श्री गणेशाय नम:
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
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121 अभाव में भी किसके लिए मन में भाव रखें ? (अभाव में भी प्रभु के लिए मन में भाव रखें)
122 किसका बल सबसे ज्यादा ? (प्रभु की शरणागति का बल सबसे ज्यादा)
123 अपना कौन ? (केवल प्रभु ही अपने)
124 भक्ति में क्या होना जरूरी ? (भक्ति में अनन्यता होनी जरूरी)
125 किसके बनकर जीवन में रहना चाहिए ? (हमें प्रभु के बनकर ही जीवन में रहना चाहिए)
126 प्रभु की सच्ची कृपा क्या है ? (प्रभु की सच्ची कृपा भक्ति और प्रेम का दान है)
127 विपत्ति काल में हमारा रक्षक कौन ? (विपत्ति काल में प्रभु ही हमारे रक्षक)
128 हमें किससे प्रेम करना चाहिए ? (केवल प्रभु से प्रेम करना चाहिए)
129 किसकी कृपा से हमारा जीवन चलता है ? (प्रभु की कृपा से हमारा जीवन चलता है)
130 कौन हमारी पुकार सुनता है ? (प्रभु ही हमारी पुकार सुनते हैं)
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121 अभाव में भी किसके लिए मन में भाव रखें ? (अभाव में भी प्रभु के लिए मन में भाव रखें )

जिन दंपति को संतान सुख नहीं होता उन्हें भी उसे प्रभु की कृपा प्रसादी माननी चाहिए । वे पति पत्नी प्रभु के श्री लड्डू गोपालजी के स्वरूप की सेवा जीवन में स्वीकार कर अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं और भवसागर से तर सकते हैं । पर वे संतान सुख के लिए ज्योतिषियों, पीरों के चक्कर काटते हैं और अस्पताल में बड़े-बड़े उपचार करवाते हैं । अगर संतान हो भी जाए तो भी वे उसकी पढ़ाई, विवाह और व्यापार की व्यवस्था में उलझकर प्रभु से दूर हो जाते हैं ।

इसलिए जिन्हें संतान नहीं है या संतान होने पर भी संतान विमुख है यानी संतान सुख नहीं है उन्हें इसे भी प्रभु की असीम कृपा माननी चाहिए और जीवन में प्रभु श्री लड्डू गोपालजी की सेवा स्वीकार करनी चाहिए । प्रभु के श्री लड्डू गोपालजी स्वरूप की सेवा संतान सुख से कितना ज्यादा आनंद प्रदान करने वाली है और भवसागर से तारने वाली और जीव का उद्धार कराने वाली है ।

122 किसका बल सबसे ज्यादा ? (प्रभु की शरणागति का बल सबसे ज्यादा)

एक प्रभु के सानिध्य में रहने से और प्रभु की शरणागति लेने से जीवन में सभी चीजें अपने आप ठीक हो जाती है, व्यवस्थित हो जाती है । बिना प्रभु की शरणागति लिए अलग-अलग रूप से सभी उलझनों को ठीक करने का प्रयास करने पर भी वे सुचारू नहीं होती । कितना श्रम लगाने पर भी चीजें अनुकूल नहीं होती । पर एक प्रभु की शरणागति से सभी चीजें और व्यवस्थाएं अनुकूल हो जाती है । प्रभु की शरणागति में इतना बड़ा बल है ।

इसलिए जीवन में एक प्रभु की शरणागति लेनी चाहिए जिससे सब कुछ व्यवस्थित हो जाए और हमारा लोक और परलोक दोनों सुधर जाए ।

123 अपना कौन ? (केवल प्रभु ही अपने)

भगवती मीराबाई का पद है "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई" । यहाँ प्रभु तो हमारे हैं इस भाव को तो हम प्राप्त कर लेते हैं पर "दूसरो न कोई" यहाँ पर जीव से चूक हो जाती है । जीव अपने कुटुंब, संपत्ति यहाँ तक कि अपने शरीर को अपना मानता है । यह अनन्यता नहीं है जो भगवती मीराबाई के भाव में झलकती है । भगवती मीराबाई जैसी अनन्यता "दूसरो न कोई" आने पर ही प्रभु मिलते हैं जैसे भगवती मीराबाई को प्रभु मिले थे । हमारी भक्ति में अनन्यता होनी चाहिए और यह भाव दृढ़ होना चाहिए कि मेरे तो केवल और केवल प्रभु ही हैं । मेरा कुटुंब, संपत्ति और यहाँ तक कि मेरा शरीर भी मेरा नहीं है क्योंकि मेरे तो सिर्फ और सिर्फ मेरे प्रभु ही हैं ।

