श्रीगणेशाय नमः
Devotional Thoughts
Devotional Thoughts Read Articles सर्वसामर्थ्यवान एंव सर्वशक्तिमान प्रभु के करीब ले जाने वाले आलेख, द्वै-मासिक ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में )
Articles that will take you closer to OMNIPOTENT & ALMIGHTY GOD, bimonthly (in Hindi & English)
Precious Pearl of Life श्रीग्रंथ के श्लोको पर दो छोटे आलेख ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक रविवार
Two small write-ups on Holy text (in Hindi & English), every Sunday
Feelings & Expressions प्रभु के बारे में उत्कथन ( हिन्दी एंव अंग्रेजी में ), प्रत्येक बुधवार
Quotes on GOD (in Hindi & English), every Wednesday
Devotional Thoughts Read Preamble हमारे उद्देश्य एवं संकल्प - साथ ही प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी
Our Objectives & Pledges - Also answers FAQ (Frequently Asked Questions)
Visualizing God's Kindness वर्तमान समय में प्रभु कृपा के दर्शन कराते, असल जीवन के प्रसंग
Real life memoirs, visualizing GOD’s kindness in present time
Words of Prayer प्रभु के लिए प्रार्थना, कविता
GOD prayers & poems
प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : प्रभु के ऐश्वर्य और सामर्थ्‍य के आगे हम बिलकुल ही बौने हैं फिर भी भक्ति के बल पर हम प्रभु से बंध सकते हैं क्‍योंकि वे ही हमारे परमपिता हैं । पूरा लेख नीचे पढ़े -



कभी हम लम्‍बे सफर के दौरान खिड़की से बाहर झांककर देखें तो पायेगें कि कितने ही असहाय लोग (गरीब, विकलांग), कितने पशु पक्षी की प्रजातियां, कितने छोटे जीव जैसे चींटी, कीडे, मकोडे इत्‍यादि हैं । उनका रोजाना पेट भरने की जिम्मेदारी किसने ले रखी है । उनके विपदा में पुकारने पर उनके अमंगल को हरने की जिम्मेदारी किसने ले रखी है । मेरे प्रभु ने ले रखी है ।


हम अपने छोटे से परिवार की जिम्मेदारी, एक उद्योगपति अपने फैक्‍टरी के कर्मचारी की जिम्मेदारी, एक राजा अपने राष्ट्र के नागरिक की जिम्मेदारी भी ठीक से वहन नहीं कर पाता, ठीक से निभा नहीं पाता । उदाहरण के तौर पर, क्‍या राजा को 200 किलोमीटर दूर राज्‍य के एक जरूरतमंद की रात के 2 बजे की जरूरत का पता है और उसका तत्‍काल निवारण करने की क्षमता है । 200 किलोमीटर दूर जरूरतमंद की रात के 2 बजे की जरूरत को जानना और उसका तत्‍काल निवारण कर पाना किसी राजा के लिए संभव नहीं । यही हाल एक परिवार के मुखिया और उद्योगपति का है । दुसरा उदाहरण लेवें - एक परिवार का मुखिया व्‍यापार के सिलसिले में दूसरे शहर गया हुआ है । उसके घर से रात को 2 बजे फोन आता है कि पत्‍नी को गंभीर हृदयघात हुआ है । वह दूर बैठा फोन पर कहेगा कि अमुक अस्‍पताल, अमुक डाक्‍टर के पास तुरंत ले जाओ । ज्‍यादा से ज्‍यादा 5-6 फोन डाक्‍टर एवं रिश्‍तेदारों को कर देगा । पर अंत में उसे कष्‍ट निवारण हेतु प्रभु की प्रार्थना में बैठना ही पडेगा । उसकी शक्ति नहीं, उसका सामर्थ्‍य नहीं (चाहे वह कितना भी बुद्धिमान, धनवान हो) कि वह अपनी पत्‍नी के कष्‍ट का निवारण स्वतः कर सके । उसे प्रभु की शरण में जाना ही होगा । विपदा के समय बड़े से बड़े नास्तिक भी प्रभु के सामने नतमस्‍तक हो जाते हैं क्‍योंकि उन्‍हें स्‍पष्‍ट पता होता है कि अब बचने का केवल एकमात्र आधार प्रभु ही हैं ।


एक राजा, एक परिवार के मुखिया का सामर्थ्‍य देखने के बाद अब प्रभु का ऐश्वर्य देखें । मेरे प्रभु अमावस्‍या की अंधेरी और काली रात में, कोयले के खान में, नन्‍हीं काली चीटी को भी देखते हैं एवं 24 घंटे 365 दिन उसकी पुकार सुनते हैं । ऐसा एक चीटी के लिए नहीं, प्रभु ऐसा खरबों-खरबों-खरबों यानी असंख्‍य अगनित जीव (जलचर, नभचर, थलचर, वनस्पति) के लिए नित्‍य करते हैं । नित्‍य अगनित जीवों को देखने वाले, नित्‍य उनकी पुकार सुनने वाले, नित्‍य उनका पेट भरने वाले, नित्‍य उनकी विपदा में मदद पहुँचाने वाले - एकमात्र मेरे प्रभु ही हैं । इस भाव को समझने से प्रभु के विराट ऐश्वर्य के तत्‍काल दर्शन हो जाते हैं । प्रभु के कोटी-कोटी हिमालय तुल्‍य प्रबल ऐश्वर्य के आगे हम नतमस्‍तक हो जाते हैं क्‍योंकि कितना भी बलवान, बुद्धिमान और धनवान होने पर भी हमें उस हिमगिरी के आगे अपना स्‍वयं का सामर्थ्‍य एक धुल के कण से ज्‍यादा कुछ नहीं प्रतीत होता है । ( प्रभु के कोटी-कोटी हिमालय तुल्‍य प्रबल ऐश्वर्य यहाँ एक दृष्टान्त के रूप में कहा गया है जबकि प्रभु का ऐश्वर्य हमारी कल्‍पना से बाहर है और शब्‍दों से परे है ।)


