुद्धि और शक्ति से ही करता है । इंसान जो भी करेगा वह अपनी बुद्धि और शक्ति के बल पर ही करेगा जो उसे प्रभु द्वारा प्रदान की हुई है । प्रभु द्वारा प्रदान बुद्धि और शक्ति जीव पर प्रभु की सबसे बड़ी कृपा है । इसलिए यह प्रमाणित होता है कि जीवन में प्रभु कृपा बिना जीव का कुछ भी कर पाना असंभव है ।

इसलिए यह नितांत आवश्यक है कि जीव अपने जीवन में अधिक-से-अधिक प्रभु कृपा अर्जित करने का प्रयास करे । प्रभु कृपा की जीवन में जागृति के लिए भक्ति सबसे सुलभ साधन है ।

138 ब्रह्मांड के संचालक कौन हैं ? (प्रभु ब्रह्मांड के संचालक हैं)

प्रभु की एक-एक रोमावली में कोटि-कोटि ब्रह्मांड समाए हुए हैं । प्रभु के शरीर में असंख्य ब्रह्मांड स्थित हैं । उन सबका संचालन प्रभु एक साथ करते हैं । प्रभु के संचालन के कारण सभी मर्यादा में रहते हैं और अपनी लय में स्थित रहते हैं । कितना विशाल कार्य है असंख्य ब्रह्मांडों का संचालन करना और कितनी सरलता से प्रभु इसे करते हैं । एक-एक ब्रह्मांड में कितने-कितने ग्रह और तारामंडल स्थित हैं । इस तरह असंख्य ग्रहों, नक्षत्रों और तारामंडलों का संचालन प्रभु करते हैं । उन ग्रहों में रहने वाले हर प्राणी की पुकार प्रभु तक पहुँचती है और प्रभु सबकी पुकार सुनते हैं । यह सब कितना अदभुत है ।

प्रभु के इस अदभुत संचालन से प्रभु की विराट ऐश्वर्य शक्ति का दर्शन हमें होना चाहिए ।

139 इस जन्म को अंतिम जन्म कैसे बनाए ? (भक्ति करके इस जन्म को अंतिम जन्म बनाए)

यह हमारा अंतिम जन्म हो और फिर हमें किसी के गर्भ में नहीं आना पड़े ऐसा प्रयास हमें इस जन्म में करना चाहिए । ऐसा प्रयास करना केवल मनुष्य जन्म में ही संभव है । केवल और केवल भक्ति से ही ऐसा संभव है इसलिए इस जन्म में प्रभु की भक्ति करके ऐसी तैयारी करनी चाहिए । अगर भक्ति पथ पर चलकर इस जन्म में कोई कमी रह जाती है तो भी हमें अपनी भक्ति को पूर्ण करने के लिए अगला जन्म मनुष्य का ही मिलेगा और हमें चौरासी लाख योनियों के चक्र में भटकना नहीं पड़ेगा । पिछले जन्म में जो भक्ति हमने की है उससे आगे ले जाने का अवसर और सामर्थ्‍य प्रभु हमें नए मनुष्य जन्म में देंगे । प्रभु की कृपा से उस नए मनुष्य जन्म में हम अपनी भक्ति यात्रा को पूर्ण कर पाएंगे और इस तरह सदा के लिए संसार में आवागमन से मुक्त हो जाएंगे ।

इसलिए यह जीवन हमारा अंतिम जन्म हो इस हेतु का प्रयास जीवन में प्रभु की भक्ति करके हमें करना चाहिए ।

140 बुद्धिमान कौन ? (भक्ति करने वाला जीव बुद्धिमान)

एक व्यक्ति ने मनुष्य जीवन पाकर खूब व्यापार किया । खूब धन कमाया । खूब ऐशो आराम से रहा और अपनी सात पीढ़ियों के लिए धन इकट्ठा कर लिया । पर उसने अपनी व्यस्तता में प्रभु की भक्ति नहीं की । व्यापार को समय दिया पर प्रभु को समय नहीं दिया । अंत में मौत हुई और जैसे वह खाली हाथ आया था वैसे ही खाली हाथ वापस चला गया । संसार में जो कमाया वह संसार में ही छूट गया । सब कुछ उसके बच्चों के काम आया । खुद के काम की थोड़ी भी चीज वह अपने साथ नहीं ले जा पाया । दूसरी तरफ एक व्यक्ति ने साधारण व्यवसाय किया । अपने जीवन यापन की पूर्ति की और बाकी बचा पूरा समय भक्ति करके प्रभु को अर्पित किया । संसार से गया तो कोई धन संपत्ति अपनी अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर नहीं गया पर खुद भक्तिरूपी धन से मालामाल हो कर गया । सीधा प्रभु के धाम गया और जन्म-मृत्यु के चक्र से सदैव के लिए मुक्त हो गया । भक्ति ने उस जीव को सीधे प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचा दिया ।

जरा सोचें दोनों में कौन चतुर था और किसने बुद्धिमानी से अपने मानव जीवन का सही उपयोग किया ।