श्री गणेशाय नम:
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा
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101 कौन-सी कमाई मृत्यु बाद भी काम आयेगी ? (भक्ति की कमाई)
102 प्रभु को कैसे भजे ? (निष्काम होकर प्रभु को भजे)
103 वासनाओं का त्याग कैसे करें ? (प्रभु कृपा से वासना की निवृत्ति)
104 कौन प्रभु को सबसे प्रिय ? (सबका भला करने वाले प्रभु को सबका भला चाहने वाला ही प्रिय)
105 विकारों की सफाई कैसे होगी ? (भक्ति से विकारों की सफाई)
106 ब्रह्मांड का संचालक कौन ? (प्रभु के संचालन से ब्रह्मांड चलता है)
107 किसे केंद्र में रखकर हर क्रिया करें ? (प्रभु को केंद्र में रखकर हर क्रिया करें)
108 जीवन में क्या करना चाहिए ? (जीवन में प्रभु की भक्ति करनी चाहिए)
109 हमारे हृदय में किसका वास है ? (हमारे हृदय में प्रभु का वास है)
110 कौन-सी कमाई जीवन के बाद भी उपयोगी ? (भक्ति की कमाई ही जीवन के बाद भी उपयोगी)
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101 कौन-सी कमाई मृत्यु बाद भी काम आयेगी ? (भक्ति की कमाई)

हम धन की कमाई करते हैं और उस धन को अपने ऊपर खर्च करते हैं । इस तरह धन आता है और चला जाता है । पर हम भक्ति की कमाई नहीं करते जो कमाई आती तो है पर जाती कभी नहीं । जाने की बात तो छोड़े यह भक्ति की कमाई दिनों दिन सवाया होकर बढ़ती जाती है । मृत्यु के बाद भी यह भक्ति की कमाई हमारे साथ रहती है ।

धन से हमें लौकिक सुख मिलता है जबकि भक्ति हमें अलौकिक परमानंद प्रदान करती है । इसलिए जीवन में प्रधानता धन की नहीं बल्कि भक्ति की कमाई की रखनी चाहिए ।

102 प्रभु को कैसे भजे ? (निष्काम होकर प्रभु को भजे)

हम प्रभु से मांगना छोड़ दे और निष्काम हो जाए तो प्रभु हमारा इतना ख्याल रखेंगे कि हमें फिर जीवन में कभी मांगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी । प्रभु को हमारी हर जरूरत का पता होता है । हम मांगते हैं तो प्रभु को अच्छा नहीं लगता क्योंकि यह हमारा प्रभु पर अविश्वास जताता है ।

हमें निष्काम बनना चाहिए पर हम निष्काम नहीं बन पाते और प्रभु से सदैव मांगते ही रहते हैं । इस कारण हमें उतना ही मिलता है जिसके हम हकदार होते हैं पर निष्काम बनने पर निष्काम भक्त को प्रभु अपना सर्वस्व दे देते हैं । इसलिए प्रभु के समक्ष सकाम नहीं बल्कि निष्काम बनना चाहिए ।

103 वासनाओं का त्याग कैसे करें ? (प्रभु कृपा से वासना की निवृत्ति)

मनुष्य बहुत सारी वासनाओं में उलझा रहता है । इसमें धन की वासना, स्त्री की वासना और कीर्ति की वासना प्रधान होती है । प्रभु की कृपा ही हमें इन वासनाओं से छुड़ा सकती है । प्रभु सदैव जीव पर कृपा करने को तैयार खड़े रहते हैं पर जीव ही प्रभु का कृपापात्र नहीं बन पाता, यह जीव की बहुत बड़ी भूल होती है । कंचन (धन), कामिनी (स्त्री) और कीर्ति की वासनाएं इतनी प्रबल होती है कि प्रभु कृपा बिना छूटना संभव ही नहीं है ।

इसलिए जीवन में वासनाओं के त्याग के लिए प्रभु के श्रीकमलचरणों में आकर प्रभु की कृपा अर्जित करना ही एकमात्र विकल्प होता है ।

