श्री गणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : जीवन में प्रभु की शरणागति लेना एक बहुत बड़ा पुरूषार्थ है जिसको प्राय: हम नजरअंदाज कर देते हैं और मानव जीवन की एक बहुत बड़ी चूक कर बैठते हैं । पूरा लेख नीचे पढ़ें -



प्रभु को शरणागति बहुत प्रिय है । शरणागत को अभय करना और शरणागत का हित करना प्रभु का व्रत है । शरणागत के योगक्षेम का वहन करना भी प्रभु का व्रत है ।


प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी का पूरा उपदेश देकर अंत में श्री अर्जुनजी को कहा कि वे उनकी शरण में आ जाए । शरणागत होने पर प्रभु जीव को भय, पाप और शोक से मुक्त कर देते हैं । प्रभु ने श्री रामचरितमानसजी में श्री विभीषणजी के प्रसंग में कहा कि उनकी शरण में कोई कितना भी बड़ा द्रोह करके आया हो पर सच्चे हृदय से पश्चाताप करके प्रभु की शरण में आने पर प्रभु जीव को कभी नहीं त्यागते ।


अक्सर यह देखा गया है कि जब तक हमें अपने कुटुम्ब बल, धन बल, विवेक बल और स्वयं के बल पर भरोसा होता है तब तक हम प्रभु की पूर्ण शरणागति नहीं ले पाते । यह सब प्रभु की पूर्ण रूप से शरणागति लेने में अवरोध का काम करते हैं । पूर्ण शरणागति नहीं होने पर प्रभु नहीं पधारते और न ही हस्तक्षेप करते हैं ।


दो उदाहरणों से हम इस तथ्य को समझने का प्रयास करेंगे । पहला प्रसंग भगवती द्रौपदीजी का है । जब तक भगवती द्रौपदीजी ने चीरहरण के प्रसंग में सभा में उपस्थित अपने पति और अन्य ज्येष्ठ जनों के प्रति बचाव की आस रखी तो प्रभु नहीं आए । फिर जब उन्होंने अपने बल का भरोसा किया और अपनी साड़ी को जोर से पकड़कर रखा तो भी प्रभु नहीं आए । जब उन्होंने प्रभु की शरणागति लेकर सभी आश्रयों को भुलाकर और अपना बल भूलकर साड़ी छोड़ी तो प्रभु वस्त्र अवतार लेकर प्रकट हो गए और उनकी लाज रखी । दूसरा प्रसंग श्री गजेंद्रजी का है । जब तक उन्होंने अपना कुटुम्ब बल और स्वयं का बल लगाया प्रभु नहीं आए । पर जब डूबने से पूर्व उन्होंने सब बल भुलाकर प्रभु की शरणागति ली तो प्रभु आधे नाम पर तत्काल आए और विलंब न हो इसलिए अपने से पहले अपने श्री सुदर्शनजी चक्रराज को भेज दिया और श्री गजेंद्रजी को संकट मुक्त किया ।


कितना सरल मार्ग है कि जीव को कुछ भी नहीं करना केवल प्रभु की शरणागति लेनी है पर जीव का दुर्भाग्य देखें कि वह ऐसा करने से प्राय: चूक जाता है । जीव संसार पर भरोसा करता है पर प्रभु पर भरोसा नहीं रखता । पर जो भाग्यवान प्रभु की शरणागति ग्रहण कर लेता है वह फिर तत्काल चिंतामुक्त और अभय हो जाता है ।


जब हम प्रभु की शरणागति ले लेते हैं तो हमारी चिंता का कार्य प्रभु का हो जाता है । शरणागत को पालना, उसकी रक्षा करना, उसका हित करना और उसका कल्याण करना प्रभु का दायित्व बन जाता है और प्रभु हमेशा इस दायित्व को बखूबी निभाते हैं ।