प्रभु के ऐश्वर्य के दर्शन हृदय में होते ही प्रभु के प्रति लगाव बढने लगता है, प्रेम बढने लगता है । इसी लगाव और प्रेम का दुसरा नाम भक्ति है । इतने सामर्थ्‍यवान प्रभु मात्र और मात्र भक्ति के बल पर ही तत्‍काल हमारे बन जाते हैं । भक्ति ही वह एकमात्र साधन है जो इतने ऐश्वर्यवान, सामर्थ्‍यवान प्रभु के नजदीक हमें पहुँचा देती है । कितना फर्क है प्रभु और हमारे में - प्रभु इतने ऐश्वर्यवान, सामर्थ्‍यवान और हम इतने साधारण । फिर भी भक्ति जीव और "शिव" का मिलना करवा देती है ।


भक्ति हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में नतमस्‍तक करवा देती हे । प्रभु के श्रीकमलचरणों में नतमस्‍तक होते ही हमारे मस्‍तक की दुःख की रेखायें मिटने लग जाती है । हमारी दुःख की रेखायें कब मिट जाती हैं हमें पता भी नहीं चलता । उनकी जगह सुख की नई रेखायें कब खींच जाती हैं, हमें पता भी नहीं चलता । पारस के स्‍पर्श से लोहा स्‍वर्ण बन जाता है । पारस का स्‍वभाव है कि वह लोहे के गुण, दोष को नहीं देखता, बल्कि स्‍पर्श होते ही वह लोहे को स्‍वर्ण कर देता है । ठीक वैसे ही मेरे प्रभु का स्‍वभाव है कि वे जीव के गुण, दोष को नहीं देखते । जीव का प्रभु के श्रीकमलचरणों से स्‍पर्श होते ही उसके दुःख (लोहा) तत्‍काल सुख (स्‍वर्ण) में परिवर्तित हो जाता है । प्रभु के श्रीकमलचरणों की यही महिमा है और इससे कम वहाँ से कुछ मिल ही नहीं सकता । क्‍या पारस चाहकर भी लोहे को लोहा रहने दे सकता है - कदापि नहीं । इस तथ्‍य को एक और उदाहरण से समझें - आप की जेब में एक रूपये के सिक्‍के हैं । एक भिखारी आया तो आप उसे दस पैसे नहीं दे सकते क्‍योंकि दस पैसे का सिक्‍का आपके पास है ही नहीं । उसे न्‍युन‍तम एक रूपया ही देना होगा । वैसे ही प्रभु के श्रीकमलचरणों का स्पर्श तो सुख ही देगा क्‍योंकि उसके अलावा वहाँ कुछ अन्‍य है ही नहीं ।


इसलिए हमारे मस्‍तक की सर्वोत्‍तम गति परम ऐश्वर्यवान और सामर्थ्‍यवान प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही है । अंग्रजी का एक शब्‍द है GODFATHER यानी परमपिता । शास्त्रों का मर्म यही है कि - LET GOD BE THE ONLY GODFATHER यानी परमपिता प्रभु को ही अपना एकमात्र परमपिता और पालनहार मानों । पर हम यहाँ चुक कर जाते हैं । हम किसी बड़े धनवान या किसी बड़े नेता से अपने को जोडने लगते हैं, उसे अपना GODFATHER तक मान लेते हैं । यहाँ पर दोष हमारा है क्‍योंकि हमने प्रभु के ऐश्वर्य के सही दर्शन जीवन पर्यन्त नहीं किया । अगर प्रभु के ऐश्वर्य के दर्शन हम कर पाते तो GOD GOD & ONLY GOD यानी प्रभु प्रभु और सिर्फ प्रभु की भावना हमारे भीतर प्रबलता से उभर आती और हम प्रभु को ही एकमात्र और एकमात्र GODFATHER मानते ।


यही भाव भक्‍तों का भाव रहा है जो कि भक्‍तराज श्री नरसीजी के अमर पद - "वैष्णव जन तो तेने कहिये" में मिलेगा । भजन की एक पंक्ति में यही भाव है - "राम नाम की ताली लागी" यानी किसी भी संसारिक व्‍यक्ति या संसारिक नाम की ताली नहीं । भक्‍त की ताली सिर्फ प्रभु के लिए ही बजती है ।


धन्यवाद ज्ञापन

इस वेबसाइट की कोशिश है कि प्रभु के करीब चले | इस कोशिश में जहाँ जहाँ से हमें सहयोग मिला है उसे अभिस्वीकार करते हुए यहाँ दर्ज “विचारों को फैलाने” में जिन्होंने हमें सहयोग दिया है उनका हम सादर आभार प्रकट करते हैं |

प्रकाशन हेतु :
इन्होने प्रभु के बारे में हमारे लेखन का समालोचन करने के बाद प्रकाशन किया | इनके प्रति हमारा हार्दिक आभार | वर्णक्रमानुसार :
SWARGVIBHA.
ब्लॉग हेतु:
लेख ब्लॉग के रूप में यहाँ उपलब्ध हैं | इन सभी ब्लॉग मंच का धन्यवाद | सभी का आभार | वर्णक्रमानुसार :
HINDIBLOGS, HINDIBLOGSPOT, JAGRANJUNCTION.