104 कौन प्रभु को सबसे प्रिय ? (सबका भला करने वाले प्रभु को सबका भला चाहने वाला ही प्रिय)

संत विनोद में कहते हैं कि सर्वसामर्थ्‍यवान होने के बावजूद भी एक शक्ति प्रभु के पास है ही नहीं और वह शक्ति है किसी का बुरा करने की शक्ति । ऐसी शक्ति प्रभु के पास है ही नहीं इसलिए प्रभु कभी भी किसी का बुरा तो कर ही नहीं सकते । दूसरी बात जो संत कहते हैं कि जिनका आचरण जैसा होगा उनको अपने से मिलता जुलता आचरण करने वाला ही प्रिय होगा । प्रभु का आचरण है किसी का बुरा नहीं करने का इसलिए प्रभु को वे ही जीव प्रिय होते हैं जो किसी का बुरा कभी नहीं करते ।

इसलिए जीवन में प्रभु का प्रिय बनना हो तो कभी सपने में भी किसी का बुरा करने की सोचना भी नहीं चाहिए ।

105 विकारों की सफाई कैसे होगी ? (भक्ति से विकारों की सफाई)

जैसे एक पुरूष के चेहरे की दाढ़ी रोज बढ़ती है । अगर उसे अपने चेहरे को साफ रखना है तो दाढ़ी को रोज साफ करना पड़ता है । वैसे ही अशुभ वासनाएं और विकृतियां रोज हमारे मन में जन्म लेती है । अगर उन्हें दूर रखना है और मन को निर्मल रखना है तो रोजाना प्रभु की भक्ति से मन को स्वच्छ रखना पड़ेगा । इसलिए भक्ति की आवश्यकता सर्वदा है । भक्ति कभी की और कभी नहीं की, ऐसा नहीं चलता है ।

भक्ति सर्वदा होनी चाहिए तभी जो अशुभ वासनाएं और विकृतियां रोज जन्म लेती है वह नष्ट होती रहेगी और हमारा जीवन सात्विक और प्रभु को प्रिय बना रहेगा ।

106 ब्रह्मांड का संचालक कौन ? (प्रभु के संचालन से ब्रह्मांड चलता है)

पूरा संसार व्यवस्थित रूप से चल रहा है । पूरा ब्रह्मांड लय में गतिमान है । सभी प्राणियों के साथ उनके कर्म अनुसार न्याय हो रहा है । प्रभु के कितने बड़े सामर्थ्‍य का दर्शन इन बातों का चिंतन करने पर होता है । प्रभु के संकल्प मात्र से सभी व्यवस्थित हैं, सभी लय में हैं । प्रभु के संचालन में जो लय और व्यवस्था दिखती है वह अदभुत है और अतुलनीय है । उसकी तुलना किसी भी सांसारिक दृष्टांत से कदापि नहीं की जा सकती ।

ऐसे ब्रह्मांड, जिसका हम हिस्सा हैं, उसके संचालक प्रभु का हमें सदैव ऋणी रहना चाहिए और उनकी प्रभुता का दर्शन हर तरफ करना चाहिए ।

107 किसे केंद्र में रखकर हर क्रिया करें ? (प्रभु को केंद्र में रखकर हर क्रिया करें)

आप सुबह-सुबह शहरों में स्वास्थ्य के लिए जागरूक लोगों को देख सकते हैं जो पार्क में टहलने के लिए जाते हैं । ऐसे स्वास्थ्य के लिए जागरूक लोग अगर प्रभु प्रेम में भी जागरूक हो जाएं और अपने सुबह टहलने का केवल मकसद बदल लें तो कितना अच्छा होगा । अगर वे एक घंटा सुबह पार्क में टहलने के नियम को बदलकर आधा घंटा पैदल मंदिर जाने का, दस मिनट मंदिर में प्रभु के दर्शन करने का और आधा घंटा पैदल वापस लौटकर घर आने का नियम बना लें तो यह कितना लाभदायक हो जाएगा । उनका टहलना भी हो जाएगा और स्वास्थ्य के साथ पुण्य लाभ भी होगा । प्रभु इतने करूणामय हैं कि दस मिनट दर्शन करने आने वाले व्यक्ति के घर से आने का आधा घंटा और घर वापस पहुँचने का आधा घंटा यानी दस मिनट के दर्शन की जगह एक घंटा दस मिनट का पुण्य उसके खाते में लिख देते हैं ।

