श्रीगणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : मानव योनि सदैव के लिए जन्‍म–मृत्यु के जंजाल से मुक्‍त होने की योनि है | इसके सही उपयोग से चौरासी लाख योनियों के कालच्रक से हम सदैव के लिए मुक्त हो सकते हैं । पूरा लेख नीचे पढ़े -



चौरासी लाख योनियों में कर्मफल के कारण भटकने के बाद मेरे प्रभु ने कृपा करके हमें "मुक्ति योनि" यानी मानव योनि में जन्म दिया है । यह प्रभु की असीम कृपा होती है क्योंकि इस मानव जीवन का उपयोग हम सदैव के लिए मुक्त होने के लिए कर सकते हैं । मानव जीवन में बुद्धि की जागृति के कारण हम मानव जीवन का उद्देश्य समझ सकते हैं ।


एक पशु योनि का आकलन करें, चाहे वो जलचर हो, नभचर हो या थलचर हो, तो पायेगें कि उस जीव का जीवन भोजन तलाशने में, दुसरे बड़े जीव से अपने प्राणों की रक्षा करने में ही बीत जाता है । एक कौआ को या एक गिलहरी को प्रत्‍यक्ष देखें तो पायेगें कि प्रातः ही वे भोजन तलाशने निकल पडते हैं । दिन भर उन्हें अपने प्राणों की रक्षा के लिए चौकना रहना पडता है कि कहीं कोई उनके प्राणों पर घात न करे । एक कौआ या एक गिलहरी एक भोजन के ग्रास ग्रहण करने से पहले कितनी बार इधर-उधर देखते हैं अपनी आत्मरक्षा हेतु । छोटे जीव को बड़े जीव से खतरा रहता है । बड़े जीव को मनुष्य से खतरा रहता है । बाघ के खाल के लालच के कारण कितने बाघों की जीवनलीला मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए खत्म कर देता है । ऐसे में पशु योनि में प्रभु स्मरण, प्रभु भजन प्रत्यक्ष कर पाना संभव नहीं । पशु योनि में बहुत कम अपवाद होते हें जो अपने पूर्व पूण्य कर्म फल के बल पर आपको मंदिरों के आसपास पलते मिलेंगें । आपने मंदिरों के आसपास बंदरों को, गौ माता को, कबुतर को अकसर देखा होगा - ये वे प्राणी हैं जिनमें से कुछ निश्चित ही पशु योनि में भी मुक्ति हेतु प्रयास करते हैं । ऐसा करने पर उन्हें मुक्ति तो क्या पता नहीं मिले पर मनुष्‍य जन्‍म जरूर मिलता होगा जिससे की वे अपने प्रयास को अंजाम तक पहुँचा सके ।


मनुष्य जीवन निश्चित ही प्रभु कृपा का फल होता है क्योंकि चौरासी लाख योनियों के चक्रव्यहु से सदैव के लिए मुक्त होने का यह अदभूत साधन है । इस मानवरूपी जन्म का प्रभु सानिध्य में रहकर सर्वोत्तम उपयोग करके हम सदैव के लिए आवागमन से, चौरासी लाख योनियों के कालच्रक से मुक्त हो सकते हैं – इसलिए इस मानव योनि को संतों ने "मुक्ति योनि" कहा है ।


पर हमारा दुर्भाग्य देखें कि बड़ी कठीनाई से मिली मानव योनि में भी आकर हम अवांछित कर्म करके नये कर्मबंधन तैयार करते रहते हैं । इस तरह मुक्ति योनि में आकर भी हम "मुक्ति" की जगह "बंधन" अर्जित करते हैं । इससे भी बड़ा दुर्भाग्य तो तब होता है जब माया के प्रभाव के कारण हमारा ध्यान भी हमारी गलती की तरफ नहीं जाता । संतों ने, महापुरूषों ने संतवाणी में चेतावनी देते हुये हमें इस गलती को न दोहराने हेतु आगाह किया है । कितने चेतावनी भजन हमें इस संदर्भ के मिलेंगें । कबीरदासजी, भगवती मीरा बाई, सुरदासजी आदि अनेकों संतों के ऐसे पद हमें मिलेंगें जिनमें चेतावनी छुपी है – मानव जीवन का सही उपयोग करने हेतु चेतावनी, प्रभु सानिध्य में रहने हेतु आग्रह ।


प्रभु सानिध्य में आते ही प्रभु हमारा ध्यान तत्काल इस गलती की तरफ करवाते हैं और मानव जीवन में हो रही गलती की सुधार की प्रेरणा भी हमारे हृदय में प्रभु ही जाग्रत करते हैं । अन्यथा हमारा मानव जीवन भोजन, निद्रा और मैथुन में व्यर्थ चला जाता है । भोजन, निद्रा और मैथुन में अत्याधिक लिप्तता तो पशु योनि के सूचक हैं । मानव जीवन सिर्फ भोजन कमाने में (यानी धन कमाने में), मानव जीवन सिर्फ निद्रा में (यानी आलस्य में), मानव जीवन सिर्फ मैथुन में (यानी वंशवृद्धि में) लिप्‍त कर देना मुर्खता है । पर कितने व्‍यक्ति आपको मिलेंगें जो अप्रत्याशित धन अर्जन करने के बाद भी 65 वर्ष की आयु में भी धन अर्जन करने में लगे हुये हैं । कितने व्‍यक्ति ऐसे मिलेंगें जो आलस्य में ही जीवन व्यतीत किये जा रहें हैं । वे "कुछ नहीं" करने में माहिर होते हैं । कितने ही व्‍यक्ति मिलेंगें जो 8–10 संतानों द्वारा वंशवृद्धि में ही लगे हैं । ऐसे में मानव जीवन की उद्देश्य पूर्ति – प्रभु के तरफ चलने का न तो उनके पास दृष्टीकोण होता है और न ही प्रभु के तरफ बढने का समय ही होता है ।


पर कुछ सौभाग्यशाली मनुष्य होते हैं जिन पर उनके पूर्व जन्मों में किये संचित पूण्यकर्मो के कारण प्रभु की अनुकम्पा होती है । यह कौन सी अनुकम्पा है ? प्रभु को पाने हेतु भक्तिमार्ग पर चलने का उनका संकल्‍प, भक्तिमार्ग पर चलने का प्रयास । इससे भी बड़ी अनुकम्पा – सबसे बड़ी अनुकम्पा – की भक्तिमार्ग पर चलने वाले जीव की प्रभु पल–पल रक्षा करते हैं (अगर रक्षा नहीं करें तो माया का एक झोका ही उस साधक को संसार सागर में बहाने के लिए पर्याप्‍त है) और इस तरह प्रभु पल–पल कृपा बरसाते हैं । और अन्‍त में उस जीव को आवागमन से सदैव के लिए मुक्त कर देते हैं । इस तरह उस जीव को मिले मानव जन्म के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है ।


प्रभु की अनुकम्पा या तो पूर्व जन्मों के संचित पूण्‍यकर्मो के कारण होती है और या इस जन्म में प्रबलता से की गई भक्ति के कारण होती है । अगर थोडी सी भी भक्ति हमारे अंदर विद्यमान है तो उसे प्रभु का कृपा प्रसाद मानते हुये उसे निरंतर बढाने का श्रम करना चाहिए जिससे भक्ति का वह पौधा, भक्ति वृक्ष बन कर लहराये और मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति करवा देवें ।


धन्यवाद ज्ञापन

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