श्रीगणेशाय नमः
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प्रभु प्रेरणा से लेखन द्वारा चन्द्रशेखर करवा

लेख सार : माया हमारा निश्‍चित पतन करवाती है पर जब भक्ति के पराकाष्‍ठा पर पहुंचने पर मायापति ( प्रभु ) हमारा हाथ पकडते हैं तो माया निष्क्रिय हो जाती है | पूरा लेख नीचे पढ़े -



हमें प्रभु से डरना चाहिए और बहुत बहुत डरना चाहिए। उनके कोप से नहीं बल्कि हमारे गलत कृत्यों के कारण प्रभु को जो कष्ट पहुंचेगा, प्रभु दुखी होगें - इस कारण डरना चाहिए। हमारे गलत कृत्यों के कारण हम "प्रभु का" कहलाने की योग्यता खो देगें - इस बात से हमें डरना चाहिए ।


प्रभु से ज्यादा अगर किसी से डरना चाहिए तो वह "प्रभु की माया" से क्योंकि प्रभु तो करूणानिधान हैं । डरे हुये जीव को तुरंत अभयदान देते हैं और तुरंत उस पर अपनी करूणा की वर्षा करते हैं । पर प्रभु की माया बड़ी कठोर और निर्दयी है । वह करूणा नहीं जानती, सिर्फ अपने बंधन में जकडना जानती है ।


माया का वेग इतना भयंकर होता है कि वह एक पल में हमें प्रभु से दूर बहा कर ले जाती है । इस वेग के बहाव से वही बचता है जिसने जीवन में प्रभु का आंचल बड़ी जोर से पकड रखा हो या यू कहें कि मेरे प्रभु ने जिसका हाथ पकड रखा हो । इस एक अपवाद को छोडकर अन्य सभी को माया बहा ले जाने में सक्षम है ।


प्रभु स्वयं हाथ तभी पकडते हैं जब भक्ति पराकाष्ठा तक पहुंचती है । ऐसा होने तक सदैव हमारे जीवन में माया से विचलित हाने की आशंका बनी रहती है । विचलित होते ही पथभ्रष्ट होने में देर नहीं लगती ।


संत अजामिल को काम में आसक्‍त कर कामरूपी माया ने डंका बजा दिया और एक श्रेष्ठ वेदांती का पतन हुआ । माता कैकई को पुत्रमोह में आसक्‍त कर मोहरूपी माया ने कलंकित किया और उनके कारण मेरे प्रभु को लीलावश वनवास हुआ ।


जैसे राम से बडा अगर कुछ है तो वह "राम का नाम" माना गया है, वैसे ही प्रभु के डर से बड़ा किसी का डर है तो वह "प्रभु की माया" का डर है । यह इसलिए कि माया हमें प्रभु से दूर कर देने में सक्षम है, यहाँ तक की हमें भक्तिपथ से भी पथभ्रष्ट / विमुख करने में सक्षम है ।


इसलिए हमें प्रभु भक्ति में इतनी प्रगाढता लानी चाहिए, भक्तिमार्ग के उस मुकाम तक पहुंचना चाहिए, जहाँ प्रसन्न होकर प्रभु हम पर कृपा-अनुकम्पा करते हुए अपनी माया को ( प्रभु की माया मात्र प्रभु के ही आधीन है ) हमारे जीवन से हटा लेते हैं जिससे फिर कभी भी माया हमें बांधे नहीं / प्रभावित नहीं करें । ऐसा होने पर ही हम आजीवन माया के प्रभाव से बचे रहेंगें अन्यथा जीवन में कभी न कभी माया हमें जरूर पटकी देगी । माया हमें पटकी लगाये इससे पहले ही भक्ति द्वारा प्रभु के अनुकम्पा के पात्र बन जाना श्रेष्ठ है ।


प्रभु ने ऐसी अनुकम्पा अपने सभी भक्तों पर समय समय पर की है । इतिहास प्रमाण है कि ऐसे अनुकम्पा प्राप्त भक्त फिर कभी जीवन में मायाजाल में नही उलझे और निश्छल भक्तिमार्ग पर बढते चले गये ।


पहला उदाहरण भक्तराज सुदामाजी का है। मेरे प्रभु ने जब तीन मुट्ठी चावल के बदले सुदामापूरी का आलौकिक वैभव भक्त सुदामाजी को दिया तो प्रभु अनुकम्पा के कारण लोभरूपी माया ने उन पर कोर्इ प्रभाव नहीं किया । भक्त सुदामाजी ने अपनी पत्नी भगवती सुशीलाजी को कहा कि इस धन-संपति से तुम तीर्थ, दान, पुण्य करो जिसकी इच्छा तुम्हारे मन में सदैव से थी पर धनाभाव के कारण जिसकी पूर्ति नहीं हो पार्इ थी । पर भक्त सुदामाजी का प्रभु भजन-अर्चन निरंतर अविचलित पहले जैसा अपनी कुटिया में ही चलता रहा । प्रभु की माया ने इस भक्त शिरोमणि को फिर कभी नहीं बांधा । नहीं बांधकर लोभरूपी माया ने इस भक्त शिरोमणी का अभिनंदन किया ।


दुसरा उदाहरण भक्तराज नरसी मेहताजी का है । वे बहुत बड़े धन-वैभव का दान करके भक्तिमार्ग पर चल पडे थे। धनहीन बनने के कारण अपनो द्वारा मुंह मोडने पर, व्यंग-ताने कसने पर, सगे-संबंधी के द्वारा अपमानित होने पर भी वैभवरूपी माया ने उन पर कोर्इ प्रभाव नहीं किया । वे भक्तिमार्ग पर शान्त रूप से बढते चले गये और कभी प्रभु से पुन: धन-वैभव वापस पाने की चाह भी नहीं की । इसी कारण मेरे प्रभु और मेरी माता रूकमणी स्‍वयं मायरा लेकर पधारे । इस तरह वैभवरूपी माया ने इस भक्त शिरोमणी को नमन किया ।


सूत्र यही है कि प्रभु की माया की पटकी से बचना हो तो खुद प्रभु के बन जाओ और अपनी भक्तिबल से प्रभु को अपना बना लो ।


हम अपने मनुष्य जीवनकाल में प्रभु के आंचल को पकड लें और प्रभु हमारी भक्ति से रीझकर हमारा हाथ पकड लें - तो उसी क्षण से हमारे जीवन में माया निष्क्रिय हो जाती है / प्रभावहीन हो जाती है ।


धन्यवाद ज्ञापन

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