हम दुनिया भर की चीजों को संसार में अपना बना लेते हैं, अपना मानने लगते हैं । हमें सभी को भुलाकर केवल और केवल प्रभु को ही अपना मानना चाहिए जिनसे हमारा सनातन संबंध है तभी हमारा कल्याण संभव है । प्रभु के लिए ऐसा अनन्य भाव आते ही प्रभु मिलन में फिर देर नहीं लगती ।

124 भक्ति में क्या होना जरूरी ? (भक्ति में अनन्यता होनी जरूरी)

भक्ति सदैव अनन्य होनी चाहिए । भक्ति में अनन्यता के बारे में सभी श्रीग्रंथों में जगह-जगह पर और बार-बार लिखा गया है । अनन्य का अर्थ है अन्य का न होना जैसे अनेक का अर्थ है एक का न होना । अनन्य भक्ति में केवल प्रभु होते हैं और हमारे सब कुछ केवल प्रभु ही होते हैं । अनन्यता आने पर जीवन में केवल और केवल प्रभु ही मेरे हैं, यह भाव आता है । हम परिवार, समाज सबके होते हुए साथ में प्रभु का भी होना चाहते हैं, यह अनन्यता नहीं है । जैसे एक कलाकार मंच पर अभिनय करता है वैसे ही हमें परिवार, समाज के साथ अभिनय करना चाहिए । जैसे उस कलाकार को पता होता है कि वह मात्र उस अभिनय का पात्र है और मंच पर जो हैं वह उसके अपने नहीं हैं । ऐसे ही हमें भी जीवन मंच पर यही मानना चाहिए ।

संतों ने जीवन जीने की एक बहुत सुंदर युक्ति दी है कि लगते रहो संसार के पर हो जाओ केवल और केवल प्रभु के । यही भक्ति में अनन्यता लाने वाली युक्ति है ।

125 किसके बनकर जीवन में रहना चाहिए ? (हमें प्रभु के बनकर ही जीवन में रहना चाहिए)

प्रभु के "भी" होना और प्रभु के "ही" होना में बहुत बड़ा अंतर छुपा हुआ है । हम सबके होते हैं और प्रभु के भी होते हैं, यह गलत है । हमें केवल और केवल प्रभु के "ही" बनकर जीवन जीना चाहिए । हम अपने हृदयरूपी कमरे में परिवार, समाज सबको स्थान देते हैं और फिर प्रभु को भी बुलाते हैं । प्रभु को पूर्ण रिक्त स्थान चाहिए । प्रभु के लिए हमारे हृदय में रिक्त स्थान होता ही नहीं इसलिए प्रभु नहीं आते । पर जब कोई बिरला भक्त अपने हृदय पटल को केवल प्रभु के आगमन के लिए रिक्त करके रखता है तो प्रभु तत्काल आ जाते हैं ।

इसलिए जीवन में सदैव प्रभु के "ही" होकर रहना चाहिए । यही सच्ची भक्ति है ।

126 प्रभु की सच्ची कृपा क्या है ? (प्रभु की सच्ची कृपा भक्ति और प्रेम का दान है)

प्रभु से धन, संपत्ति, पुत्र, पौत्र, आरोग्य आदि मिलना यह प्रभु की बड़ी साधारण कृपा है । भक्ति और प्रेम का दान प्रभु से मिलना यह प्रभु की असाधारण और सर्वोच्च कृपा है । हमारा दुर्भाग्य देखें कि हम प्रभु से सदैव साधारण कृपा की याचना करते हैं और वही जीवन में हमें मिलती है और उसी में हम राजी भी रहते हैं । प्रेम और भक्ति का दान हम प्रभु से कभी मांगते ही नहीं । हमारी अवस्था तालाब के उस मेंढक जैसी होती है जो तालाब को ही सब कुछ मानता है और महासागर का उसे पता ही नहीं होता । वैसे ही हम प्रभु से संसार का सुख ही मांगते हैं और भक्ति के परमानंद पाने की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता ।

इसलिए जीवन में प्रभु की सच्ची कृपा हो इसके लिए प्रभु से संसार नहीं बल्कि भक्ति और प्रेम मांगना चाहिए ।

127 विपत्ति काल में हमारा रक्षक कौन ? (विपत्ति काल में प्रभु ही हमारे रक्षक)