इसलिए जीवन में हर क्रिया प्रभु को केंद्र में रखकर ही करनी चाहिए तो वह क्रिया भक्ति होगी और उसके लाभ अनंत होंगे ।

108 जीवन में क्या करना चाहिए ? (जीवन में प्रभु की भक्ति करनी चाहिए)

जीवन में हम धन कमाकर उस धन का उपयोग आराम के साधन जुटाने में करते हैं । हमारे धन कमाने के पीछे एक मुख्य उद्देश्य होता है कि जीवन आराम से गुजरे । हम आरामदायक कोठी बनवाते हैं, आरामदायक गाड़ी खरीदते हैं । हमें जीवन यापन के लिए साधारण घर और साधारण गाड़ी में संतोष करना चाहिए क्योंकि अंतिम सफर में अर्थी में कोई आराम का साधन नहीं होगा और चिता की लकड़ी पर कोई आरामदायक गद्दा नहीं होगा ।

इसलिए सात्विक जीवन यापन के लिए जितना जरूरी हो उतनी कमाई करके बाकी का हमारा सामर्थ्य हमें प्रभु की भक्ति करने में लगाना चाहिए । यही सच्ची कमाई है जो सदैव के लिए हमारे साथ रहने वाली है और हमारा उद्धार करवाने वाली है ।

109 हमारे हृदय में किसका वास है ? (हमारे हृदय में प्रभु का वास है)

अगर हम सच्चे भक्त हैं और प्रभु का हमारे हृदय में वास है तो हम कदापि किसी का बुरा नहीं करेंगे या कुछ गलत कार्य नहीं करेंगे । यह सिद्धांत है कि भक्ति हमें इतना सात्विक बना देती है कि सपने में भी हम कुछ गलत करने की सोच भी नहीं सकते । दूसरे शब्दों में किसी का बुरा या गलत नहीं करना इस बात की पुष्टि है कि प्रभु का वास हमारे हृदय में है और हमारी भक्ति सच्ची है ।

प्रभु को वही भक्त प्रिय होता है जो सबके प्रति सद्‍भावना रखता है और धर्म के विपरीत कुछ भी कार्य या आचरण नहीं करता । जो अपने भीतर प्रभु का वास मानता है वह ऐसा जीवन में कभी भी कुछ भी नहीं करेगा जो भीतर बैठे प्रभु को अच्छा नहीं लगे । वह सदैव प्रभु की प्रसन्नता को ध्यान में रखकर ही कार्य करेगा ।

110 कौन-सी कमाई जीवन के बाद भी उपयोगी ? (भक्ति की कमाई ही जीवन के बाद भी उपयोगी)

यात्रा में जरूरत का सामान ही साथ लेकर जाया जाता है । अनुपयोगी सामान छोड़ दिया जाता है । जीवन की अंतिम यात्रा में हमारी प्रभु की करी हुई भक्ति ही हमारे साथ जाएगी । रिश्ते-नाते, धन-संपत्ति, मान-सम्मान, गाड़ी-बंगला सब धरती पर ही छूट जाना है ।

हम किसी दूसरे देश की यात्रा में जाते हैं तो वहाँ चलने वाली मुद्रा ही हम साथ ले जाते हैं । ऐसे ही भक्ति ही मृत्यु के बाद की यात्रा में काम आने वाली है । धरती पर कमाए धन से हम यह भक्ति नहीं खरीद सकते जैसे हम अपनी मुद्रा से विदेशी मुद्रा आसानी से खरीद लेते हैं । इसलिए जब धरती पर कमाया धन आगे उपयोग में आने वाला नहीं है तो हमें वह कमाई ज्यादा करनी चाहिए जो आगे सदैव हमारे साथ रहने वाली है । इसलिए अपने जीवन काल में अपनी उर्जा का सदुपयोग भक्ति की कमाई करने में ही करना चाहिए ।