जब जीवन में घोर विपत्ति आती है तो संसार और रिश्तेदार सभी के दरवाजे बंद होने लग जाते हैं और अंत में पूरी तरह बंद हो जाते हैं । पर अगर उस जीव को प्रभु का भरोसा है और प्रभु में आस्था है तो वह विपत्ति बेला में अपना ध्यान प्रभु के श्रीकमलचरणों में केंद्रित कर लेता है और प्रभु के खुले द्वार और अधिक खुल जाते हैं । संत विनोद में कहते हैं कि प्रभु के द्वार इतने खुलते हैं कि द्वार और द्वारपाल सभी हट जाते हैं जिससे जीव को विपत्ति बेला में प्रभु की मदद में कोई विलंब या बाधा न आए ।

संत कहते हैं कि जरूरत बस इतनी है कि जीव विपत्ति काल में संसार पर आश्रित न रहकर पूर्णरूप से केवल और केवल प्रभु पर ही आश्रित रहे ।

128 हमें किससे प्रेम करना चाहिए ? (केवल प्रभु से प्रेम करना चाहिए)

प्रभु ने संसार की और हमारी उत्पत्ति अपने लिए की है क्योंकि प्रभु एक से अनेक होना चाहते थे । प्रभु ने हमें संसार में भेजा और हम संसार से प्रेम करने लग गए, सांसारिक रिश्तों से प्रेम करने लग गए और प्रभु को भूल गए । प्रभु को कितना दुःख होता होगा यह देखकर कि उनका बनाया जीव उनसे प्रेम नहीं करता और संसार से प्रेम करता है । प्रभु हमारे प्रेम का इंतजार करते रहते हैं और हम हैं की प्रभु की जगह संसार के प्रेम में ही उलझे रहते हैं ।

संसार में प्रेम करने योग्य केवल प्रभु ही हैं क्योंकि हम प्रभु के अंश हैं और प्रभु हमारे मूल अंशी हैं । इसलिए जिस जीव का निष्काम और निस्वार्थ प्रेम प्रभु से होता है वही जीव धन्य होता है और उसी का मानव जीवन धन्य होता है ।

129 किसकी कृपा से हमारा जीवन चलता है ? (प्रभु की कृपा से हमारा जीवन चलता है)

प्रभु की कृपा की हमें हर वक्त, हर परिस्थिति में और जीवन के हर क्षण में जरूरत होती है । यह सोचना भी मूर्खता है कि कभी क्षण भर के लिए भी हमारा जीवन प्रभु की कृपा के बिना चल सकता है । जरा सोचिए कि प्रभु की कृपा की हमें कहाँ जरूरत नहीं पड़ती ? प्रभु की कृपा से ही रात को हमें नींद आती है । प्रभु की कृपा से ही हमारी प्रत्येक श्‍वास चलती है । प्रभु की कृपा से ही हमारे शरीर के हर अंग काम करते रहते हैं । प्रभु की कृपा से हमारी बुद्धि चलती है । एक शब्द में कहना हो तो प्रभु की कृपा से ही हमारा पूरा जीवन सुचारू रूप से चलता है ।

प्रभु सदैव जीव पर कृपा करते रहते हैं और अपनी कृपा के बदले हमसे कुछ भी नहीं चाहते । प्रभु को नहीं मानने वाले एक नास्तिक पर भी प्रभु कृपा करते हैं । प्रभु के जैसा निस्वार्थ कृपा करने वाला और इतनी विराट मात्रा में कृपा करने वाला अन्य कोई भी नहीं है ।

130 कौन हमारी पुकार सुनता है ? (प्रभु ही हमारी पुकार सुनते हैं)

एक ही क्षण में कितने असंख्य जीव प्रभु को पुकारते हैं और कृपालु प्रभु उन सबकी पुकार सुनते हैं और उनके कष्टों का निवारण करते हैं । विपदा में फंसे कितने जलचर, थलचर, नभचर और वनस्पति प्रभु को प्रत्येक क्षण पुकारते हैं । सबकी पुकार प्रभु तक पहुँचती है और करूणामय प्रभु सबकी मदद करते हैं एवं सभी तक सहायता पहुँचाते हैं । प्रभु के कितने अद्वितीय ऐश्वर्य और सामर्थ्य का दर्शन इसमें हमें होता है । जरा कल्पना भर करें कि प्रत्येक क्षण करोड़ों की पुकार प्रभु के अलावा क्या कोई सुनने की क्षमता रखता है और उसके समाधान और निवारण की क्षमता रखता है । प्रभु के अलावा ऐसा कोई नहीं जिसके पास ऐसी विलक्षण क्षमता हो । यह क्षमता केवल और केवल प्रभु के पास ही है ‍।

इसलिए जीवन में सदैव प्रभु के सानिध्य में रहना चाहिए जिससे कभी हमारा अमंगल नहीं हो और विपदा में फंसकर हमें प्रभु को पुकारने की नौबत ही नहीं आए ।